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Amrit Kumar
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Humanitarian. Tech Enthusiast. Talkative. Optimist. Atheist. Shy. Banker
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कुछ रिश्ते ऊपर वाला हमें देके भेजता है,
कुछ रिश्ते हम खुद अपने लिए इस दुनिया में चुनते हैं..
याद है वो दोस्त जो दूसरी लाइन में बैठा अपने स्लेट से तुमको गुणा भाग का जवाब बताता था,
वो जिसे तुम शनिवार वाली फिल्म ख़त्म होने के बाद उसकी गली तक छोड़ के आते थे,
वो दोस्त जो एक जेब में तुम्हारे लिए मूंगफली भर के लाता था,
और जो आगरा जाके वो खिलौना लेके आता था जिसमे पानी डालने पर ताजमहल दिखता था,
वो दोस्त जो तुम्हे कैरियल पे बिठा के स्कूल ले जाता था,
और तुम वापस उसे बिठा के स्कूल से वापस घर लाते थे,
वो दोस्त जो तुम्हारे पास पेंसिल न होने पर अपनी पेंसिल आधी तोड़ दिया करता था,
और तुम्हारी आधी नटराज की रबर जिसके पास पायी जाती थी,
वो दोस्त जो तुम्हारे लिए सीनियर क्लास के लड़कों से भिड़ जाता था,
और मुंह से खून निकलने तक मार खाता था,
वो जिसके साथ तुम मिल के अपना लंच खाते थे,
वो दोस्त जिसके साथ तुमने जिंदगी का पहला बंक मारा और मॉर्निंग शो में फिल्म देखी,
वो दोस्त जिसने तुम्हारे पहले क्रश को जिंदगी भर भाभी कहा,
और उसकी शादी वाले दिन तुम से ज्यादा जज्बाती होकर बियर पी,
वो दोस्त जो खुद तो क्वालीफाई न कर पाया,
पर तुम्हारे इंजीनियर बनने पर बहुत खुश हुआ था,
वो दोस्त जिसे तुम अपने नए दोस्तों से मिलके भूलने लगे थे..
वही दोस्त जिसको फाइनल ईयर तक पहुँचते पहुँचते तुमने अवॉयड ही करना शुरू कर दिया था..
वही दोस्त जो जो तुम्हारे परिवार के साथ तुम्हे नौकरी ज्वाइन करने से पहले स्टेशन विदा करने आया था..
उसकी हंसी आज तक नहीं बदली थी, पर तुम उसको देख के खुल के नहीं मुस्कुराये थे,
वही दोस्त जो तुम्हे नए शहर में भी अक्सर कॉल करता रहा,
जब तक कि तुमने अपना नंबर नहीं बदल लिया और उसको नया नंबर नहीं दिया..
वो जो ऑरकुट पर तो तुम्हारा दोस्त था लेकिन फेसबुक पर तुमने उसकी रिक्वेस्ट एक्सेप्ट भी नहीं की थी..
आज जब 5 साल बाद अपनी शादी के कार्ड बांटने तुम जा रहे हो,
उसी की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे हो,
और वो आगे भाग भाग कर तुम्हारे रिश्तेदारों के पैर छू छू के उसी उत्साह के साथ कार्ड बाँट रहा है,
मानो उसकी दोस्ती में वक़्त का कोई हैजीटेशन ही न हो,
वो पलट के तुम्हे देखता है,
तुम उदास हो, खुद पर शर्मिंदा भी,
वो इस बार भी तुम्हे समझ जाता है,
कंधे पर हाथ रख के कहता है,
अबे क्यों सेंटिया रहा है, तेरी विदाई थोड़े ही न होनी है, बहुत काम है भाई, अभी तो फुल टाइट होके तेरी बरात में नाचना भी है,
तुम खुद की नज़रों में ही गिर गए हो,
इस से पहले कि तुम रोओ,
वो तुम्हे गले लगाता है, और कहता है...अबे चलता है ये सब..मैं नहीं समझूंगा तो कौन समझेगा..
बाइक चल पड़ती है, और बाइक पे पीछे बैठे हुए तुम्हारे आंसू भी........ :'(

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What is Bharat QR Code #bharatqr   #bharatqrcode  

Krishna was born in the darkness of the night, into the locked confines of a jail.

