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Ravindra Singh Yadav
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हृदयस्पर्शी शब्दचित्र.

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मित्र-मंन्डली में प्रकाशित रचनाएं / लेख पाठकों को  विविध साहित्यिक रसास्वादन का मुक़ाम हैं.

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राही जी की लिखी पुस्तक समीक्षा रोचक है और पुस्तक को पूरा पढ़ने की उत्सुकता पैदा करती है.

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आदमी की जीजिबिषा उसे तैयार रखती है कांटों की चुभन से विचलित न होने की. अंतिम पंक्तियाँ भाव-गांभीर्य से लबालब हैं. विज्ञान के प्रोफेसर का हिन्दी की आधुनिक कविता में अनुभूति का ऐसा शब्दांकन हम सबको गहराई तक प्रभावित करता है.
एक प्रूफ रीडर के तौर पर एक गुस्‍ताखी कर रहा हूँ, कविता के तीसरे शब्द अनायस को अनायास हो जाने की गुज़ारिश करता हूँ. इस टिप्पणी को सुधार के बाद  हटा दीजियेगा. मैं पुनः टिप्पणी लिखने आऊँगा.

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ये कहाँ से आ गयी बहार ,
ये          कहाँ         से आ        गयी     बहार   है  , बंद                     तो   मेरी   गली   का  द्वार  है।  ख़्वाहिशें     टकरा     के चूर          हो         गयीं, हसरतों        का       दर्द अभी         उधार       है। नफ़रतों        के        तीर छल...

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सच और झूठ के बीच चल रही कशमकश को दर्शाती भावप्रवण रचना. अंततः जीत सच की ही हुई और होती रहेगी.

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माँ  के स्मरण  ने  आँखें  नम  कर दीं।  एक मार्मिक  रचना  जो बार-बार पढ़ने  को  आकृष्ट  करती है। माँ  को समर्पित  भाव  गाम्भीर्य  से  सराबोर स्तरीय रचना।

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वर्तमान परिवेश की चुनौतियों को उकेरती कविता प्रेरक है.
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