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Gagan Sharma Bhartiya
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Gagan Sharma Bhartiya

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क्या है जनेऊ (यज्ञोपवीत) का वैज्ञानिक रहस्य ?

जनेऊ को लेकर लोगों में कई भ्रांति मौजूद है | लोग जनेऊ को धर्म से जोड़ दिए हैं जबकि सच तो कुछ और ही है| तो आइए जानें कि सच क्या है ? जनेऊ पहनने से आदमी को लकवा से सुरक्षा मिल जाती है| क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए अन्यथा अधर्म होता है |

दरअसल इसके पीछे साइंस का गहरा रह्स्य छिपा है| दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता| आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है, एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का | अब एक एक जनेऊ में 9 - 9 धागे होते हैं| जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9 - 9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है| अब इन 9 - 9 धांगों के अंदर से 1 - 1 धागे निकालकर देंखें तो इसमें 27 - 27 धागे होते हैं| अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27 - 27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है| अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36 = 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है| अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9 + 2 = 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के मिलने सेबना है | 1 + 1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा हमें शीतलता प्रदान करता है| जब हम अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है| तो यह रहा जनेऊ का वास्तविक रहस्य |

यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है | इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है | यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है | शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है |

यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है | यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह होता है | यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता | अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है |

यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है | इसीलिए सभी धर्मों में किसी न किसी कारण वश यज्ञोपवीत धारण किया जाता है | 
वैदिक अनुसार यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक उपनयन संस्कार है जिसमें जनेऊ पहना जाता है इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है. यज्ञोपवीत को जनेऊ, ब्रहासूत्र कहते है. यज्ञोपवीत= यज्ञ + उपवती अर्थात जिसे यज्ञ कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो यज्ञोपवीत धारण किये बिना किसी को गायत्री मंत्र करने या वेद पाठ करने का अधिकार नहीं है, और इसके बाद ही विद्यारंभ होता है. सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है. यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, यज्ञसूत्र या जनेऊ होता है |

यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है, इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं. ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है. तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है, तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं. अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है. यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है. . . . . .

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्  |
आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ||

ब्रह्मचारी को तीन धागों बाला और विवाहित को 6 धागो बाला जनेऊ धारण करना चाहिये.

धार्मिक महत्व :- 
शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है. आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है. यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता.

शारीरिक महत्व :-
यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अतएव इसका सदैव धारण करना चाहिए.

शौच के समय जनेऊ कान में क्यों बांधते है ?

"यथा-निवीनी दक्षिण कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत "

अर्थात अशौच एवं मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ रखना आवश्यक है. हाथ पैर धोकर और कुल्ला करके जनेऊ कान पर से उतारें. यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है.जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है. इस नियम के मूल में शास्त्रीय कारण यह है कि शरीर के नाभि प्रदेश से ऊपरी भाग धार्मिक क्रिया के लिए पवित्र और उसके नीचे का हिस्सा अपवित्र माना गया है |

दाएं कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है दाएं कान को ब्रहमसूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है यह बात आयुर्वेद की दृष्टि से भी सिद्ध हुई है. यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दायां कान ब्रहमसूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है |

मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना पड़ता है इससे कान के पीछे की दो नसे जिनका संबंध पेट की आंतों से है.आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती है जिससे मल विसर्जन आसानी से हो जाता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है. जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, एसीडीटी, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते |

जनेऊ पहनने वाला नियमों में बंधा होता है | वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता | जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है | यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है | जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है |

बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दाएं कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है | किसी भी उच्छृंखल जानवर का दायां कान पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है | अंडवृद्धि के सात कारण हैं | मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है | दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है | इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय आज्ञा है |

यज्ञोपवीत बाएँ कंधे पर ही क्यों ?


