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prabhat rai
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"As Secretary-General of the United Nations, I am committed to the empowerment and inclusion of every young person around the world"
- Antonio Guterres in a special message for Saturday's International Youth Day.

Today, half the world’s population is under 30, but there are over 600 million young people living in conflict-affected or fragile settings.

This #YouthDay, join us in empowering young people to be agents of change, to push for a seat at the peace table, and to reject messages of hate and fear.

Find out more: http://www.un.org/en/events/youthday/
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More than 1,000 commitments have been registered by governments, businesses and civil society to #SaveOurOcean. Some highlights:

- Ireland to legislate to ban microbeads in body care products
- South Africa to create 22 new marine protected areas
- Reef Life Foundation to use nanotechnologies to revive dead coral reefs with live cells

To join our efforts to #SaveOurOcean, register your commitment here: oceanconference.un.org
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"Green business is good business. Those who embrace green technology will set the gold standard as economic leaders."

Last week, United Nations Secretary-General António Guterres called on leaders of government, business and civil society to back ambitious action on climate change. Read his full speech here: https://www.un.org/sg/en/content/sg/statement/2017-05-30/secretary-general-climate-action-delivered
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To you, they are arms. To a child, they are so much more. A baby’s brain can form 1,000 new connections every second. That’s why early moments matter, so #EatPlayLove  boost your baby’s brain.

Learn more via +UNICEF : http://uni.cf/earlymoments

#EatPlayLove  
#EarlyMomentsMatter  
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स्वतंत्रता और परतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं

विनोबा भावे, अगर तुम सामने उनके रुपए ले जाओ, तो आंख बंद कर लेते हैं। आंख बंद करने की क्या जरूरत? मुंह फेर लेते हैं; रुपए से ऐसा क्या भय है? रुपए में ऐसा क्या है? ऐसे भी लोग तुम जानते हो जिंदगी में जिनको रुपया देखकर एकदम लार टपकने लगती है।


जिसको रुपया देखकर लार टपकती है उसमें और जो रुपया देखकर आंख बंद करता है, इसमें कुछ भेद है? दोनों पर रुपया हावी है। दोनों को रुपया प्रभावित करता है। रुपए का बल दोनों के ऊपर है, दोनों से कुछ करवा लेता है। किसी की जीभ से, किसी की आंख से, मगर दोनों से कुछ करवा लेता है। इससे क्या फर्क पड़ता है? फिर आंख भी क्यों बंद कर रहे हो? शायद कहीं भय होगा, ज्यादा देर देखा तो लार न टपकने लगे। नहीं तो आंख बंद करने की क्या जरूरत है?


एक सुंदर स्त्री पास से तुम्हारे गुजरती है, तुम झट से नीचा सिर कर लेते हो। क्या तुम सोचते हो यह ब्रह्मचर्य है? अगर यह ब्रह्मचर्य है, तो आंख नीची क्यों हो गई? चट्टान को देखकर तो तुम ऐसी आंख नीची नहीं करते, वृक्ष को देखकर तो आंख नीची नहीं करते, सुंदर स्त्री को देखकर ही आंख नीची क्यों हो गई?



तुम जब किसी सुंदर स्त्री को देखकर सिर झुका लेते हो या दूसरी तरफ देखने लगते हो, यह तुम्हारा सिर झुकाना और दूसरी तरफ देखना, सिर्फ तुम्हारे भीतर जलती हुई वासना की खबर देता है और कुछ भी नहीं सिर्फ प्रज्वलित वासना की। तो जो आदमी संसार छोड़कर भागता है, सिर्फ इतनी ही खबर देता है कि संसार में उसे बड़ी आसक्ति है; उसको हम विरक्त कहते हैं। जो आदमी स्त्री बच्चों को छोड़कर चला जाता है, उसको हम ब्रह्मचारी कहते हैं। छोड़कर जाने की जरूरत क्या थी? छोड़कर जाने का अर्थ है कि डर है, भय है।


मैं तुम्हें यह याद दिलाना चाहता हूं: स्वतंत्रता और परतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, विरक्ति आसक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भोगऱ्योग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब बोध होता है तो पूरा सिक्का गिर जाता है। एक पहलू तो कोई गिरा भी नहीं सकता; या कि तुम सोचते हो गिरा सकोगे? सिक्के का एक पहलू नहीं गिराया जा सकता। या तो पूरा सिक्का रखना होगा हाथ में, या पूरा छोड़ देना होगा, तुम बचा नहीं सकते आधा। तुम यह नहीं कह सकते कि हम एक तरफ का बचा लेंगे। एक तरफ का बचाओगे, तो दूसरी तरफ का भी बच जाएगा। हां, यह हो सकता है कि एक पहलू ऊपर रहे और दूसरा पहलू नीचे छिपा रहे, दिखाई न पड़े।