However, at the moment of his birth, all the guards fell asleep, the chains were broken and the barred doors gently opened.

Similarly, as soon as Krishna ( Chetna, Awareness ) takes birth in our hearts, all darkness ( Negativity ) fades.

All chains ( Ego, I, Me, Myself ) are broken.

And all prison doors we keep ourselves in ( Caste, Religion, Profession, Relations etc ) are opened.

And that is the real Message And Essence of Janmashtmi.

Happy Janmashtmi

रात के ढाई बजे सिगरेट की तलब सी लगी..
आज ऑफिस का दिन बहुत हेक्टिक था..
प्रोजेक्ट्स की deadlines थीं और प्रजेंटेशन्स भी..
बैड के किनारे पड़ी टेबल से मैंने पैकेट उठाया..
फ्रिज के ऊपर रखा लाइटर उठा बालकनी में आ गया..
और सिगरेट सुलगा के आस पास छाये अँधेरे को देखने लगा..

रात का वक़्त था..आस पास अँधेरा ही था..
आसमान में बादल थे..और ऐसा अंदेशा था कि कभी भी बारिश शुरू हो सकती है..

मैंने जैसे ही पहला कश लिया..
बराबर वाली बालकनी से आवाज आयी..
और गुड्डू कैसा है..
गुड्डू मेरा बचपन का नाम था..
अपने अपरिचित पडोसी की बालकनी के अँधेरे से आती आवाज से मैंने नाम सुना तो मैं चौंक सा गया..

मैंने अँधेरे में फोकस करने की नाकाम कोशिश की..
और फिर हार कर पूछा..कौन हो भाई..

उधर से बदले में हंसी आयी..और वो बोला पहचान जाओगे..
और साथ में ये भी पूछा कि क्या आज भी क्रिकेट खेलता हूँ..

मुझे लगा बचपन का दोस्त हेमू होगा..
उसे ही पता था कि मैं क्रिकेट कितना अच्छा खेलता था..
और मोहल्ले के हर मैच में ओपनिंग पे मैं ही उतरा करता था..
मैंने थोड़ा झिझकते हुए जवाब दिया..नहीं अब नहीं खेलता..पर आप हो कौन..

बदले में वो फिर से हँसा..और फिर उसने कहा..
याद है चौपाल पे लगाईं जाने वाली वो दौड़ें..
जिसमे पूरे मोहल्ले के बच्चे दौड़ते थे..
और जीतने वाले को १ रुपया मिलता था..
सबसे ज्यादा बार तुम ही जीते थे..
और उस १ रुपये को तुम खर्च न करके..
किसी ज्वेलरी के पुराने हो चुके पर्स की गुल्लक बना के उसमें रखते थे..

अब मैं विस्मित हो उठा..
हे भगवान् कौन है जो मेरे बारे में इतना जानता है..

वो बोलता रहा..
अबे पतंग वतंग उड़ाते हो..
या आज भी बस छत पर बैठ दूसरों की पतंगे ही ताकते हो..

मैंने मन ही मन कहा अब टाइम ही कहाँ है..
मेरी सिगरेट अब ख़त्म हो चुकी थी..
इस से पहले कि मैं दूसरी जलाता वो बोला..
याद है जब पापा घर में सिगरेट पीते थे तो तुम उनसे कितना चिढ़ते थे..
और मम्मी से रोज उनकी शिकायत भी करते थे..
मैंने सिगरेट वापस पैक में रखी..और तुरंत टोर्च के लिए मोबाइल लेने अंदर चला गया..

उसकी आवाज मेरे कानों में पड़ती रही..