यज्ञोपवीत व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है.इस प्रकार धारण करने के मूल में भी एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है. शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है.यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है. यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता |

अपने कंधे पर यज्ञोपवीत है इसका मात्र एहसास होने से ही मनुष्य भ्रष्टाचार से परावृत्त होने लगता है यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है |

सारनाथ की अति प्राचीन बुद्ध प्रतिमा का सूक्ष्म निरीक्षण करने से उसकी छाती पर यज्ञोपवीत की सूक्ष्म रेखा दिखाई देती है | यज्ञोपवीत केवल धर्माज्ञा ही नहीं बल्कि आरोग्य का पोषक भी है, अतएव एसका सदैव धारण करना चाहिए। शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है |

आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता |

अब भी कोई ना माने तो ना मानो परन्तु हमें तो अत्यंत गर्व है हिंदुत्व के "सूक्ष्म विज्ञान" व आध्यात्म के ज्ञान पर . . . . . .
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Gagan Sharma Bhartiya

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शुभरात्रि सुखद निद्रा के साथ               Good night nice sleep

                              काशी विश्वनाथ बाबा की जय
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Ramdas Tiwari's profile photokhinwraj gora's profile photoJayesh pandya's profile photovijay mishra's profile photo
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Har Har mahadev
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Gagan Sharma Bhartiya

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आप सभी को शुभ दिवस               Good day Everyone          
आपका दिन मंगलमय हो              Have a nice day

