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ashwani kumar
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बजट के बोझ तले ‘बेचारी जनता’

(सटीक और निष्पक्ष लेख...)
भारत सरकार का आम बजट हर साल देश की मध्यमवर्गीय और निम्न आय वाली आबादी के लिए उम्मीद की किरण लेकर आती है| चुनावी वादों, मुफ्तखोरी और कालेधन के संकरे रास्ते से गुजरते-गुजरते इसकी चमक फिकी पड़ जाती है| बेचारी आम जनता दिल्ली के तख़्त से निकले उम्मीदों के पिटारे को देखकर-सुनकर भी कुछ ज्यादा रियेक्ट नहीं कर पाती| किसी से कुछ पूछो तो कहता है की मिला ही कब है जो उम्मीद करें| इस बार भी नरेन्द्र मोदी का बजट शो उनके सबसे अक्लमंद जेटली ने पेश किया किया| विकास, योजनाओं और गरीबी मिटाने की डुगडुगी बजी मगर नाचा कोई नहीं, सब अच्छे दिन के सपने में मस्त मिले|

इस बजट में कृषि, कौशल विकास, रेलवे व अन्य बुनियादी ढांचे के विकास के लिए ढेर सारी अच्छी घोषणाएं की गई| मध्यमवर्ग के लिए कर छूट की सीमा बढाकर जहाँ 3 लाख किया वहीँ 5 लाख तक आमदनी वाले बाबूओं के लिए कर दर को 10% से घटाकर 5% कर दिया| नोटबंदी जैसे सख्त फैसलों की कामयाबी-नाकामयाबी को बड़े ही बेहतर और मंझे अंदाज में सब अच्छा दिखा टरका दिया| कैशलेस लेनदेन और डिजिटल भुगतान पर भी सरकार की नीतियों पर कुछ ख़ास टिप्पणी नहीं की जा सकती| नौकरियों के मसले पर सरकार की चुप्पी आम चुनाव का इंतजार का संकेत करती है| चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा सरकारी कामकाज और खर्च-सुविधाओं की पोल खोलती है| ग्रामीण क्षेत्रों में कल्याणकारी योजनाओं में सरकारी धन का बहाव आम लोगों के हक़ में सार्थक उतना ही सिद्ध लगता है जितना की होता आया है| वहीं कालेधन-भ्रष्टाचार के मसले पर नोटबंदी को रामबाण करार देना सरकार की राजनीतिक मजबूरियों की ओर इशारा करती है|

साफ़ है की बजट आम जनता से ज्यादा उधोगपतियों, कारोबारियों और अमीरों का हित-अहित से सधी होती है इसलिए जनता कभी बेसब्री से बजट का इंतजार नहीं करती| मतलब आम जनता-आम लोग सिर्फ चुनाव का इंतजार करते हैं| वर्तमान में यूपी व पंजाब के चुनावी घोषणापत्रों में गरीबों के लिए, बेसहारों के लिए जो व्यवस्थाएं की गई जनता शायद उसी का इंतज़ार करती है| हर राजनीतिक दलों ने मुफ्तखोरी का लंगर चलवाने का वायदा कर रखा है| कोई 5 रु० में पेटभर भोजन दे रहा है तो कोई सभी को घर| कोई छात्रों को मोबाइल बाँट रहा है तो कोई मुफ्त का लैपटॉप| सब झूम रहे हैं, जैसे भुखरों की टोली में लंगर खोले जा रहे हैं|

भारत में लीडरशीप के नाम पर सीधा मतलब भूखी जनता की हड्डियाँ नोचना है| टैक्स की खैरात से मजे लूटकर, उनकी हड्डियाँ चूसकर बोटी को गरीबों में लूटा देना है| जनता भी मजे में है लेकिन मुफ्तखोरी की जो लत उसे लोकतान्त्रिक या चुनावी अधिकारों के नाम पर लगी है न वो उसकी कीमत उसे अपनी मेहनत की कमाई को सरकारी तंत्र से नुचवाकर चुकानी पड़ती है| सत्ता में कोई भी बैठा हो वो पहले पार्टी का होता है ये जुमलेबाजी भले लगे मगर हकीकत है| राजनीतिक चंदे से कालेधन को सफ़ेद करने वाले जनता के कभी सगे नहीं हो सकते| अगर ऐसा रहा और मतदाता अपना ईमान अपनी मुफ्तखोरी की वजह से बेईमानों को बेचते रहे तो निश्चित ही वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को हरामखोरी का गुलाम बना बैठेंगे|

इस तरह बजट के विश्लेषण या फायदे-नुकसान के झमेले से हटकर सत्ता के जादूगरों के शो देखिये, उसे परखिये और चुनावों में सही-गलत का निर्णय कीजिये| हर बजट को गरीबों को समर्पित बताने वालों से पूछिये की 70 सालों से आखिर ये बजट किसके लिए आता है और अब भी हर बजट में गरीब शब्द कहाँ से लैंड कर जाता है? मतलब साफ़ है की जनता को देशहित में सोंचना होगा क्योंकि पार्टीहित सिर्फ देश को राजनीतिक गुलाम ही बना सकता है| सभी अपने नेताओं से सवाल पूछिये की आखिर मेरी आवाज कहाँ दबती है? मेरा अधिकार कौन लूटता है? और हाँ पूछने वाले की मासूमियत पर शंका नहीं कीजिये!
नहीं तो किसी गरीब के टैक्सों से हर साल कॉर्पोरेट उधोगपतियों को ढाई लाख करोड़ रु० माफ़ करने का खैराती अधिकार उन्हें किसने दिया?