अबे अभी भी वक़्त है..
सुधर जाओ..
क्या हाल बना लिया है..
25 की उम्र में 35 के दिखते हो..
बाल उड़ने लगे हैं..
पूरे दिन सोये से दिखते हो..
याद है साले तुम कॉलेज फेस्ट के लिए..
लोकल हलवाइयों से और नेताओं से..
लाख रुपये की फंडिंग जुगाड़ लाये थे..
कहाँ गया वो बिजनेस आईडिया जो तुम कैंटीन में बैठ के सुनाते थे..
और प्लेसमेंट होने के बाद तक कहते थे कि तुम इसे pursue जरूर करोगे..
कहाँ गया तुम्हारा सेल्फ कॉन्फिडेंस
जिस से तुम दुनिया जीतने के सपने देखा करते थे..
तुम साले दोस्तों में लीडर हुआ करते थे..
और आज ये हाल है..
कि ५ दिन स्ट्रेस में रहते हो और बाकी २ दिन नशे में..

मैं मोबाइल में टोर्च जलाता हुआ तेजी से बालकनी की तरफ आया..
कि ये है कौन जो मेरे बारे में इतना सब जानता है..
और ये होता कौन है मुझे चैलेंज करने वाला..
मेरी लाइफ है..मैं चाहे कुछ भी करूँ..

उसकी आवाज अब नहीं आ रही थी..
पर मैं महसूस कर सकता था वो उधर ही है..
मैंने टोर्च उस बालकनी की तरफ की..
पर मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया..
मैंने कोने तक गया..तब भी कोई आवाज नहीं..

अचानक आसमान में बिजली चमकी...
और मुझे पड़ोस वाली बालकनी में वो खड़ा हुआ दिखा..
उसके हाथ में बल्ला था..
और वो गुड्डू ही था..
वो मैं ही था..

अगली बिजली कड़कने पर वो वहाँ नहीं था..

मैं चुपचाप बिस्तर पे पड़ा पड़ा सोचता रहा..
कि मैं अगर वो हूँ..तो मैं अब क्या हो गया हूँ..

बचपन था तो अपने घर की छोटी सी क्यारी में किसानी कर लेते थे..अब अरसा हुआ एक पौधा तक नहीं लगाया..हमारा सेंस ऑफ़ नेचर लगभग खत्म हो गया है.

ऐसा लगता है मानो हमने मान लिया है कि ये धरती और इस पर रहने वाले सब जीव जंतुओं का इस धरती पर कोई अधिकार नहीं है। मैं उस समाज से आता हूँ जिसमें सुबह चींटियों को आटा चिड़ियों को दाना गाय को रोटी भैंस को सब्ज़ी/फलों के कटे छिलके बंदरों को केले खिलाता आदमी आपको हर गली में मिल जाएगा। अगर खुद चाय बिस्किट खा रहा होगा तो 2 4 बिस्किट बराबर में बैठे कुत्ते को भी डाल देगा। घरों में चिड़िया अगर घौंसला बना ले तो घर का छोटे से छोटा मेंबर भी ख्याल रखता है कि कहीं उसके बच्चे घौंसले से बाहर न निकल पड़ें।

हम अपने समाज की कई खूबियों को फोरग्रान्टेड ले लेते हैं। नेचर के साथ इतना सामंजस्य यूँ ही नहीं बन जाता।

कभी कभी मुझे लगता है कि इस समाज को सच में एक नए सिरे से पुनर्जागरण की जरूरत है। हमारी जिन चीजों को पिछड़ा बता के हम पर कुछ भी थोप दिया जाता है..कोई तो ऐसा गुरु आये जो लॉजिकल ढंग से तर्क दे और हमारे संस्कृति विस्तार को एक सिरे से समझाए।

हर समाज एक मंथन के दौर से गुजरता है..हर देश भी गुजरता है..पर हमारे यहां मंथन शुरू होने से पहले ही समाज को विभाजित किया जाता है। हमको एक देश के तौर पर अपनी कुछ कोर वैल्यूज तय करनी होंगी। मेक इन इंडिया..स्टार्ट अप इंडिया..डिजिटल इंडिया की नींव वही कोर वैल्यूज बनेगी।