त्यागी में भोग छिपा रहता है, दिखाई नहीं पड़ता। भोगी में त्याग छिपा रहता है, दिखाई नहीं पड़ता। मैं तुम्हें एक बड़ी क्रांति की दृष्टि दे रहा हूं यह पूरा सिक्का ही व्यर्थ है। न तो परमात्मा ऊंचा है, न तुम नीचे हो। ऊंच नीच की बात ही व्यर्थ है। मैं तुम्हें कोई गौरीशंकर के शिखर नहीं दिखा रहा हूं।


कहै वाजिद पुकार 


ओशो  
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🌹महावीर ने कहा है, दुनिया में तीन तरह की मूढ़ताएं हैं🌹

भ्रांत दृष्टियां हैं। एक मूढ़ता को वे कहते हैं, लोकमूढ़ता। अनेक लोग अनेक कामों में लगे रहते हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि समाज ऐसा करता है; क्योंकि और लोग ऐसा करते हैं। उसको महावीर कहते हैं: लोकमूढ़ता। क्योंकि सभी लोग ऐसा करते हैं, इसलिए हम भी करेंगे!…सत्य का कोई हिसाब नहीं है–भीड़ का हिसाब है। तो यह तो भेड़चाल हुई।
दूसरी मूढ़ता को उन्होंने कहा देवमूढ़ता कि लोग देवताओं की पूजा करते हैं। कोई इंद्र की पूजा कर रहा है कि इंद्र पानी गिरायेगा; कि कोई कालीमाता की पूजा कर रहा है कि बीमारी दूर हो जायेगी। लोग देवताओं की पूजा कर रहे हैं।
महावीर कहते हैं, देवता भी तो तुम्हारे ही जैसे हैं! यही वासनायें, यही जाल, यही जंजाल उनका भी है। यही धन-लोलुपता, यही पद-लोलुपता, यही राजनीति उनकी भी है। तो अपने ही जैसों की पूजा करके, तुम कहां पहुंच जाओगे? जो उन्हें नहीं मिला है वह तुम्हें कैसे दे सकेंगे?
महावीर कहते हैं कि देवता का अर्थ है: होंगे स्वर्ग में, सुख में होंगे, तुमसे ज्यादा सुख में होंगे; लेकिन अभी आकांक्षा से मुक्त नहीं हुए।

तो महावीर कहते हैं, पहली मूढ़ता–लोकमूढ़ता; दूसरी मूढ़ता–देवमूढ़ता।
और तीसरी मूढ़ता, महावीर कहते हैं *गुरुमूढ़ता*। लोग हर किसी को गुरु बना लेते हैं! जैसे बिना गुरु बनाए रहना ठीक नहीं मालूम पड़ता–गुरु तो होना ही चाहिए! तो किसी को भी गुरु बना लेते हैं। किसी से भी कान फुंकवा लिए! यह भी नहीं सोचते कि जिससे कान फुंकवा रहे हैं उसके पास कान फूंकने योग्य भी कुछ है।
मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि हम पहले गुरु बना चुके हैं, तो आपका ध्यान करने से कोई अड़चन तो न होगी? मैंने कहा, “अगर तुम्हें पहले गुरु मिल चुका है तो यहां आने की कोई जरूरत नहीं।’ वे कहते हैं, “मिला कहां!’ वह तो गांव में जो ब्राह्मण था, उसी को बना लिया था।
गुरु को खोज लेने का अर्थ, एक ऐसे हृदय को खोज लेना है जिसके साथ तुम धड़क सको और उस लंबी अनंत की यात्रा पर जा सको।
तो महावीर कहते हैं, ये तीन मूढ़ताएं हैं और इन मूढ़ताओं के कारण व्यक्ति सत्य की तरफ नहीं जा पाता। या तो भीड़ को मानता है, या देवी-देवताओं को पूजता रहता है। कितने देवी-देवता हैं! हर जगह मंदिर खड़े हैं। हर कहीं भी झाड़ के नीचे रख दो एक पत्थर और पोत दो लाल रंग उस पर, थोड़ी देर में तुम पाओगे, कोई आकर पूजा कर रहा है! तुम करके देखो! तुम सिर्फ बैठे रहो दूर छिपे हुए, देखते रहो। तुमने ही पत्थर रख दिया है और सिंदूर पोत दिया है; थोड़ी देर में कोई न कोई आकर पूजा करेगा। बड़ी मूढ़ता है।

जिन सूत्र

ओशो 🌹🌹
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स्वामी श्रद्धानंद की हत्या सेक्युलर थी और गांधी की हत्या सांप्रदायिक ?