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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Battle ground of U.P. election

Upcoming U.P. legislative election have created a endless race course arena to convince voters with day-dream of undesirable development, poverty, hunger, lodge etc. All of the political parties is trying to attract people with every possible prospects like that election is the last to eradicate whole calamity from the state. Just called it as a ‘NETA TYPE’ propaganda and may of then want to look original socialistic politicians behind the background of Bahubali. Voters have no idea about any parties. In fact, because history till independence prove it. People has choosen those leaders who ever suck their profits, their rights and also try to down their voice.

U.P. knows for the highest population so, naturally it has a largest enrolled voters in the country. Political potential of the state effected very sharply to the national politics. Now, U.P. has strucked among SP, BSP, BJP etc but No one could prove its loyalty to the state. Where, Mayawati’s corruption high as elephant contrarily, Akhilesh yadav’s inability in maintenance of law and order also should a top priority of voters at the time of vote cast. Muslim and Anti-Muslim incumbency of U.P. hits political gaining of BJP and caste-politics of state also draw a major role play in election. Religious polarization is the biggest issue for BJP. Communal rites of mujaffarnagar and dadari kand is the key point of BJP for political support of bigot hindu’s or sympathetic vote for hope of ram mandir, which probably a panacea topic of manifesto of BJP but not a realistic.

It is time, People have to decided very consciously. They needn’t pay attention towards glimpase of promises. Voters of U.P. should define among them and choose who is truly sincere about state’s upgrowth and prosperity of backward.

Writer: “Ashwani Kumar”, who is the author of कहने का मन करता है... (ashwani4u.blogspot.com)

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जल्लीकट्टू ने औकात दिखाई...
जनता के मनोभाव, उनके आस्था, उनकी परम्परा या उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों पर बिना सोंचे समझे प्रहार करना हमारी व्यवस्था, हमारे न्यायतंत्र के लिए एक अच्छा सबक मिला है| धर्म आधारित आस्था व विश्वास के सांस्कृतिक पहलुओं पर कोर्ट को खुद मसीहा घोषित करने का दांव इस बार उल्टा पड़ गया| जनमानस की भावनाओं को अनदेखा करना या फिर जबरन उनके आचार-विचार में अपने तुगलकी फरमान ऊपर से थोप देना व्यवस्था के लिए सीख है| तमिलों ने दिखाया की वे कैसे अपनी अस्मिता के लिए सरकार से भीड़ कर अपनी बात मनवायेंगे और अदालत के निर्णयों की अवहेलना कर सकते हैं|

पशु क्रूरता संरक्षण से संबंधित पेटा की अपील पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगाया था| सरकार की एक के बाद एक अपील को खारिज कर कोर्ट ने जनता को चिढाया| खाने में हड्डियाँ चूस-चूसकर खाने वाले लोंगों के पशु प्रेम ने जनता को उग्र होने पर मजबूर किया| अपनी सांस्कृतिक विरासत छिनते देखकर भी तमिलों का संयम पिछले दो वर्षों से नहीं टुटा, पर इस बार युवा तमिल नौजवानों के स्वयंस्फूर्त जोश ने व्यवस्था से लड़ने-भिड़ने को प्रेरित किया| सोशल मीडिया में दक्षिण के साथ-साथ उत्तर भारतीयों ने जल्लीकट्टू का जिस तरह समर्थन किया, अदालत को आँखें दिखाई, सरकार को निकम्मा घोषित किया वही आज जल्लीकट्टू बहाल करने की चिंगारी बनी| तमिलों के इस विरोध ने भारत की सांस्कृतिक विविधता में की जा रही तोड़-फोड़ को एक नई दिशा दिखाई है| मतलब, लोग अब क्या खाएं, क्या पहनें, क्या खेलें-क्या कूदें इसके लिए अदालतों का मुंह नहीं देखेंगे| जाहिर सी बात है की जनता के हिंसक और उग्र रवैये से न लोकतंत्र का भला होगा और न ही अदालतों के हठी रवैये से जनता का|