दुनिया के सारे देश इस वैश्विक दौर में प्रोडक्ट ही हैं। अब हमको तय करना है कि हम अपना प्रोडक्ट बाकी से बेहतर..बाकी से कूल..बाकी से एडवांस कैसे बनाते हैं :)
Pune

#‎Be_in_touch‬
ये कहानी है उस दौर की..
जब कॉलेज में २ कंपनियां आके चली गयीं थी...
और मेरा प्लेसमेंट अभी नहीं हुआ था
हौसला बढ़ाने के लिए घर पर माँ थी ..
और महीने में एक बार फोन करके पैसे हैं कि नहीं पूछने वाले पिताजी भी..
पर मैं उन्हें अपनी मनोदशा बताना नहीं चाहता था ..
हाँ एक और भी तो थी मेरे पास..
जो सब जानती थी .
जो हिस्सा रही है इस सफर का..
2007 से 2011 तक..
कहानी अब 2008 में हैं..
जब इंजीनियरिंग कॉलेज में एक साल पूरा हो चूका था..
और तमाम रैगिंग और शुरूआती इंटेरक्शंस के बावजूद..
मैं किसी से भी ज्यादा घुल मिल नहीं पाया था..
वो थी मेरे ही आस पास.
कई बार बुक बैंक में नज़रें मिली..
कई बार एक ही टेबल पर आमने सामने पढ़े..
नेस्कैफे पर एक ही ग्रुप में खड़े हो कॉफी पी थी..
पर मैं सिर्फ उसका नाम ही जान पाया था..
और ये भी श्योर नहीं था ..कि वो भी मुझे नाम से जानती है क्या....
मुझे याद है...
मेरी और उसकी बॉन्डिंग पहली बार..
एनुअल कॉलेज फेस्ट में हुई थी..
जब हम दोनों ही नीली जीन्स और ग्रे टी शर्ट में कॉलेज आये थे..
और कॉलेज रॉक बैंड के परफॉर्म करने पर..
भीड़ से पीछे की तरफ खड़े हो..
बाकी लोगों को सर हिलाते और नाचते देख रहे थे..
शायद मन था भीड़ में शामिल होने..
शायद झिझक भी थी..
इसीलिए हर बीट पर..दोनों के दाहिने पैर टैप कर रहे थे..
तब तुमसे पहली बार बात हुई थी..
मैंने सीधे तुम्हारा नाम ही लेके बातें शुरू की थी..
और उन लोगों पे जोक मारा था..
जो नाच रहे थे हैड बैंगिंग करते हुए..
तुम खिलखिला के हंसी थी..
फिर तुमने मुझसे पूछा..
मैं रेगुलरली बुक बैंक क्यों नहीं आता हूँ..
और मैंने जवाब दिया था...बस यूं ही..
तुम फिर से मुस्कुराईं थीं..
उस दिन हमने फोन नंबर भी एक्सचेंज किये..
और फैस्ट ख़त्म होने के बाद..
मैं इधर उधर की बातें करता हुआ..
तुम्हारे साथ वाक् करते हुए तुम्हारे हॉस्टल के गेट तक गया था..
तुम मेरे फ़ालतू जोक्स पर भी हंसती रहीं थीं..
उस शाम मैंने सिगरेट नहीं पी..
और रात में तकरीबन १२:३० बजे..
अपने नोकिआ ११०० से "It was nice talking to you " मैसेज किया था..
फ़ौरन मेरे फोन की बीप बजी..और मैंने उत्सुकता से मोबाइल देखा..
वो मैसेज की डिलीवरी रिपोर्ट थी..
उन दिनों मोबाइल में मैसेज बीप बजना..
एक अलग ही अहसास होता था..
२ मिनट बाद ही तुम्हारा रिप्लाई आया.."same here :)  "
फिर अगले दिन मैं अपने रूम पार्टनर की प्रेस की हुई शर्ट पहन कॉलेज पहुंचा था..
और हमारी बातों के सिलसिले उस दिन से शुरू हो गए थे..
कैंटीन से लेके..कॉफ़ी तक..
और लैब से लके बुक बैंक तक..
हम साथ ही रहते..
और कॉलेज से लौटने के बाद..
मोबाइल पर मैसेज..
मुझे याद है.. तुम कैसे पढ़ते वक़्त अपनी उँगलियों में पैन घुमाया करती थीं..
और न्यूमेरिकल सॉल्व करते वक़्त कैसे अपने बालों की लट को कान के पीछे ले जाया करतीं थीं..
तुम कुछ पूछ न लो इस डर से मैं भी पहले से ही पढ़ के आया करता..
और बुक बैंक में नज़रे बचा कर बस तुम्हे देखता..
मुझे आज तक याद है..
कि कैसे मैं कोशिश करता था कि फ़ोन मेमोरी फुल होने पे..
मैं तुम्हारे मैसेज डिलीट न करूँ..
कभी सिम में ट्रांसफर करूँ..
तो कभी ड्राफ्ट बना के सेव कर लूँ..
वो साथिया की रिंगटोन जो तुमने सेंड की थी..
वो तब तक मेरी रिंगटोन रही..
जब तक वो फोन मेरे पास रहा ..
मुझे याद है कि कैसे तुम कहतीं थी..
कि हर कैसेट में दूसरा गाना बैस्ट होता है..
मैं नहीं भूल सकता वो शाम..
जब हम पहली बार फिल्म देखने गए थे..
