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Sanjay Krishna
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डोंबारी बुरू बिरसा मुंडा के जन्म स्थान उलिहातु से थोड़ी दूर है। उस ऐतिहासिक युद्ध की स्मृति में उस पहाड़ पर एक विशाल स्तंभ निर्माण मुंडारी भाषा के विद्वान जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से किया गया।
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डोंबारी बुरू : जहां हुआ थाा अंतिम उलगुलान, पर आज है उपेक्षित
बिरसा मुंडा की अंतिम लड़ाई का गवाह उपेक्षा का शिकार -बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति ने कराया था निर्माण -समिति के सचिव थे डॉ रामदयाल मुंडा -तत्कालीन मंडलायुक्त सीके बसु ने किया था स्मारक का उद्घाटन -9 जून, 1991, बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर हुआ था लोक...
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अलबर्ट जिस खपरैल के मकान में पैदा हुए थे, वह मकान भी ढह रहा है। यहां कोई नहीं रहता। कुछ गांव में ही 1994 में बने मकान में रहते थे। अब उस पुश्तैनी मकान को देखने वाला कोई नहीं। अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना एक्का रुआंसे गले से गुहार लगाती हैं कि उनका वह पैतृक खपरैल का मकान बन जाए।
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दो साल में भी नहीं बन सका अलबर्ट एक्‍का का स्‍मारक
बड़े ताम-झाम के साथ रांची राजधानी से 175 किमी दूर परमवीर अलबर्ट के गांव जारी में उनकी जमीन पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्मारक समाधि-शौर्य स्थल का शिलान्यास किया था। यह तारीख थी, तीन दिसबंर, 2015। तीन दिसंबर को ही अलबर्ट देश के लिए शहीद हो गए थे। साल था 1971...
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हुकूमत हमेशा झूठ बोलती है। जनता एक न एक दिन अपने खून का हिसाब मांगती है, उसे जिस दिन यह विश्वास हो जाएगा कि अलगाव की बात करने वाले गिरोह-स्वार्थ की संहिता का पालन कर रहे हैं, वह उन हुकूमतों को इसी तरह दफना देगी, जैसे बांगलादेश में हो रहा है। एकता एक दूसरे की मदद से बेहतर जीवन जीने के बुनियादी प्रश्न पर टिक सकती है। यदि ऐसा नहीं है तो वह नकली एकता है।
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थाक-थाक तोमार घोड़ागाड़ी आमरा हेंटे इ जाबो
डॉ शिवप्रसाद सिंह  बंगलादेश में चलने वाले स्वाधीनता-संघर्ष में हंसते-हंसते मरने वाले लोगों के बारे में मैं जब भी कोई बयान पढ़ता हूं, मुझे रवि बाबू का गीत याद आने लगता है कोन कानने जानिने फूल गंधे एत करे आकुल कांन गगने उठे रे चांद एमन हांसि हंसे ओ मां आंखि ...
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गोपाल दास मुंजाल और बलवीर दत्त दोनों जन्मना पंजाब (अब पाकिस्तान) के पंजाबी भारतीय लेखक, संपादक, पत्रकार, साहित्यकार और राँची निवासी हैं। दोनों जयपाल सिंह से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। गोपाल दास मुंजाल की 16 जनवरी 1955 अंक 3 ‘अबुआ झारखण्ड’ जयपाल सिंह विशेषांक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुई। इसमें आवरण पृष्ठ पर लिखा है - ‘मुण्डा जाति का अनमोल रत्न’ - ‘लाखों लाख झारखण्डियों के मरङ गोमके श्री जयपाल सिंह जिन्होंने राजनीतिक महारथियों को विस्मय चकित सा कर रखा है।’
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अपने अपने जयपाल सिंह
प्रो गिरिधारी राम गौंझू गोपाल दास मुंजाल और बलवीर दत्त दोनों जन्मना पंजाब (अब पाकिस्तान) के पंजाबी भारतीय लेखक, संपादक, पत्रकार, साहित्यकार और राँची निवासी हैं। दोनों जयपाल सिंह से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। गोपाल दास मुंजाल की 16 जनवरी 1955 अंक 3 ‘अबुआ झारख...
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सरवदा का चर्च आज भी खड़ा है और उसके परिसर में कई पत्थगड़ी में वहां का इतिहास भी दर्ज है। यहीं पर उसी समय का एक स्कूल भी है, जहां के बच्चे नंगे पैर हॉकी स्टीक लेकर दो मैदानों में एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते हुए एक दूसरे को हराने के लिए पसीना बहाते हैं।
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बिरसा का गांव
सरवदा चर्च पर पहला तीर चलाया गया खूंटी गांव कांप उठा। डिप्टी कमिश्नर आए। वह बिरसा का पीछा कर रहे थे। बुद्धिमान लोग (बिरसा के अनुयायी) डोम्बारी पहाड़ पर चले गए। उन लोगों ने  (ब्रिटिश सैनिकों का) मुंह बनाया और चुनौती दी। फौजों (ब्रिटिश) ने उन पर गोलियां चलाईं...
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