भारत में हिन्दुओं के धार्मिक आस्थाओं, विश्वास में जितना सुधार हुआ है उसी ने हिन्दू एक जीवन शैली की पहचान दिलायी| सती-प्रथा, नरबली, पशु-हत्या, हिन्दू विवाह, स्त्रियों को समान हक़ जैसे सुधारों ने भारत को मानवीय दृष्टिकोण से संवेदनशील बनाया| इस्लामी सुधारों के प्रति सामाजिक संगठनों और अदालतों का विद्रोह का डर हमेशा पैठा रहा है| पशु-क्रूरता की पराकाष्ठ वाले इस्लाम पर पेटा जैसे संगठनें कहीं नहीं दिखती| तो सिर्फ सांढ़ों को बगैर नुकसान पहुंचाए खेल-खेलने में ये इतने संवेदनशील हो सकते हैं तो तमिल और हिन्दू अपनी परम्परा के लिए क्यों नहीं? सरकार और अदालतों का धर्म विभेद बेशक इस बार हिन्दुओं की मनोदशा में गहरा पैठा है|

तो कुल मिलाकर जल्लीकट्टू विवाद दादागिरी से दादागिरी का भिड़ना माना जाएगा| मतलब अदालतों की दादागिरी रवैये को इस बार युवाओं ने दादागिरी से भिड़कर सरेआम बेइज्जती कर दी| यक़ीनन, पिछले कुछ सालों में धर्म-आस्था के मसले पर बेवजह दिलचस्पी दिखाकर अदालतों ने अपने को बार-बार नीचा दिखाया है| जनता की संवेदनशीलता सरकार आसानी से परख सकती है और उसे जन-जागरूकता के माध्यम से ही धीरे-धीरे उनके व्यवहारों में सुधार लाया जा सकता है|
नहीं तो डंडे की भाषा इस्तेमाल करने में आत्म-विश्वास कभी-कभी भारी पड़ जाती है और लोग सांढ की तरह उग्र होकर लाठी से व्यवस्था को हांक भी डालते हैं...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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जल्लीकट्टू ने औकात दिखाई...

जनता के मनोभाव, उनके आस्था, उनकी परम्परा या उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों पर बिना सोंचे समझे प्रहार करना हमारी व्यवस्था, हमारे न्यायतंत्र के लिए एक अच्छा सबक मिला है| धर्म आधारित आस्था व विश्वास के सांस्कृतिक पहलुओं पर कोर्ट को खुद मसीहा घोषित करने का दांव इस बार उल्टा पड़ गया| जनमानस की भावनाओं को अनदेखा करना या फिर जबरन उनके आचार-विचार में अपने तुगलकी फरमान ऊपर से थोप देना व्यवस्था के लिए सीख है| तमिलों ने दिखाया की वे कैसे अपनी अस्मिता के लिए सरकार से भीड़ कर अपनी बात मनवायेंगे और अदालत के निर्णयों की अवहेलना कर सकते हैं|

पशु क्रूरता संरक्षण से संबंधित पेटा की अपील पर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने जल्लीकट्टू पर प्रतिबन्ध लगाया था| सरकार की एक के बाद एक अपील को खारिज कर कोर्ट ने जनता को चिढाया| खाने में हड्डियाँ चूस-चूसकर खाने वाले लोंगों के पशु प्रेम ने जनता को उग्र होने पर मजबूर किया| अपनी सांस्कृतिक विरासत छिनते देखकर भी तमिलों का संयम पिछले दो वर्षों से नहीं टुटा, पर इस बार युवा तमिल नौजवानों के स्वयंस्फूर्त जोश ने व्यवस्था से लड़ने-भिड़ने को प्रेरित किया| सोशल मीडिया में दक्षिण के साथ-साथ उत्तर भारतीयों ने जल्लीकट्टू का जिस तरह समर्थन किया, अदालत को आँखें दिखाई, सरकार को निकम्मा घोषित किया वही आज जल्लीकट्टू बहाल करने की चिंगारी बनी| तमिलों के इस विरोध ने भारत की सांस्कृतिक विविधता में की जा रही तोड़-फोड़ को एक नई दिशा दिखाई है| मतलब, लोग अब क्या खाएं, क्या पहनें, क्या खेलें-क्या कूदें इसके लिए अदालतों का मुंह नहीं देखेंगे| जाहिर सी बात है की जनता के हिंसक और उग्र रवैये से न लोकतंत्र का भला होगा और न ही अदालतों के हठी रवैये से जनता का|

भारत में हिन्दुओं के धार्मिक आस्थाओं, विश्वास में जितना सुधार हुआ है उसी ने हिन्दू एक जीवन शैली की पहचान दिलायी| सती-प्रथा, नरबली, पशु-हत्या, हिन्दू विवाह, स्त्रियों को समान हक़ जैसे सुधारों ने भारत को मानवीय दृष्टिकोण से संवेदनशील बनाया| इस्लामी सुधारों के प्रति सामाजिक संगठनों और अदालतों का विद्रोह का डर हमेशा पैठा रहा है| पशु-क्रूरता की पराकाष्ठ वाले इस्लाम पर पेटा जैसे संगठनें कहीं नहीं दिखती| तो सिर्फ सांढ़ों को बगैर नुकसान पहुंचाए खेल-खेलने में ये इतने संवेदनशील हो सकते हैं तो तमिल और हिन्दू अपनी परम्परा के लिए क्यों नहीं? सरकार और अदालतों का धर्म विभेद बेशक इस बार हिन्दुओं की मनोदशा में गहरा पैठा है|