मैंने दोस्त की CBZ उधार ली थी..
और फिल्म से लौटते वक़्त बस अड्डे के पास गोल गप्पे खाए थे..
उस शाम जब मैंने तुम्हे हॉस्टल छोड़ा था..
तब कैसे हॉस्टल की एंट्री के पास..
हमने घंटों बेवजह की बातें की थीं..
तुम अंदर नहीं जाना चाहती थीं..
और मैं भी वापस नहीं जाना चाहता था..
बातों बातों में रात का 1 बज गया था..
उस दौर में नींद भी कहाँ आती थी..
मैं नहीं भूल सकता वो अनगिनत बार जब तुमने कहा था..
कि मेरे जैसे लोग इस दुनिया में रेयर हैं..
और कैसे तुम लकी हो मुझ जैसा दोस्त पाके..
अगले ३ साल हम साथ साथ ही थे..
कई बार लड़े..पर हर बार या तो तुमने या मैंने एक हफ्ते की ख़ामोशी के बाद..
बात करने की शुरुआत कर ली..
आखिरी सेमेस्टर से पहले तक सब ठीक ही चला..
तुम कैट की तैयारी करती रहीं..
और मैं कैंपस प्लेसमेंट की..
याद है जब कंपनी आने का नोटिफिकेशन हम दोनों ने साथ ही नोटिस बोर्ड पे देखा था..
और कंपनी क्रिटेरिया में थ्रू आउट फर्स्ट क्लास माँगा था..
मैं उदास हो गया था ये देख..और तुम्हारी आँखों में चमक थी..
तुमने कहा था कि चलो अच्छा है कम्पटीशन कम हो जाएगा..
पर तुम मेरी आँखें नहीं पढ़ पायीं थी..
ख़ैर मैंने भी कभी बताया नहीं..
कि कैसे सेमेस्टर के पेपरों में..
मेरा Stone (पत्थर
का ऑपरेशन हुआ था..)
और मैं कम्पटीशन से बिना फेल हुए ही बाहर हो गया..
जिस दिन इंटरव्यू हुए..
मैं कॉलेज ही नहीं आया..
तुम्हें बेस्ट ऑफ़ लक का मैसेज किया..
और बैठा रहा हॉस्टल के कमरे में..
शाम को तुम्हारा मैसेज आया..सिलेक्टेड..
मैंने congrats रिप्लाई किया..
और तुमने नाम गिनाये कि किस किस का सिलेक्शन हुआ है..
२ दिन बाद तुम्हारे साथ सेलेक्ट हुए लोगों की पार्टी कि खबर भी ऐसे ही उड़ते मिली..
अगली कंपनी आई..
उसमे भी वही क्रिटेरिया था..
मैं अब निराश हो चला था..
और तुम्हारे भी दोस्त बदल चुके थे..
अब तुम्हारे पास एक नया ग्रुप था..
वो लोग जो एक साथ उस कंपनी में प्लेस हुए थे..
और मेरे आस पास..
मेरी ही तरह हारे लोग..
जो   अपने परिवार के सपनों तले.. दबे थे..
आखिरी सेमेस्टर था..
इस बार तुम्हारे बुक बैंक के साथी भी बदल गए थे..
और मैंने भी बुक बैंक आना बंद कर दिया था..
अब मैसेज टोन भी कम ही बजती थी..
और साथिया वाली रिंगटोन मैंने सिर्फ तुम्हारे नंबर पर ही असाइन कर दी थी..
एक awkward सी ख़ामोशी आ चुकी थी हम दोनों के बीच..
मैं कई बार तुम्हे फोन करके रोना चाहता था..
अपनी असफलता की कहानियां सुनना चाहता था..
कई बार नंबर डायल करके रिंग जाने से पहले मैंने काट दिया..
वो अँधेरे के दिन थे..
फाइनल एग्जाम वाले दिन हम लगभग एक अजनबी की तरह ही मिले..
तुमने पिछले ३ साल याद किये..
और मुझे बताया कि कैसे I have been the best person you have ever meet ..
हमने एक और बार कॉफ़ी साथ पी..
जो संभवतः हमारी आखिरी कॉफी थी..
मैं उस शाम जयदतर खामोश ही रहा..
जब कॉफ़ी ख़त्म हुई तो मैंने पूछा..
चलो हॉस्टल छोड़ देता हूँ..
तुमने मुस्कुरा कर कहा..नहीं..
अभी किसी के साथ मूवी का प्लान है..
उस "किसी" का अंदाजा मुझे भी था..
क्यूंकि वो नेस्कैफे के पीछे से शशांकित भाव से मुझे देख रहा था..
पर जिसकी वक़्त ने ली हो..वो दर्द से कराह भी नहीं पाता..
मैं चुप ही रहा..
और तुमने जाते जाते कहा ..
"Be in touch "
......................................................................................
आज अचानक बंगलौर में कोरमंगला में कॉफ़ी पीते तुम दिखीं..उसी "किसी" के साथ...और तुम्हारे सामने वाली टेबल पर बैठा मैं..अपने 3 और आईआईएम बैचमेट्स के साथ...2007-2011 सब आँखों के सामने तैर गया....तुम देख के भी खामोश रहीं..और मैं बिना किसी बात टेबल पर हाथ मार खिलखिला के हँसा...