                                ऊँ भास्करायै नमः

                                     जय सूर्य देव
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mirtunjay rao's profile photoJayesh pandya's profile photoSuryakant Pandey's profile photoहिन्दुस्तानी जाट जय श्रीराम's profile photo
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श्रीराम का भारतीय जनजीवन में व्याप्ति तो स्वाभाविक है ही उसके आर-पार भी उनकी सत्ता और महत्ता के अद्भुत दृश्य मिलते हैं। श्रीलंका, ईरान, जावा, सुमात्रा, बाली, बोर्नियो, मॉरीशस, थाइलैण्ड, श्याम, बर्मा, चीन और जापान तक उनकी शासन व्यवस्था (रामराज्य) की हनक सदियों पूर्व पहुंच चुकी थी। उनके व्यक्तित्व की प्रभविष्णुता और स्वभाव के माधुर्य मिश्रित पराक्रम ने प्राय: पूरे एशिया में भारतीय संस्कृति का परचम फहरा दिया था। वह ईश्वर और श्रेष्ठतम मानव दोनों रूपों में स्मरण किए जाते हैं। उन्हें ईश्वर न मानने वाले भी एक ऐसे आदर्श शासन-व्यवस्था रामराज्य का प्रवर्तक स्वीकार करते हैं, जो ईश्वर की सत्ता से कम कल्याण कारक नहीं हैं।
लोकनायकत्व की सर्वमान्य कसौटी लोकसंग्रह है। राम इसमें अग्रणी हैं। उनका अयोध्या में जन्म होता है। वह दशरथनंदन और कौशल्या के आनंदवर्धन हैं। विमाताओं के प्रियतम पुत्र हैं। भाईयों के श्रद्धास्पद हैं। रावण के संहारक और विभीषण के मित्र हैं। जनकनंदिनी के पति हैं। पिता की कठोर आज्ञा वनगमन को सहर्ष स्वीकार करते हैं। वन को राक्षस विहीन करते हैं इससे तपस्वी और संत प्रसन्न होते हैं। उनका यह रूप लोकसंग्रह से जुड़ा है। यहां अध्यात्म का लेशमात्र भी नहीं, फिर भी राम के जीवन का यह महत्वपूर्ण आयाम है। यह सीधे उन्हें लोक से जोड़ता है, समाज के सन्निकट लाता है और उनके कमरें का समाजीकरण करता है। समाजीकरण की यह प्रक्त्रिया ही किसी व्यक्तित्व, ज्ञान, विद्या अथवा परंपरा को महत्वपूर्ण बना देती है।
राम में मानवीय मूल्यों व आध्यात्मिक तत्वों का पूंजीभूत रूप उपस्थित है। ऐसा न किसी परंपरा के साहित्य में मिलता है और न ही किसी समाज की परंपरा में। राम का यह रूप युगनिरपेक्ष लगता है। राम में सज्जनता की पराकाष्ठा है और सौख्य का महार्णव गर्जना करता है। उनका पराक्रम हिमालय जैसा है।
उनके व्यक्तित्व की ऊंचाई अन्त्योदय का सृजन करती है। उनके व्यक्तित्व की गरिमा समता का भाव जगाती है। उनके कृत्य लोकमंगल के साधक हैं। राज-काज के तंत्र मानवता के वर्धक हैं। उनका ऊंचा उठना वैयक्तिक महत्वाकांक्षा का द्योतक नहीं है, अपितु अन्त्योदय का विकास सूत्र है इसीलिए राम और रामकथा त्रेता से आज तक कलिमल हरनी बनी हुई है।
राम की धीरता और वीरता, समन्वयशीलता और मर्यादाप्रियता, अक्त्र ोधी स्वभाव और संकट में समचित्तता उनकी महानता के परिचायक हैं। सीता के विरह में उद्विग्नता उसके मानव ह्दय का प्रतिबिम्ब है। रावण के संहार में तत्परता और विभीषण को सिंहासन प्रदान करने में उदारता उनकी निर्णयात्मक क्षमता का द्योतक है। पिता की आज्ञा का पालन उनकी सामाजिक मूल्यों में निष्ठा का प्रतीक है। शबरी के जूठे बेर खाना, जटायु का अंतिम संस्कार करना, निषाद को प्रेमपूर्वक गले लगाना उन्हें करुणानिधि बनाता है। इन्हीं अर्थो में वह अन्य नायकों से श्रेष्ठ दिखते हैं।
रामनवमी (जन्मदिन) पर राम का प्रतिस्मरण पूरी भारतीय संस्कृति का पुनर्चितन है। उनके कृत्यों व मूल्यों का पुनराख्यान है। उनके आदर्श पर डग भरने का उपक्रम है।
निश्च्छल स्वभाव, असहाय का साहाय बनना, मित्रों से सखा भाव श्रीराम का शील हे। यह समाज के लिए अनुकरणीय है। भोगी जीवन की उपेक्षा, सम्पत्ति के प्रति अनासक्ति तथा सामा्रज्य के लिए युद्ध न करना राम का जीवन दर्शन था। वहीं उनका सहज गुण भी था। राम की यह सहजता उनके शील का अंग है। राम के ये गुण ही शाश्‌र्र्वत जीवन मूल्य बनते हैं। इन्हीें मूल्यों से समाज संवरता है, मनुष्यता बढ़ती है तथा आत्मीयता के बंधन मजबूत होते हैं।
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Gagan Sharma Bhartiya

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आप सभी को गुरु पूर्णिमा पर आपके सुखी जीवन की कामनाओं के साथ हार्दिक बधाई |

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरूदेवो महेश्वरः |
गुरुः साक्षात परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

गुरु शब्द में (गु) का मतलब है अंधेरा, अज्ञानता और (रु) का मतलब है दूर करना। यानि जो हमारी अज्ञानता दूर करता है एवं जीवन में निराशा एवं अंधकार को दूर करे, वह सच्चा गुरु हैं | सभी प्रिय मित्रों 12 जुलाई को गुरु पूर्णिमा पर्व पर आप सबका अभिनन्दन है 

ॐ श्री गुरुवे नमः
जय जय गुरुदेव.
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Bharat Patel's profile photoRamesh Chandravanshi's profile photoPrince baliyan's profile photoNagendranath Napit's profile photo
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Jai Guru Dev...
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Gagan Sharma Bhartiya

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आप सभी को शुभ दिवस               Good day Everyone          
आपका दिन मंगलमय हो              Have a nice day

                या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता |
                नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||