तो कुल मिलाकर जल्लीकट्टू विवाद दादागिरी से दादागिरी का भिड़ना माना जाएगा| मतलब अदालतों की दादागिरी रवैये को इस बार युवाओं ने दादागिरी से भिड़कर सरेआम बेइज्जती कर दी| यक़ीनन, पिछले कुछ सालों में धर्म-आस्था के मसले पर बेवजह दिलचस्पी दिखाकर अदालतों ने अपने को बार-बार नीचा दिखाया है| जनता की संवेदनशीलता सरकार आसानी से परख सकती है और उसे जन-जागरूकता के माध्यम से ही धीरे-धीरे उनके व्यवहारों में सुधार लाया जा सकता है|
नहीं तो डंडे की भाषा इस्तेमाल करने में आत्म-विश्वास कभी-कभी भारी पड़ जाती है और लोग सांढ की तरह उग्र होकर लाठी से व्यवस्था को हांक भी डालते हैं...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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ट्रंप युग का आगमन

दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति की सत्ता अब औपचारिक तौर पर डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में आ गयी है| अमेरिकी राजनीति के शिखर पर एक ऐसा व्यक्ति काबिज हुआ है जो न तो देश के प्रबुद्ध मीडिया वर्ग को स्वीकार्य है और न ही बड़ी पढ़ी-लिखी और गंभीर आबादी को| डोनाल्ड ट्रंप की अस्पष्ट नीतियाँ, इस्लाम को अमेरिका से बाहर करने की प्रतिबद्धता और गैरजरूरी आर्थिक-राजनीतिक बयानबाजी उन्हें सत्ता तक पहुंचा गयी| ये हकीकत कई मायनों में भारत के 2014 चुनावों के वक्त मोदी लहर की पुरान्वृति कही जा सकती है|

डोनाल्ड ट्रंप के चुनावी अभियानों में इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथी विचारधारा को नेस्तनाबूत करने की उनकी सोच वर्तमान वैश्विक माहौल से प्रेरित है| अमेरिका सहित तमाम पश्चिमी देश आईएसआइएस व अन्य इस्लामिक आतंकवादी संगठनों के मचाये उत्पात से सहमा था| ऐसे वक्त में अमेरिका जैसी महाशक्ति के राजनीतिक-आर्थिक हालातों को नज़रअंदाज कर खुलेआम इस्लामी आतंकवाद को चुनौती देना ट्रंप को प्रचलित बना गया| मतलब, अमेरिकी जनता के लिए अब आर्थिक चुनौतियों से बढ़कर आतंकवाद का डर ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया है| ट्रंप जैसी शख्सियत का उदय 21वीं सदी को या तो सबसे बड़ा वैश्विक सुधार के लिए जाना जाएगा या फिर वैश्विक उथल-पुथल का जिम्मेदार| वक्त और हालात जैसे भी हों पर ट्रंप प्रशासन का ज्यादातर ध्यान अमेरिकियों के लिए ही होगा| अगर ऐसा हुआ तो दुनिया भर के देशों से अमेरिका का प्रभाव निश्चित तौर पर घटेगा और चीन जैसे देशों की मनमानी से सामरिक टकराव जैसी स्थितियों से इंकार भी नहीं किया जा सकता|

दूसरी तरफ सीरिया, लीबिया, मिस्र या अफगानिस्तान जैसे देशों के आतंकवाद पर अमेरिका को बेहद सावधानी से काम करना होगा| क्योंकि इन देशों में पनपे आइएसआइएस और तालिबान जैसे संगठन अमेरिका, रूस सहित पश्चिमी देशों के अथक प्रयास के बाद भी कुछ भी बिगाड़ा न जा सका है| अब देखना होगा की ट्रंप इन संगठनों के आस्तित्व पर कितना भारी पड़ पाते हैं| या उनकी कार्यकुशलता सिर्फ अमेरिका को आतंकवाद से मुक्त रखने को है ये वक्त बतायेगा|

भारत के प्रति ट्रंप की नीति में उदारवाद की झलक थोड़ी बहुत तो मिली है| अमेरिकी-हिन्दुओं के संबोधन में ‘आई लव हिन्दू’, ‘आई लव इंडिया’ जैसे शब्द और मोदी की नीतियों का समर्थन, शायद उनके कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाए| भारत को अपने आर्थिक हितों के साथ-साथ ट्रंप की चीन विरोधी नीतियों से चीन को भी साधना होगा और आतंकवाद पर उनके रुख से पाकिस्तान को भी| अब देखना ये होगा की नरेन्द्र मोदी भारत के हितों के लिए ट्रंप का कितना समर्थन हासिल कर पाते हैं|

