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Vaibhav Anand
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बहुत ही अच्छा...
बदनाम बस्ती...!
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ये आप बताएं....?
इक गुलशन था,  थोड़ा उजड़ा थोड़ा हरा-हरा था उसमें बरगद सी मां थीं मैं गुलाब का पौधा था पीपल जैसे पिता सूख कर टूट चुके थे गुलशन में  दो नन्हीं परियां रहती थीं... बरगद और गुलाब से दोनो काफी घुली-मिली थीं एक दिन एक माली आया परियों को लेकर चला गया बरगद आधा सूख ग...
ये आप बताएं....?
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अंजाम की फिक्र...!
तुम क्या गए, रौनकें गईं      इस जहान की, ज्यों चांद छोड़ गया महफिल आसमान की। वो तोड़ आया सारे रिश्ते          एक पल में, अब ढूढ़ता निशानी        खुद के पहचान की। बबूल के शूलों ने उसकी तक़दीर क्या लिखी, वरना वो भी बेल थी,             मेरे मचान  की । जब उधर स...
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हवा के रुख का मारा वो...
किनारों से टकरा के              समंदर टूट जाता है, मगर पत्थर पे सर देने से  कब वो बाज आता है। माना हर कहानी                सच नहीं होती,मगर,  हर नया किरदार            ज़ेहन में घर बसाता है। जुदाई क्या है                       ये उनसे ज़रा पूछो, जिनका कोई अज...
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धरती के खुदा!
मेरे ऊपर भी एक खुदा है जो ना जप से ना तप से ना भोग से खुश होता है। ना नमाज़ उसे भाती है, ना अज़ान उसे लुभाती है। उसे रुपयों का भोग चाहिए, नोटो की गड्डियां नमाज़ के बदले चाहिए। मैं उसकी भूख का तोड़ ढूढ़ने निकला था, मगर सारे रास्ते रुपयों पे जाके खत्म होने लग...
धरती के खुदा!
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मैं कौन हूं?
उसकी यादों से           गुज़र
आया मैं तमाम खुश्बुओं से       नहा आया मैं। वो अपने रस्ते        जा चुका कब का उन्हीं रास्तों से      हाल पूछ आया मैं। कुहुक उठती थी     जिस
राग में कोयल उन्हीं रागों को  वादियों से चुरा लाया मैं। इक कचहरी खुली थी     फैसले
के ...
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मेढकों को 'मुंह' कौन लगाता है
वो, हर उस खेल में, मुझसे जीत जाता है जहां उसे ' खुद ' को उठाना, मुझे गिराना आता है। हूं परेशान,                   मैं अपनी हालत पर जिसपे दुनिया को हंसना ,       मुझे रोना आता है।   वो मेरा ' शागिर्द ' था,               अब ' सीख ' गया है तमाम चालें,    जिसे ...
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दुनिया फतह का सपना...
तुम्हारी सोच एक दिन मैं बदल दूंगा। तुम्हारे दिमाग में मैं अपनी सोच के ' पारे ' भर दूंगा। बिना नारों बिना वादों के। बस थोड़ी सी ' चिंगारी ' उठने का इंतज़ार करो। उस से मैं ' आग ' जलाऊंगा तब पका दूंगा... ' घालमेल की खिचड़ी ' और फिर तुम जनम-जनम से भूखे किसी 'कु...
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दुनिया फतह का सपना...
तुम्हारी सोच एक दिन मैं बदल दूंगा। तुम्हारे दिमाग में मैं अपनी सोच के ' पारे ' भर दूंगा। बिना नारों बिना वादों के। बस थोड़ी सी ' चिंगारी ' उठने का इंतज़ार करो। उस से मैं ' आग ' जलाऊंगा तब पका दूंगा... ' घालमेल की खिचड़ी ' और फिर तुम जनम-जनम से भूखे किसी 'कु...
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रोज जियो, रोज मरो..
आप रहते हैं झोपड़े मेें... तो एक बात क्यों नहीं आती आपके 'खोपड़े' में। महलों के सपने देखना बंद क्यों नहीं करते। आज भी सामंत हैं जो आपको अपनी 'रियाया' समझते हैं और आप हैं कि खुद को 'राजा' समझते हैं... बंद करो ये दिवास्वप्न मध्यमवर्गीय लोगों। तुम प्राचीन काल ...
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