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Dinesh Saxena
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सखी,
नहीं विस्मृत कर पाया
तेरे प्रथम मिलन के क्षणों को
जब प्रथम दिन प्रथम बार
विघालय में मिले थे
तेरा वह अलकों को झुकाना
फिर उठाना,आगे बढ़ जाना

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कर्तव्य के सतपथ पर नहीं जानता की
वह कौन है...............
कोई शक्ति संजोय मानवाकृति या
कोई देवी...................

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रूप ------यौवन







तुम केवल विषय हो, या
कल्पना हो तुम स्वप्न लोक की
रूप -योवन तुम्हारा देख ...
मन्त्र मुग्ध हूँ ......................

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उकताई रात्री ने
उपन्न किया एक और
आवारा सूरज
प्रथम भोर से
अंत संध्या तक
भटकता ,उलझता रहा
इस आशा मे
कोण बदल बदल कर
देखता रहा क्षितिज को
मिल जाये कही आश्रय !!

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आज बरखा का
रुख देख,आवारा मन क्यों भटका
कभी इस गली ,कभी उस गली
कभी बारिश से भीग
कभी फूलों की महक में डूबा
कभी घनघोर रातों मे भटका
कभी इस गली ,कभी उस गली

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आज बरखा का
रुख देख,आवारा मन क्यों भटका
कभी इस गली ,कभी उस गली
कभी बारिश से भीग
कभी फूलों की महक में डूबा
कभी घनघोर रातों मे भटका
कभी इस गली ,कभी उस गली

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बादलों से ,
घिरा आकाश
झमाझम बारिश
धरती का मिटाती
बाँझ पन!!

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बादलों से ,
घिरा आकाश
झमाझम बारिश
धरती का मिटाती
बाँझ पन!!
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