डोनाल्ड ट्रंप ने ‘मेड इन इंडिया’ की तरह ‘मेड इन अमेरिका’ का नारा दिया| जो खुले तौर पर अमेरिकियों के लिए चीनी सामानों पर निर्भरता कर करने के स्पष्ट संकेत हैं| दक्षिण चीन सागर पर चीन की दादागिरी से अमेरिका टकराव के मुड में दिख भी रहा है| जापान, फिलीपिंस, ताइवान व दक्षिण कोरिया भी इस मुद्दे पर चीन से परेशान रहा है| ऐसे में भारत को चाहिए की किसी तरह इन सारे देशों को एक साथ जोड़कर अमेरिका के साथ चीनी आयात को कम करने के लिए आपसी सहयोग की संधि बनाए| ऐसी स्थिति में चीन की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा जायेगी| जिस कारण दुनिया की आर्थव्यवस्था से चीन की गैरजिम्मेदाराना नीतियाँ अपेक्षाकृत प्रभावहीन हो सकती है|

इस तरह अमेरिका के नए राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप का आगमन उम्मीदों का मेघ लेकर आया है| इन बादलों में किसी को कुछ दिख नहीं रहा है| कितना पानी बरसेगा या सिर्फ मोर नाचने के बादल हैं ये भी वक्त बतायेगा| हवा चलेगी, मेघ उड़ेंगे तो शायद कुछ अंदाजा लग पायें| फिर भी ट्रंप से रूस को भी उम्मीद है, भारत को भी उम्मीद है और वैश्विक शांति बहाली की भी|
हो सकता है ‘दारुल-ए-इस्लाम’ इस्लाम का राज कायम करने की मंशा बदल जाए| नहीं बदली तो वो समझ जाएँ की ये सहिष्णुता की बात करने वाले ट्रंप नहीं बल्कि इस्लाम विरोध के झंडाबरदार डोनाल्ड ट्रंप हैं..... मान जाओ.... नहीं तो आस्तित्व के लिए संघर्ष करोगे...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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350वां प्रकाशपर्व@पटनासाहिब

पटना साहिब | पाटलिपुत्र की प्राचीन बस्तियों के बीच स्थित सरदार गुरु गोविन्द सिंह जी की जन्मस्थली है पटना साहिब| सिखों के 10वें गुरु की जन्म से लेकर बचपन तक का गवाह है यहाँ की गलियां| मां गंगा की लहरें बालक गुरु गोविन्द सिंह जी की अठखेलियों की प्रत्यक्ष गवाह सी प्रतीत होती है| मुख्य गुरु घर में रोजाना होने वाली गुरुवाणी या शबद कीर्तन का आनंद हर कौम, संप्रदाय को यहाँ खींच लाती है| गुरुवाणी की अलौकिक और मधुरमय संकीर्तन यहाँ आने वाले हर एक व्यक्ति को असीम शांतिदायक माहौल देता है|

गुरु गोविन्द सिंह का जन्म सन 1666 ई० में पटना साहिब में हुआ था| अपनी दिव्य और अलौकिक व्यक्तित्व से आगे चलकर उन्होंने सिखों के दशमेश गुरु की पदवी धारण की| वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। खालसा पंथ की स्थापना उन्हें त्याग और बलिदान की मूर्ति बना गया| उनकी मूलभावना मानवता में विश्वास तो रखती ही थी, बल्कि शौर्य के उदाहरण रूप में उनकी “सवा लाख से एक लड़ाऊँ चिड़ियों सों मैं बाज तड़ऊँ तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊँ” प्रचलित है| मुगलों से उनका संघर्ष उनकी वीरता और जीवंत पराक्रम का उदाहरण है|

वर्तमान में आगामी 1 से 5 जनवरी के बीच गुरु गोविन्द सिंह जी का 350वां प्रकाशपर्व मनाया जा रहा है| देश-विदेश से आने वाले बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के लिए सरकार एवं प्रशासन ने तमाम बंदोबस्त किये गए हैं| शहर के प्रमुख चौक-चौराहे ‘वाहे गुरु जी’ के रंग में रंगा है| केंद्र सरकार, पंजाब सरकार और बिहार सरकार ने मिलकर इस 350वें प्रकाशपर्व को ऐतिहासिक बनाने के लिए हर इंतजाम किये हैं, जिसकी झलक आपको देखने मिलेगी|

वाहे गुरु जी के दर पर मैं बचपन से आते रहा हूँ| गुरुघर में बैठना, शबद-गुरुवाणी का श्रवण करना, लंगर खाना ये सब हम पटनावासियों में आदत सी देखने को बेशक मिलती है| यहाँ मिलने वाली सकारात्मक ऊर्जा न केवल मेरे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालती है बल्कि गुरु गोविन्द सिंह जी के सद्विचारों, उनके आदर्शों पर चलने के लिए प्रेरित भी करती है|

