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NISHA CHOUDHARY
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कहदे कोई इस पल को 
गुज़रना न था 
हर पल की तरह 
साँसोँ को थमना न था 
मुस्कान को ठहरना न था 
ज़िन्दगी चलती रहे 
हर इन्सान की तरह 

ख़्वाहिशोँ का समंदर था 
आसमान की तरह 

घुँघरुओँ की झंकार थी 
चूड़ियोँ की खनक थी 
बिन्दी की चमक थी 
ख़ुशबुओँ की बौछार थी 
श्रंगार की तरह 

सुलझी सी उलझन मेँ 
उम्मीदोँ की बारिश थी 
ख़्वाहिशोँ की तरह 

आइना था असमंजस का 
बौराए से फैसलोँ मेँ 
दृढता थी 
अजब सी सशक्त भाव थी 
व्यवधान की तरह । 
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कभी बेबस सी... 
तो कभी शर्मिँदा सी 
है ज़िन्दगी यहाँ 
है बड़ी ही बेकार सी 
इक गुनहगार सी 
एहसास ये 
ज़िन्दगी यहाँ 

रौँद दी अस्मतोँ को 
फ़क्र से 
इक बार भी उनको 
न याद आई 
अपनी माँ कभी 
बस रौँदते चले गए 
बहनोँ को ..... 
. जिन पर बीता 
वो तो जर्जर 
हुईँ ही हर बार है 
सुनकर भी आँखेँ नम हुईँ 
दिल भी सहम सा जाता 
हर बार है 

रुह को भेदती 
छलनी छलनी करती 
इन बातोँ से 
ज़िन्दगी हुई शर्मसार है 

हर बार...... 
हर बार 
नुक़्स निकाली जाती 
पीड़िताओँ की 
ख़ुद की 
विकृतियोँ को 
छुपाने के लिए 
बस हो चुका बहुत है 
इन निर्मम हरकतोँ से 
बाज़ आ जाओ 
ओ कमीनोँ..... 


¤¤¤ निशा चौधरी ।
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नभ मंडल शोभित तारिका से 
अश्रु राग अश्रु ही लय थे 
तब अश्रु सुर मेँ डूबी चंद्रिका थी 
व्योम की छटा निराली थी 
श्याम वारिद श्याम नभ 
श्याम दृगोँ मेँ शोभायमान थे 

स्वप्न लोक मेँ डूबी फिर भी 
स्वप्न संजोए तुम्हारी थी 

गतिमान थी धरा धुरी पे जैसे 
वैसे ही मन चंचल था 
अधरोँ पर मुस्कान अति 
और करोँ मेँ पुष्प विहंगम थे 

स्वप्न लोक मेँ डूबी फिर भी 
स्वप्न संजोए तुम्हारी थी 

सप्त तुरंग इंद्रियोँ के जैसे 
वश मेँ नहीँ अब मेरे थे 
अरण्य मन का घोर हुआ था 
विहगोँ की किलकारी थी 
तरणी बन तटिनी के तट पर 
कैवल्य की चाह सुनहरी थी 

स्वप्न लोक मेँ डूबी फिर भी 
स्वप्न संजोए तुम्हारी थी । 

¤¤¤ निशा चौधरी ।
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स्वयं की प्रतीक्षा मेँ
आँखेँ जाग रहीँ रात भर
नीँद आती 
पर बिना कुछ कहे
चली जाती
कभी कभी मेरे साथ 
वो भी जगी रही
सहायक बनी रही मेरी
पूरी रात
शायद उसे भी
नीँद नहीँ आ रही
या शायद वो भी
उस क्षण को 
खोना नहीँ चाहती
जिसमेँ मैँ स्वयं से मिलूँगी

सदियाँ बीत गई 
मगर यह तथ्य ना बदला
कि '' मैँ '' को हमेशा
स्वयं की ही
तलाश होती है ।

¤¤¤¤ निशा चौधरी ।
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सच है बिल्कुल 
मान लिया है 
कि अब तुम मेरे , 
जीवन मेँ नहीँ 

पर ये भी क्या सत्य नहीँ 
कि मैँ भी अब तुम्हारे जीवन मेँ नहीँ ? 