                                 जय माँ सरस्वती
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Suraj Kuhikar's profile photoहिन्दुस्तानी जाट जय श्रीराम's profile photoRajesh Desai's profile photokamalkishor dhakar's profile photo
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तू श्वेत वर्णी कमल पे विराजे,
हाथों में वीणा मुकुट सर पे साजे
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Gagan Sharma Bhartiya

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मुझे बजट से घनघोर निराशा हुई है |

1-मफलर के बारे में कोई घोषणा नहीं की गयी |
2-विशेष धरना स्थल नहीं बनाए गए और न ही उन्हें कोई अनुदान दिया गया |
3-गद्दी छोड़कर भागने वालों के लिए परमानेंट मकान की व्यवस्था नहीं की गयी इससे बाद में किराए का मकान मिलने में बहुत दिक्कत आती है |
4-खांसी की दवाई और स्टील का गिलास ही सस्ता हुआ है पर इंसान के जीवन में इन दो चीजो के अलावा और भी आवश्यकताएं होती है मसलन खुजली की दवाई बनाने वाली कम्पनियों को विशेष राहत देनी चाहिए थी |
5-हमारे देशभर में एक करोड़ SMS वाले कार्यकर्ता है खुजली और खांसी की दवाई के लिए विशेष पॅकेज न देकर ..हमारे साथ विश्वासघात किया गया है |
6-कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में बसाने का निर्णय लेकर हमारे पुराने साथी प्रशांत भूषण के सपनो को चूर चूर कर दिया |

इन सब बातों से सिद्ध हो चूका है की यह सरकार पूरी तरह बदले की भावना से कार्य कर रही है |
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Kuku Manmohan's profile photoBharat Patel's profile photoRamesh Chandravanshi's profile photoPrince baliyan's profile photo
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Gagan j.ya congras ka roop waalo ko pat dard ki dabaie jarur dain. Medicene sastaa ho gaya.
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Have him in circles
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SHUKLA DEEPENDRA's profile photo
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Gagan Sharma Bhartiya

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आप सभी को शुभ दिवस               Good day Everyone          
आपका दिन मंगलमय हो              Have a nice day

श्रावण मास के प्रथम सोमवार पर आप सभी मित्रो को हार्दिक शुभकामनाये

             कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन |
             जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन ||

                                 ॐ नम:शिवाय
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Ramdas Tiwari's profile photojigs 'u''s profile photokamalkishor dhakar's profile photoRajesh Desai's profile photo
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Jai Gouri Shankar
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Gagan Sharma Bhartiya

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मित्रों पहली बार किसी सरकार ने पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया है |
मोदी सरकार ने दिखाई पाकिस्तान को उसकी औकात |
भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर लाइन की देख रेख के लिए जुलाई 1949 में कराची समझौते के तहत संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन का गठन किया गया था |
और इसके लिए 40 साल पहले यूनाइटेड नेशंस मिलिट्री ऑब्जर्वर ग्रुप इन इंडिया एंड पाकिस्तान (यूएनएमओजीआईपी) को दिल्ली में पुराना किला रोड पर बंगला नंबर 1 एबी दिया गया था जिस पर तक़रीबन हर साल 42 करोड़ का खर्च भारत सरकार को करना पड़ता है |
अब मोदी सरकार ने इसे खाली करने का आदेश दे दिया है | इस पर पाकिस्तान ने कहा है कि बंगला खाली करवाने से कश्मीर विवाद नहीं सुलझेगा  |
इस पर मोदी जी ने कहा है कि इस मिशन का गठन कश्मीर विवाद के लिए नहीं हुआ था इसका काम था सीजफायर पर काम करना और जब सीजफायर नहीं रुक रहे तो मिशन का कोई महत्व नहीं है |
इसलिए हम कराची समझौते के तहत गठित मिशन को रद्द करते हैं  | मित्रो पहली बार मोदी सरकार ने पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया है |
भारत प्रशासित कश्मीर की टीकाकार प्रोफ़ेसर हमीदा नईम ने बंगला खाली कराने को एक ख़तरनाक क़दम बताया है |
वह कहती हैं, "संयुक्त राष्ट्र के इस मिशन का यहां होना ही इस बात का प्रतीक है कि कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय विवाद है. अगर यह मिशन बंद हो गया, तो कश्मीर के विवाद को ख़त्म बताया जाएगा. अलगाववादियों और पाकिस्तान को इस पर कड़ा विरोध जताना चाहिए."
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hemant poojari's profile photoraj mehra's profile photoसॅजय बरनवाल's profile photoJean-Pierre Giroux's profile photo
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+nijamuddin khan दो महीने मे कोई भी सरकार इतने काम नही की होगी जितना मोदी ने किया चूनाव के बाद खजाना खाली मिला तो इसके लिए कांग्रेस को नही कुछ कहेगे अरे अभी 4साल और देख लीजिए तब आकडा लगाइएगा ! जलना छोड़ें सहयोग करना सीखें
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Gagan Sharma Bhartiya