मुझे गर्व होता है की मैं भी पटना साहिब की धरती पर पला-बढ़ा और बड़ा हुआ हूँ| गुरु गोविन्द सिंह जी की धरती पर रहने का, सिख श्रद्धालुओं के गुजरते जत्थे को सत् श्री अकाल बोलने की श्रद्धा, निश्चित रूप से हमें सहिष्णु भी बनाती है और सिखों के प्रति प्यार दर्शाने का माध्यम भी बनती है...
अपनापन का भाव किसी की जन्मस्थली पर महसूस करना हो तो एक बार पटना साहिब जरूर आइये... आपका हमेशा स्वागत रहेगा...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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अनमोल है बचपन इसे बचाओ...
किसी मानव की जिन्दगी का सबसे अनमोल पल उसका बचपन होता है| न दुनिया की चिंता, न घर की फ़िक्र, न रिश्तों की समझ और न अपराध बोध| खेल में मिट्टी से मोहब्बत, पढाई में छुट्टी से प्यार और जिद में खिलौने लेने की प्रतिभा| अद्भुत, अतुलनीय है बचपन| बड़ों का लाड-प्यार और बुजुर्गों का दुलार उसे सारी दुनिया अपना सा दिखाती है| गोद लेने और हठ मनवाने की उसकी कला के आगे अच्छे-अच्छे कलात्मक कलाकार मंद हैं|

बच्चों की बचपन की डोर इस आधुनिकता में ढीली हो चली है| अश्लीलता का वातावरण बचपन की डोर को मैली कर रहा है| माता-पिता जिम्मेदारियों से भागकर इस डोर को किसी ‘आया’ या ‘पडोसी’ के हाथों थमा दे रहे हैं| इस बचपन की डोर में कसावट उस परिवेश से आता है जिसमें अनुशासन, संस्कार या बुजुर्गों का अनुदर्शन हो| पर लोग अब अपने बच्चे को स्मार्ट बनाना चाहते हैं| कुछ पत्थरदिल तो होस्टलों की चहारदीवारी में बंद कर बच्चों के बचपन का सार्थक भविष्य के नाम पर कत्लेआम कर दे रहे हैं|

क्या ये दुनिया आज भी उतनी ही वास्तविक दिखती है, जितनी पहले थी? वक्त बदला और हम आधुनिक भी हुए पर क्या हमने अपनी समझ और बुद्धि खो दी? पश्चिम दर्शन और दार्शनिकों के को हम पथप्रदर्शक मानने लगे| हमारे विद्वानों की आदर, संस्कार, सम्मान की भाषा पिछड़ी लगने लगी और उसे ही लगी जिसने इसी माध्यम को अपनाकर सफलता हासिल की| दर्द देता है ऐसे लोगों का परायापन| क्यों अपनाया हमने पश्चिमी शैक्षणिक व्यवस्था? देश की शिक्षा तंत्र में अंग्रेजी कान्वेंट स्कूलों की व्यवस्था करने वाले लोगों को खींचकर लाओ| उसे बचपन में लाकर 10 घंटे तक उसी स्कुल में बिठाओ|

कहाँ हैं हमारे देश में बच्चों के हिमायती? 5 वर्ष का बच्चा 7-8 घंटे स्कुल में बिताता है, औसतन 2-3 घंटे बसों में गुजारता है और वापस घर लौटकर ट्यूशन टीचर को झेलता है फिर होमवर्क बनाता है| बच्चों की ये दिनचर्या उसकी मासूमियत को खाए जा रहा है| बालमन को बर्बाद कर रहा है| चार्ट-पेपर, रंग-बिरंगी तस्वीरों की स्कूलों से रोजाना डिमांड अभिभावकों पर भारी पड़ रही है| कला के नाम पर या एक्स्ट्रा एक्टिविटी प्राइवेट स्कूलों की उगाही है|

सरकार एवं तमाम एनजीओ को ‘बचपन का शैक्षणिक शोषण’ मसले पर विचार-विमर्श करके तत्काल स्कूलों को दिशा-निर्देश दिए जाने की जरूरत है| इस तरह एक आयोग बनाकर बच्चों की जरूरतों, अभिभावकों की आर्थिक सक्षमता और बालमन की मासूमियत को ध्यान में रखते हुए कड़े नियमों की दरकार है तभी देश प्रगाढ़ युवाओं के बदौलत भविष्य में विश्व-नेतृत्व का झंडाबरदार बन सकेगा|
नहीं तो हम हर वक्त ब्रिटेन, अमेरिका के मुंह ताककर नीतियाँ बनाने वाले बूढ़े से हो चलेंगे...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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इस दुनिया की फिजाओं में, प्रकृति की गोद में,
उसकी तन्हाइयों में चले जाने का मन करता है|
भक्ति रस की अनमोल धाराओं में,
राम-कृष्ण के भावनामृत में बह जाने का मन करता है|
फूलों से भंवरों की मोहब्बत में,
मेघ से मोर की ख़ुशी में ढल जाने का मन करता है|

पर क्या करूं जीवन-बंधन के मोह में, घर-परिवार की खुशियों में,
कुछ क्रांतिकारी सा ना कर पाने का दर्द आप सब से बांटने का मन करता
है...
इसलिए ही शायद कुछ कहने का मन करता है...