#‎Memories_Unplugged‬
कभी कोशिश कि है अपनी परछाई पे पाँव रखने की,
मुझे पसंद है परछाइयों का लम्बे होते जाना..
कभी कभी लैंप की रौशनी में
पक्की दीवार पर बनती परछाई से
एक दुसरे को डराते डराते
मैं सच में डरने लगता था..
मुझे पसदं था आग लगी लकड़ी को गोल गोल जोर से घुमाना,
और उस से बनती गोल गोल लाल लाल कलाकारी से विस्मित होना..
नानी अक्सर डांट दिया करती थी ये सब करते वक़्त
ये भी कहते हैं जो बच्चे आग से खेलते हैं वो रात में बिस्तर पर सू सू भी करते हैं..
मुझे पता था की तर्कहीन बात थी,
लेकिन मैं रिस्क भी नहीं लेना चाहता था..
झू जू के पैयां के खेलना लगभग रोज रात को सोने से पहले का शौक था,

बाकी बच्चों से अलग में दूध बहुत चाव से पीता था,
और कॉम्प्लान वाले बच्चों को देख कर मुझे अचरज होता था..
रात को सरसो के तेल वाले दिए से पीतल के बेले पे नानी काजल तैयार करती थी,
मैं बिलख के नाना से कहानी सुनने के वादे पे काजल लगवा लेता था..
कभी कभी सुबह को आँखे चिपकी हुई मिलती थी,
जिन्हे नानी चाय की पत्ती के गुनगुने पानी से खुलवाती थी..
ये कुछ उस दौर की ही यादें हैं,
जब लोग सच्चे और मकान कच्चे हुआ करते थे  <3