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शुभरात्रि सुखद निद्रा के साथ               Good night nice sleep

       राम नाम गुण चरित सुहाय  जनम अगनित श्रुति गाए |
       जाता अनंत राम भगवाना तथा कथा कीरित गुन नाना ||

                                   राजा रामचन्द्र की जय
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HARIDAS BADIYANI's profile photoSuresh Sharma's profile photoPawan Goyal's profile photoBharat Patel's profile photo
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Jai Shri Ram, Jai Shri Hanuman..
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Gagan Sharma Bhartiya

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माँ…माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ-माँ संवेदना है, भावना है अहसास है
माँ…माँ जीवन के फूलों में खुशबू का वास है,
माँ…माँ रोते हुए बच्चे का खुशनुमा पलना है,
माँ…माँ मरूथल में नदी या मीठा सा झरना है,
माँ…माँ लोरी है, गीत है, प्यारी सी थाप है,
माँ…माँ पूजा की थाली है, मंत्रों का जाप है,
माँ…माँ आँखों का सिसकता हुआ किनारा है,
माँ…माँ गालों पर पप्पी है, ममता की धारा है,
माँ…माँ झुलसते दिलों में कोयल की बोली है,
माँ…माँ मेहँदी है, कुमकुम है, सिंदूर है, रोली है,
माँ…माँ कलम है, दवात है, स्याही है,
माँ…माँ परामत्मा की स्वयँ एक गवाही है,
माँ…माँ त्याग है, तपस्या है, सेवा है,
माँ…माँ फूँक से ठँडा किया हुआ कलेवा है,
माँ…माँ अनुष्ठान है, साधना है, जीवन का हवन है,
माँ…माँ जिंदगी के मोहल्ले में आत्मा का भवन है,
माँ…माँ चूडी वाले हाथों के मजबूत कधों का नाम है,
माँ…माँ काशी है, काबा है और चारों धाम है,
माँ…माँ चिंता है, याद है, हिचकी है,
माँ…माँ बच्चे की चोट पर सिसकी है,
माँ…माँ चुल्हा-धुंआ-रोटी और हाथों का छाला है,
माँ…माँ ज़िंदगी की कडवाहट में अमृत का प्याला है,
माँ…माँ पृथ्वी है, जगत है, धूरी है,
माँ बिना इस सृष्टी की कलप्ना अधूरी है,
तो माँ की ये कथा अनादि है,
ये अध्याय नही है. . . .
. . . और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
और माँ का जीवन में कोई पर्याय नहीं है,
तो माँ का महत्व दुनिया में कम हो नहीं सकता,
और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
और माँ जैसा दुनिया में कुछ हो नहीं सकता,
तो मैं कला की ये पंक्तियाँ माँ के नाम करता हूँ,
और दुनिया की सभी माताओं को प्रणाम करता हूँ.

