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Tapashwani Anand
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ईमान बचाना भारी था।
जब दो संस्थान किसी कारण से आपस में साँझेदारी करें और कोई एक संस्थान का पूर्ण विलय हो जाए, तब अगर दोनों संसथान एक साथ, एक छत के नीचे, काम करने के लिए प्रेरित हों, उस समय पुरुष कर्मियों के दिल में क्या क्या हरकत होती है, उसकी एक बानगी 😊😊.... ऐसा नही की लल्ल...
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ख़ून बहाने निकलें हैं ।
जिसने सारा संसार रचा, कुछ उसे बचाने निकलें है। साफ़ हवा में, बारूदों की, गंध मिलाने निकलें है । धर्म क़ौम के नाम पे कुछ, फिर शीश कटाने निकले है। अपनी सनक मिटाने को, कुछ ख़ून बहाने निकलें है । नाम हमारा लेकर कुछ, मनमानी करने निकलें है। राजनीति सध सके स्वतः, ...
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तन का आकर्षण !
तन का आकर्षण है जब तक, मन का मान किसे रहता है । पाप पुण्य का ध्यान किसे फिर, कहाँ कोई निश्छल रहता है । अपने को तज, ग़ैर की चिंता, दिल तेरा अक्सर करता है, क्षण-भंगुर यौवन का पीछा, क्यूँ ये व्याकुल मन करता है ।
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Different Git client used in Win, Linux and Mac
Hi Friends, I want to share few common git client list that can be used in different Operating System GitX -dev. Platforms:
Mac. ... SourceTree . Platforms:
Mac, Windows. ... SmartGit . Platforms:
Windows, Mac, Linux. ... GitUp . Platforms:
Mac. ... GitKrak...
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जीवन साथी...
जैसे जैसे दिन एक बीता, तुम वैसे वैसे निखरी हो । एक जन्म का साथ नही, तुम जैसे, जन्मों से मेरी हो । तुम अपना अस्तित्व मिटा के, मेरा शुख़ दुःख बाँट रही हो । मेरे हिस्से के काँटे भी, तुम आँचल से ढाँक रही हो । अपने घर को छोड़ के जबसे, तुम मेरे घर आयी हो । उस दिन...
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पूराने ख़्वाब को, फेकूँ मैं कहाँ ?
तेरी हर बात तो, हर बार बदल जाती है, मैं तेरे बात पर, कैसे यक़ीं करूँ ये बता ।। फिर एक बार नए ख़्वाब, लेके आए हो, पूराने ख़्वाब को, फेकूँ मैं कहाँ ये तो बता ।। तेरे वादे अभी भी दफ़्न हैं, तकिए के तले, मैं राज खोल दूँ, तुझको हो कोई डर तो बता ।। मेरी आवाज़ को,...
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जाने क्यूँ अच्चा लगा
थक चुका था साफ़ सुथरे रास्तों पर चलते चलते, तंग गलियों से गुजर कर घूमना अच्छा लगा। धुल धक्कड़ से निकलता था, हमेशा बच  बचाके , आज कीचड़ में लिपट कर जाने क्यों अच्छा लगा । झूठ के पिंजरे में , बैठा था मैं अब तक छुप छुपा के , आज सच के आसमां में, फिर तैरना अच्छा...
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क्यूँ फिर रहा है ठगा-ठगा सा ..
किसी की बातों पे रंज क्यूँ है, किसी के करतब से क्यूँ हतासा । करम सभी के हैं उसके आगे, काल का पहिया यही बताता ।। जो घाव देके उछल रहे हैं , उनका भी कल बने तमाशा । सही ग़लत में फँसा ही क्यूँ है, क्यूँ फिर रहा है ठगा-ठगा सा ।।
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क्या बदला है ?
उँगलियों पर गिन लो, बस इतने ईमानदार बैठें हैं | मौका नहीं मिला है उन्हें, वो अब भी ताक में बैठे हैं || जो परिंदो को रोज, चारा डालते दिखाई देतें हैं | जरा संभलना कि वो, एक मौके के इंतजार में बैठें हैं || इतने सालों में बस इतना ही बदला है आनंद  | जो कल तक चोर...
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परिवर्तन
जीत में उन्माद है तो, हार में अवसाद होगा। इस धरा पर, मित्र मेरे, कुछ भी स्थायी नही है ।। कुछ पाने पर, गर जस्न है, तो खोने का भी शोक होगा । कोई भी व्यवहार आनंद, फिर चीर-स्थायी नही है ।।
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