तुमने भी खो दिया है , मुझको ? 
मेरे जैसी तो 
तुम्हे कोई और 
मिल ही नही सकती 
तो तुम भी सीख लो 
मेरे बिना रहना 
अपने नसीब पे रोना 
अपने नसीब को कोसना 
मेरे जीवन की करोड़ोँ खुशियाँ 
पर तुम्हारे ऐसे नसीब कहाँ 
कि मेरे खुशियोँ से जुड़ सको 

शुक्रग़ुज़ार हूँ उन लम्होँ का 
जिसमेँ तुम मुझसे दूर गए 
दु:खद एहसास तो था 
तुम्हारे जाने का 
मगर अब खुश हूँ 

क्योँकि.... शायद 
मेरे नसीब अच्छे हैँ 

¤¤¤ निशा चौधरी
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स्वयं की प्रतीक्षा मेँ
आँखेँ जाग रहीँ रात भर
नीँद आती 
पर बिना कुछ कहे
चली जाती
कभी कभी मेरे साथ 
वो भी जगी रही
सहायक बनी रही मेरी
पूरी रात
शायद उसे भी
नीँद नहीँ आ रही
या शायद वो भी
उस क्षण को 
खोना नहीँ चाहती
जिसमेँ मैँ स्वयं से मिलूँगी

सदियाँ बीत गई 
मगर यह तथ्य ना बदला
कि '' मैँ '' को हमेशा
स्वयं की ही
तलाश होती है ।

¤¤¤¤ निशा चौधरी ।
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नफ़रत 
यूँ ही रहने दो
अपनी आँखोँ मेँ
इन्हेँ देखकर अच्छा लगता है
अच्छा लगता है कि
नफ़रत ही बन कर सही
आख़िर हूँ तो इनमेँ

¤¤ निशा चौधरी ।
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सिहरती सी नज़र आ रहीँ
अब ज़ंजीरेँ भी
उन्हेँ टूटने का हौसला मिल चुका है
टूट कर चूर चूर होती उसकी हर
एक कड़ी
शायद समाप्त कर दे
उसकी जकड़न का दर्द
मगर क्या निशान भी जा पाएँगे ?
हर निशान हर ज़ख़्म
याद दिलाता रहेगा
उन बीते दर्द को

वर्तमान का मलहम
कुछ ऐसा हो
कि
मलते ही हर बीते पल मिट जाएं

¤¤ निशा चौधरी ।
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उँघती साँसोँ पर अब भी
तुम्हारा ही रौब दिखता है
चंद उम्मीदेँ तुम्हारे होने की
मेरे इर्द गिर्द अब भी भटकते रहते हैँ
मेरे विचारोँ का तुम्हारी
इच्छाओँ से टकराना
दरकता है अब भी कोई शीशा 
चुभने को कलाई मेँ
मेरी रगोँ मेँ लहू बन कर
जब तक तुम समाए हो
बस तभी तक का साथ है
मेरे और उस लहू का
अब भी आसमान बरसता है
फ़र्क बस इतना है कि
ज़रिया मेरी आँखोँ को बना रक्खा है
फूल खिला करतेँ हैँ 
अब भी
पर आग की लपटेँ निकलतीँ 
दिखतीँ हैँ
उनमेँ से
जो जला कर राख़ कर जातीँ हैँ
राहोँ मेँ उगे नन्हे हरे भरे दूबोँ को
कुछ लपटेँ अभी भी बाक़ीँ हैँ
जो इतनी ऊँचीँ हैँ कि
हर वो मीठी सी तान
मीठी सी मुस्कान
मेरी ओर आती हुई
उसकी ओट मेँ छिप जातेँ हैँ
कराहतेँ हैँ अब भी वो 
सिसकते से गीत
मगर शब्दोँ की वो छुअन अब बहुत कंटीलीँ हो चुकीँ हैँ
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अंतिम चरण मेँ
व्यथित मन
वेदना से विदा लेकर
जा पहुँचा
देहरी पर अनंत के

अब निर्विकार हूँ
जीवित हूँ
तथ्य हूँ
मृत हूँ
हर जीवन का सत्य
पा रही ये आत्मा
परन्तु अब 
दिव्य हूँ
अलौकिक हूँ ......
.....अचंभित हूँ ......
कि
न तथ्य है , न सार है
न भेद है , न भाव है

परन्तु अंत निश्चित है

जीवन मिथ्य है
मृत्यु सत्य है

वो पयोद 
जिसके गर्जन से
जीवन आतंकित थे
उसे पाया 
जल चंचल मेँ कहीँ
जो मचा रही क्लेश धरा पे
वाष्प बन उड़ गयी वहाँ से

अंतिम चरण 
हर जीवन का तथ्य
अंत तो निश्चित है
परन्तु मानवीय अंत हो
परिभाषा सजीव हो

पुष्प की विकलता
शिला का घर्षण
वृक्ष की जर्जरता
मनुष्य की जर्जरता
अंत का ही तो सूचक है

अति जो जा पहुँचा
अनंत तक , वो भी
अंत के मुख मेँ ,जाने को 
आतुर है 

इस द्वार पर मैँ खड़ी
नि:शब्द हूँ ........

¤¤ निशा चौधरी ।
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