ओम व्यास जी की कविता
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Mahabir Dadhichi's profile photokamalkishor dhakar's profile photoPrince baliyan's profile photoRamesh Chandravanshi's profile photo
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I LOVE U MAA...
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Gagan Sharma Bhartiya

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शुभरात्रि सुखद निद्रा के साथ               Good night nice sleep

       राम नाम गुण चरित सुहाय  जनम अगनित श्रुति गाए |
       जाता अनंत राम भगवाना तथा कथा कीरित गुन नाना ||

                                   राजा रामचन्द्र की जय
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Pawan Goyal's profile photoBhardwaj Ambala's profile photoGagan Sharma Bhartiya's profile photoJitendra Agrawal's profile photo
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नमस्ते
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Gagan Sharma Bhartiya

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मंदिरों में प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा - पूर्णत: वैज्ञानिक प्रक्रिया
मंदिरों के निर्माण के बाद देवताओं की प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है। क्या पत्थर की प्रतिमाओं में कुछ धार्मिक रस्में पूरी करने से उनमें प्राणों का संचार हो जाता है? क्या पत्थरों में जान फूंकना संभव है? आखिर क्यों प्रतिमाओं की स्थापना प्राण प्रतिष्ठा से की जाती है ?
वास्तव में यह पूर्णत: वैज्ञानिक प्रक्रिया है | विज्ञान मानता है कि धार्मिक अनुष्ठानों और मंत्रों से किसी पत्थर में प्राण नहीं डाले जा सकते हैं लेकिन यह भी आश्चर्य का विषय है कि प्राण-प्रतिष्ठा का अनुष्ठान पत्थर की प्रतिमाओं को जागृत करने के लिए ही किया जाता है। दरअसल इस प्रक्रिया से पत्थरों में प्राण नहीं आते हैं लेकिन उसके जागृत होने, सिद्ध होने का अनुभव किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में कई विद्वानों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा किए जाने वाले स्थान पर वैदिक मंत्रों और ध्वनियों का नाद किया जाता है। प्रतिमा का कई तरह से अभिषेक कर उसके दोषों का शमन किया जाता है |
इससे सिद्ध होता है कि देवोपासना के लिए सनातन धर्म का एक सबल आधार मूर्ति पूजा है और इसका अंग होने के कारण मूर्ति प्रतिष्ठा भी उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है | मूर्तियों में मंत्रों की शक्ति से जब प्राण प्रतिष्ठा होती है तो उनमें देवत्व का प्रवेश होता है जो विधिवत पूजा से फलदायी होती हैं |
यह वास्तु आधारित भी होता है | इससे प्रतिमा के आसपास और जिस स्थान पर उसकी स्थापना की जा रही है, मंत्रों और शंख-घंटियों की ध्वनि से वातावरण का दूषित रूप खत्म हो जाता है और वहां सकारात्मक ऊर्जा का संचार शुरू हो जाता है | जिससे उस जगह के पवित्र होने का एहसास बढ़ता है | इसे हम अनुभव भी कर सकते हैं | मंदिर में जिस शांति का अनुभव होता है वह वैदिक मंत्रों और शंख आदि की ध्वनि से ही उत्पन्न होती है | इसे ही प्राण प्रतिष्ठा कहते हैं | इसके बाद यह मान लिया जाता है कि प्रतिमा में खुद देवता स्थापित हो गए हैं, इससे हमारे मन में उसके प्रति श्रद्धा और आस्था का भाव जागता है | जिसमें यह वातावरण सहायक होता है |

अब कोई माने या ना माने 
हमें तो अत्यंत गर्व है हिंदुत्व के "सूक्ष्म विज्ञान" व आध्यात्म के ज्ञान पर .....
समस्त मित्रों से नम्र निवेदन है की हिंदुत्व के ज्ञान को और भी अटूट करने के लिए शेयर करने में आप भी गर्व महसूस करें |

( चित्र :- श्री कनक बिहारी जी, कनक भवन, अयोध्या, उत्तर प्रदेश )
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