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कौन बचा सकता है इन चोरों-बेईमानों से...

देश के आर्थिक परिदृश्य में बड़े बदलाव की कोशिश भी इन चोरों-बेईमानों की बुद्धि के आगे नाकाम बनती जा रही है| भारत सरकार और रिज़र्व बैंक के तमाम पढ़े-लिखे बुद्धिजीवियों का ज्ञान इनलोगों के आगे फेल हो गया| नोटबंदी के फैसले में प्रधानमंत्री से ज्यादा देश की ईमानदार जनता अपना सुनहरा भविष्य देख रही थी, गर्मजोशी से बैंकों के आगे लाइन में खड़े रहकर भ्रष्टाचार को मिटा देने को अपना योगदान समझ रहा था| शुरुआत में भ्रष्टाचारियों की बेचैनी बढ़ी तो देश झूम गया| गंगा में नोट बहने की बातें आई| सरकार और रिज़र्व बैंक ने रोज नए-नए नियमें बदली, नए नोटों से बदलाव की बातें आई मोदी ने भावुक होकर समर्थन माँगा तो लगा की देश की आर्थिक हालत फिर से इसे अच्छे दिनों की तरफ ले जा सकती है|

कालाधन वालों ने, काले कारोबारियों ने और टैक्स चोरों ने सबने मिलकर देश की उम्मीदों को धराशाई कर दिया| नेता, अफसर सभी दो-चार दिन की छुट्टी लेकर सारा माल खपा आये| नए नोटों से घूस भी लेना शुरू कर दिया मतलब इन लोगों में बदलाव की रफ़्तार नोट बदलने से भी ज्यादा तेज़ दिखी| ऊपर से सरकार का 50-50 का फार्मूला इनकी बची-खुची चिंता से निदान दिला गया| प्रधानमंत्री और वितमंत्री की काबिलियत में कैशलेस जनता का सपना तो है लेकिन इसी भविष्य की कैशलेस भारत की व्यवस्था में बेरोजगार युवाओं की एक बड़ी फ़ौज पेटीएम में बैलेंस की तलाश कर रही होगी| ऊपर से गरीब, निर्धन लोगों की स्कीम, उनके फायदे पर व्यवस्था की टेढ़ी नज़र होगी वहीँ सरकार का अमला उसे समय-समय पर परेशान करता रहेगा| प्रधानमंत्री चाहे जितने भी दावे कर लें, गरीबों के लिए गंभीर दिखें लेकिन जमीनी हकीकत उन्हें अनजान ही बना रखेगी| क्यूंकि ये सरकारी अमला कभी किसी अमीरों, रईसों के लिए बना ही नहीं| ये मासूम जनता ठगी भी जायेगी और उनके अधिकारों को सिमित भी रखा जाएगा|

गरीब पेटीएम जैसे मोबाइल वोलेट का प्रयोग करेगा ताकि फर्जीवाड़ा रुके, कालाधन समाप्त हो लेकिन कैसे? इन निर्धन लोगों की अशिक्षा का फायदा हाईटेक चोर-उचक्के आसानी से उठा लेंगे| इसलिए की एटीएम का पिन पूछ अमीरों, पढ़े-लिखों को जहाँ ठग लिया जा रहा तो हम इनलोगों के कैशलेस भारत में जीवन, उनकी दिनचर्या कैसे होगी, सोच नहीं सकते?

भारत के आर्थिक सुधारों की दिशा में सरकार का हर एक कदम उन 40 करोड़ आबादी का भविष्य तय करती है जिसे कभी वोट बैंक में तब्दील कर दिया जाता रहा है तो कभी राजनीती साधने के नाम पर शोषण कर लिए जाता है| नोटबंदी वाकई एक साहसिक कदम है, लेकिन सरकार से कहाँ चूक हुई? जिसका फायदा भ्रष्टों ने भरपूर उठाया|

सवाल इसलिए भी आया क्यूंकि किसी ने अमिताभ बच्चन, सलमान, अम्बानी, लालू जैसे धनकुबेरों को बैंक के बाहर नहीं देखा| किसी ने उफ़ तक नहीं की, सब मौन साध गए| केजरीवाल, मायावती या ममता का उछलना अपवाद ही रहा| राजनीतिक मतलबों के लिए आरोप-प्रत्यारोप का मसला दूसरा है लेकिन आर्थिक सुधारों के लिए अरबपतियों पर कोई असर न पड़ना ही एक सवाल है| क्योंकि सभी को पता है की सबसे ज्यादा कालाधन कहाँ और किसके पास है? फिर भी...
प्रधानमंत्री की कोशिशों और उनके राष्ट्र के प्रति समर्पण के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद और आभार...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...