किसने सोचा था गुजरात के वडनगर में आज के ही दिन पैदा हुआ एक अतिसामान्य परिवार का वो बच्चा, जिसकी बहुत ही अभावो और तकलीफो में परवरिश हुयी,
अपने बाल्यकाल में ही वो बालक संघ की शाखाओ से जुड़ा, युवावस्था में आते आते उनके मन में देश की लगातार हो रही दुर्दशा देखकर बहुत पीड़ा रही होगी,
फिर देश बनाने के इरादे को लेकर एक दिन वो नवयुवक नरेंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक बन देश की सेवा करने अपने घर परिवार का त्याग कर निकल पड़ा,
संघ के प्रचारक बन कर उन्होंने देश के लगभग हर प्रान्त का दौरा किया, हर जगह की संस्कृति, सभ्यता, व्यवहार, व्यापार, लोगो की तकलीफे और जरूरते समझी, फिर धीरे धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक से भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तक का सफर तय कर लिया,
उनके इस रास्ते में सैकड़ो बाधाएं, परेशानियाँ आई होंगी, लेकिन बिना रुके, थके, हारे सारी मुश्किलो का सामना करते हुए उस व्यक्ति ने खुद की कड़ी मेहनत और अर्जित किये ज्ञान से खुद को इतना मज़बूत बना लिया कि, जब वो पहली बार विधानसभा गये तो सीधे मुख्यमंत्री बनकर और पहली बार लोकसभा गये तो सीधे प्रधानमंत्री बन कर.....
उनका सफ़र लिखने में तो आसान सा लगता है, लेकिन व्यवहारिक रूप से इस सफ़र को तय करना किसी सामान्य इंसान के बस की बात नहीं है,
उनमें आज भी एक बच्चे की तरह नयी नयी तकनीको को सीखने की जिज्ञासा है, युवाओ से ज्यादा ऊर्जा और उत्साह है,
वो आज देश के युवाओ के प्रेरणास्त्रोत्र बन चुके हैं, ऐसे
दृढ़ इरादो वाले हमारे माननीय प्रधानमंत्री "श्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी जी" को उनके जन्मदिवस पर कोटि कोटि बधाइयाँ,
और आज ही सृष्टि के शिल्पकार विश्वकर्मा जी की जयंती है और आज ही विध्नहर्ता गणेश जी की चतुर्थी भी,
ईश्वर से यही कामना है विध्नहर्ता गणपति आपको देश के सारे विध्न दूर करने की शक्ति दें और सृष्टि के शिल्पकार विश्वकर्मा जी एक नए भारत को गढ़ने में आपको अपना आशीर्वाद

बाबर के वंशजों को भी अपना हिस्सा चाहिए था उन्होंने पाकिस्तान बांग्लादेश ले लिया...अब अपने आप को पटेल के वंशज बताते हुए आरक्षण की मांग है..क्या हो अगर कल भगत सिंह के नाम पर..सुभाष बाबू के नाम पे..अशफाक उल्ला खान के नाम पे..लाल बहादुर शाश्त्री के नाम पे..चंद्रशेखर आज़ाद के नाम पे..अब्दुल कलाम के नाम पे..वीर अब्दुल हमीद के नाम पे..इतिहास पुरुष महाराणा प्रताप के नाम पर..हिन्दू गौरव पृथ्वीराज चौहान और वीर शिवाजी के नाम पर...गुरुनानक के नाम पर भी आरक्षण माँगा जाएगा...व्यक्तिगत राजनैतिक आकांक्षा में शर्म तो ख़ैर बची नहीं है पर क्या बेशर्मी इतनी सामूहिक हो सकती है.......

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All time sweets song..The legend of India!
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