23 दिसंबर, 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी युवक ने धोखे से गोली चलाकर स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या कर दी। यह युवक स्वामी जी से मिलकर इस्लाम पर चर्चा करने के लिए एक आगंतुक के रूप में नया बाज़ार, दिल्ली स्थित उनके निवास स्थान गया था। वह स्वामी जी के शुद्धि कार्यक्रम से पागलपन के स्तर तक रुष्ट था।
इस घटना से सभी दुखी थे क्योंकि स्वामी दयानन्द सरस्वती के दिखाये मार्ग पर चलने वाले इस आर्य सन्यासी ने देश एवं समाज को उसकी मूल की ओर मोड़ने का प्रयास किया था। गांधी जी, जिन्हे स्वामी श्रद्धानंद ने ‘महात्मा’ जैसे आदरयुक्त शब्द से संबोधित किया, और जो उनके नाम के साथ नियमित रूप से जुड़ गया, ने उनकी हत्या के दो दिन बाद अर्थात 25 दिसम्बर, 1926 को गोहाटी में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जारी शोक प्रस्ताव में जो कुछ कहा वह स्तब्ध करने वाला था। महात्मा गांधी के शोक प्रस्ताव के उद्बोधन का एक उद्धरण इस प्रकार है “मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा और मैं इसे दोहराता हूँ। मैं यहाँ तक कि उसे स्वामी जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूँ। वास्तव में दोषी वे लोग हैं जिन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध घृणा की भावना पैदा की ।
इसलिए यह अवसर दुख प्रकट करने या आँसू बहाने का नहीं है।“ यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वेच्छा एवं सहमति के पश्चात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलखान राजपूतों को शुद्धि कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दू धर्म में वापसी कराई। शासन की तरफ से कोई रोक नहीं लगाई गई थी जबकि वो ब्रिटिश काल था।
यहाँ यह विचारणीय है कि महात्मा गांधी ने एक हत्या को सही ठहराया जबकि दूसरी ओर वो अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे। हत्या का कारण कुछ भी हो, हत्या हत्या होती है, अच्छी या बुरी नहीं। अब्दुल रशीद को भाई मानते हुए उसे निर्दोष कहा। इतना ही नहीं गांधी ने अपने भाषण में कहा,”… मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता।…हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए। मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ।“ उन्होने आगे कहा कि “समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पड़ती है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है।“ अब्दुल रशीद के धार्मिक उन्माद को दोषी न मानते हुये गांधी ने कहा कि “…ये हम पढे, अध-पढे लोग हैं जिन्होने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया।…स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमे आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा।“(यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926)। संभवतः इन्हीं दो परिवारों (हिन्दू एवं मुस्लिम) को मजबूत करने के लिए गांधी जी के आदर्श विचार को मानते हुए उनके पुत्र हरीलाल और पोते कांति ने हिन्दू धर्म को त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। महात्मा जी का कोई प्रवचन इन दोनों को धर्मपरिवर्तन करने से रोकने में सफल नहीं हो पाया। सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ही शुद्धि कार्यक्रम आयोजित कर देहरादून के एक युवक को वैदिक धर्म में प्रवेश कराया। बाद में स्वामी श्रद्धानन्द ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। गांधी के सेक्युलरिज़्म के हिसाब से यह कार्यक्रम मुस्लिम विरोधी था इसलिए वे स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या को न्यायोचित ठहराने लगे। सत्य और न्याय दोनो शब्द पर्यायवाची हैं। जहां सत्य है, वहीं न्याय है और जहां न्याय है, वहीं सत्य है। फिर गांधी की हत्या को न्योचित ठहरना और हत्यारे को निर्दोष मानना उनके सत्य एवं न्याय के सिद्धान्त के दावे को खोखला साबित करता है। अहिंसा के पुजारी यदि सेक्युलरिज़्म के नाम पर हिंसा को न्यायोचित ठहराएँ तो उनके प्रवचन का क्या अर्थ। गांधी के लिए अपने विचार सही हो सकते हैं लेकिन यह जरूरी तो नहीं की सभी के लिए हों। नाथूराम के अपने विचार थे। देश का धर्म के आधार पर विभाजन की पीड़ा असहनीय थी। मुसलमानों के प्रति विशेष झुकाव के कारण हिन्दू समर्थक गोडसे की गांधी से मतभिन्नता थी। जिसके परिणामस्वरूप गांधी जी हत्या हुई। इस हत्या को भी किसी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि हम गांधी जी के चश्मे से देखे तो नाथूराम को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपने विचार से गोडसे ने भी हिन्दू समुदाय एवं राष्ट्रहित में यह कार्य किया था। उसके समर्थक मूर्ति स्थापित करना चाहते हैं तो क्या समस्या है। यदि स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा निर्दोष है तो गांधी का हत्यारा भी निर्दोष है। यह तो नहीं हो सकता कि स्वामी जी की हत्या सेक्युलर थी और गांधी की हत्या साम्प्रदायिक?
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