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लूट लिया मोदी ने...

यक़ीनन मोदी ने भ्रष्टाचारियों का 70 साल का सब-कुछ लूट लिया| उन्हें नोट की जगह कागज़ थमा दी| उनकी पीढ़ियों के सुख-सुविधा के लिए जमा पूंजी बर्बाद कर दी| 8 नवम्बर की रात भारत के प्रधानमंत्री ने गुपचुप समूचे देश के बेईमानों के घर डाके डाल दिए| अमीरों का सुख-चैन छीन लिया| लोग खदबदा उठे, चिंतित हो गए लेकिन अपने प्रधानमंत्री के निर्णय, उनके इरादों का जमकर समर्थन किया| नोटबंदी का फैसला जनता के लिए भले ही तकलीफदेह हो लेकिन यह भारत की आर्थिकी में संजीवनी का काम करेगा और नए आर्थिक आयाम भी सिद्ध होंगे| लोग बैंकों की लम्बी कतारों में खड़े होकर भी देश की आर्थिकी की चिंता करने लगे हैं जो पहले राजनितिक संभावनाओं के लिए चायों की दूकान तक सीमित थी|

देश वाकई में तभी गंभीर, समझदार या ईमानदार बनता है जब उसे चलाने वाले देश के लोगों के उज्जवल भविष्य के लिए ईमानदारी दिखाए, गंभीर हो| भ्रष्टाचार, बेईमानी से कमाया धन भले ही चंद लोगों को सुकून देता हो मगर ईमानदारी की राह पर चलने वाले लोगों के वर्तमान में मोदी हैं, उनकी व्यवस्था में नोटबंदी जैसे फैसले भी हैं और भ्रष्टों को मिटा देने की सनक भी है| ये सोंच, ये गंभीरता और व्यवस्था में कायापलट की जरूरतों के बलबूते समाज बेशक नई ऊचाईयों पर जाएगा| अगर सब कुछ ऐसा ही होता रहा तो वो दिन भी दूर नहीं जब लोग अपने हक़ के लिए कमाएं, मानवता में यकीन करें और देश को अपना परिवार समझें| ये थोडा कठिन है पर असंभव भी नहीं|

नोटबंदी का व्यापक असर निश्चित तौर पर आम जन जीवन पर पड़ा है| लोग 500, 1000के नोट लेकर सड़कों पर भटक रहे हैं| घरेलु महिलाओं की बचत के बैंकों में आ जाने मात्र से ही देश की आर्थिकी में मुद्रा का प्रवाह काफी बढ़ जाएगा| बैंकों, एटीएम के बाहर लगी शांतिपूर्ण लाइनों से लोग इस फैसले को सहजता से स्वीकार भी कर रहे और मोदी को इस फैसले के लिए बधाई भी दे रहे| बड़े नोटों की जमाखोरी और नकली नोटों के चलन से न केवन हमारी विकास रफ़्तार में बाधा पहुँच रही थी बल्कि देश के अमीरों-गरीबों के बीच आय में गहरी खाई उत्पन्न हो गई थी| इसलिए भी की लोग पैसों के लिए शॉर्टकट का इस्तेमाल करते हैं| यही शॉर्टकट का प्रयोग लोगों को अथाह, अनगिनत पैसे-साधन तो उपलब्ध तो करा देता है लेकिन उनका जीवन अशांत हो जाता है| मन में पैसों का डर बैठ जाता है| सरकार और उसकी व्यवस्था को ठेंगा दिखाया जाता है और अंततः देश ऐसे लोगों से कराह उठता है और जनता मोदी जैसे को आगे लाने की जरुरत महसूस करती है|

आम जनता में कुछ लोग बेईमान जरूर हैं पर ख़ास लोगों में नेताओं और उनकी पार्टियों का बेईमानी पर कॉपीराइट है| नेता, अफसर, जमाखोर ही सबसे ज्यादा उत्पात मचाते हैं, लोगों को लुटते हैं लेकिन इस बार उनकी लुटी है और आम जनता मज़े ले रही है, तालियाँ ठोंक रही है| नगद लेन-देन के बलबूते चल रहे नेताओं और पार्टियां औंधे मुंह गिरी है| मोदी के फैसले के साथ समूचा देश खड़ा है, उन्हें जनता से वाहवाही भी मिल रही है और ऐसा प्रधानमंत्री पाने का सौभाग्य से उन्हें आशीर्वाद भी|

देश भविष्य में और भी होने वाले सख्त निर्णयों को झेलने के लिए तैयार खड़ा है| देश बदल रहा है... यक़ीनन देश बदलेगा, हम भी बदल रहे हैं... यक़ीनन हम भी बदल जायेंगें... ईमानदार हो जायेंगे...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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