Profile cover photo
Profile photo
purushottam kumar sinha
167 followers -
रात के ख़्याल फिर इक नयी रात है.. एक ख्याल है..इक बात है..कोई चेहरा है धुंधला सा..कुछ जाना सा पहचाना सा..आज ये सब मेरे साथ है मेरे...
रात के ख़्याल फिर इक नयी रात है.. एक ख्याल है..इक बात है..कोई चेहरा है धुंधला सा..कुछ जाना सा पहचाना सा..आज ये सब मेरे साथ है मेरे...

167 followers
About
Posts

Post has attachment
विरह के पल
विरह के पल
purushottamjeevankalash.blogspot.com
Add a comment...

Post has attachment
वो भूली सी दास्ताँ
वो भूली सी दास्ताँ
purushottamjeevankalash.blogspot.com
Add a comment...

Post has attachment
purushottam kumar sinha commented on a post on Blogger.
बहुत ही प्यारी रचना....दो तट के विरह गमन का अलौकिक वर्णन....साधुवाद स्वीकारें
Add a comment...

Post has shared content
स्वार्थ
शायद, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं.... तेरी मोहक सी मुस्काहट में, अपने चाहत की आहट सुनता हूं तेरी अलसाए पलकों में, सलोने जीवन के सपने बुनता हूं, उलझता हूं गेसूओं में तेरे, बाहों में जब भी तेरे होता हूं, जी लेता हूं मैं तुझ संग, यूं सपने जीवन के संजो...
स्वार्थ
स्वार्थ
purushottamjeevankalash.blogspot.com

Post has attachment
स्वार्थ
शायद, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं.... तेरी मोहक सी मुस्काहट में, अपने चाहत की आहट सुनता हूं तेरी अलसाए पलकों में, सलोने जीवन के सपने बुनता हूं, उलझता हूं गेसूओं में तेरे, बाहों में जब भी तेरे होता हूं, जी लेता हूं मैं तुझ संग, यूं सपने जीवन के संजो...
स्वार्थ
स्वार्थ
purushottamjeevankalash.blogspot.com
Add a comment...

Post has attachment
स्वार्थ
शायद, मैं तुझमें अपना ही स्वार्थ देखता हूं.... तेरी मोहक सी मुस्काहट में, अपने चाहत की आहट सुनता हूं तेरी अलसाए पलकों में, सलोने जीवन के सपने बुनता हूं, उलझता हूं गेसूओं में तेरे, बाहों में जब भी तेरे होता हूं, जी लेता हूं मैं तुझ संग, यूं सपने जीवन के संजो...
स्वार्थ
स्वार्थ
purushottamjeevankalash.blogspot.com
Add a comment...

Post has attachment
purushottam kumar sinha commented on a post on Blogger.
बहुत ही सुंदर चिंतन। गहरी निराशा और जीवन की आशा, उडते धुएँ सी पिपासा....हर बात निराली....👌👌
चार पाए
चार पाए
kalprerana.blogspot.com
Add a comment...

Post has shared content
कोलाहल
वो चुप था कितना, जीवन की इस कोलाहल में! सागर कितने ही, उसकी आँचल में, बादल कितने ही, उस कंटक से जंगल में, हैं बूंदे कितनी ही, उस काले बादल में, फिर क्यूं ये विचलन, ये संशय पल-पल में! वो चुप था कितना, शोर भरे इस कोलाहल में! खामोश रहा वो, सागर की तट पर, चुप्प...
कोलाहल
कोलाहल
purushottamjeevankalash.blogspot.com

Post has shared content
कोलाहल
वो चुप था कितना, जीवन की इस कोलाहल में! सागर कितने ही, उसकी आँचल में, बादल कितने ही, उस कंटक से जंगल में, हैं बूंदे कितनी ही, उस काले बादल में, फिर क्यूं ये विचलन, ये संशय पल-पल में! वो चुप था कितना, शोर भरे इस कोलाहल में! खामोश रहा वो, सागर की तट पर, चुप्प...
कोलाहल
कोलाहल
purushottamjeevankalash.blogspot.com

Post has attachment
कोलाहल
कोलाहल
purushottamjeevankalash.blogspot.com
Wait while more posts are being loaded