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ashwani kumar
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उदयमान हिंदुत्व का प्रहरी बन लोकतंत्र को बचाने की नाकाम कोशिश करता एक युवा...
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ट्रंप के मेहमान मोदी
नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे से भारत-अमेरिका संबंध एक नई ऊंचाई पर गई है। अमेरिकी चुनाव में आतंकवाद और सहयोग के मसले पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिबद्धता भारत के नजरिए से फायदेमंद साबित हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ट्रंप से मुलाकात में जो गर्मजोशी दिखी वह भारत के लिए खासकर आतंकवाद के क्षेत्र में अमेरिकी सहयोग का स्पष्ट संकेत है।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सम्मान में ट्रंप का पहली बार किसी राष्ट्रध्यक्ष के लिए व्हाइट हाउस में डिनर का आयोजन भारत अमेरिका की द्विपक्षीय रिश्तों में कसावट महसूस कराती है। रक्षा खरीद, तकनीकी सहयोग, आतंकवाद के प्रति गंभीरता, परमाणु संधियों के लचीलापन, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान के मसले पर दोनों देशों की वार्ता काफी हद तक सफल रही है। भारतीय-अमेरिकी लोगों की एच-1बी वीजा के मामले में ट्रंप प्रशासन के कड़े रुख में मोदी के दौरे के बाद नरमी देखने को मिल सकती है। भारत और अमेरिका का आतंकवाद के ऊपर कड़ा रुख पाकिस्तान जैसे गैर जिम्मेदाराना देशों की बेचैनी बढ़ा सकता है।
चरमपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले तत्वों के प्रति ट्रंप-मोदी के साझा बयानों से समझा जा सकता है कि आने वाले दिनों में पाक जैसे आतंक पोषित देशों को कड़े प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है तथा मुल्क में विश्वशांति के लिए खतरा बन रहे चरमपंथियों पर अमेरिका कार्यवाही के लिए मजबूर भी हो सकता है।

इस तरह नरेंद्र मोदी के इस अमेरिकी दौरे में ट्रंप की गर्मजोशी और मेहमानवाजी साम्यवादी चीन के लिए एक संदेश है जो अक्सर उत्तर कोरिया को भड़का कर विश्व शांति के लिए खतरा बनने की कोशिशों में जुटा है। अमेरिका के पास वर्तमान में चीनी अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने तथा दक्षिण चीन सागर में उसकी दादागिरी से निपटने के लिए भारत सबसे मुफीद है। एशिया के अंदर अमेरिकी वर्चस्व को कायम रखने के लिए उसे भारत को नजदीकी साझेदार बनाना होगा।

इस तरह अगर देखें तो भारत के नजरिए से उसे संयुक्त राष्ट्र स्थाई सुरक्षा परिषद तथा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में सदस्यता के लिए फिलहाल अमेरिकी सहयोग की सख्त जरुरत है जिसे ट्रंप पूरा करते भी दिख रहे हैं।

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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नेतागिरी और गांधीगिरी
नेताओं की नेतागिरी और गांधी की गांधीगिरी में एक चीज कॉमन है वह जनता से चुटियागिरी!
नेताओं में गांधीवादी विचारधारा के कारण ही कोई कोर्ट-कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता भला गांधी जी के फोटो के नीचे एक गांधीवादी की विचारधारा का मजाक कैसे उड़ाया जा सकता है?

गांधी चरखे से शिकार करते थे और आजकल के नेता बंदूक से शिकार कर रहे हैं आधुनिकीकरण करना पड़ता है भाई! क्योंकि शिकार भी फुर्तीला हो चला है!
नेतागिरी में टोपी पहनना और सर झुकाना जरूरत है जैसे की गांधीगिरी में अनशन करना पुलिस की लाठियों को निमंत्रण है!

नेताजी से ज्यादा गांधीगिरी तो हमारे नेताइन जी को पता होता है यू माथे पर काला चश्मा टांगकर हीरोइनों वाली अदा में टाटा कंपनी का प्रचार करते मैसेज माउंटबेटन से कम नहीं दिखती! पार्टी पॉलिटिक्स अब सर झुकाते हैं उनके जलवे के ब्लोअर तले!

गांधी जी के अनेक प्रयोगों में नारी शक्ति का बेजा इस्तेमाल हुआ था इनसे सीखते हुए कितने नेता-नेताईन और पार्टी मोबाइल के आधुनिक दुनिया में मशहूर हो चुके हैं! आसाराम बापू तो बेचारे बदनामी के बाबा साहब बना दिए गए!
महात्मा गांधी के विचारों पर चलने का दावा करने वाले आजकल तेजी से अरबपति बनने जा रहे हैं तो कोई रोज उठकर चक्कर काट कर सेटिंग करने की फिराक में घूम रहा है और सेटिंग भी उसी गांधी के फोटो के नीचे होती रही है जहां बदलाव दिखने की बात लाल किले से चीखकर कही जा रही है!

गरीबों का हक छीन रहा है फिर भी देश में गांधीवाद मजबूती से खड़ा है! लोगों के नस-नस में भरा है! अरे भ्रष्टाचार तो अपवाद है क्या उखाड़ लेगा ये इकॉनमी का!इतने सालों से तो हो ही रहा है तो क्या विकास नहीं हुआ?
गांधीवाद इससे लड़ने के लिए पिछले 70 सालों से जूझ रहा है. वह भले ही अलग है कि अब अंग्रेजों का जमाना नहीं रहा!

बकलोली और संविधान से लौंडघेरी गांधी और बाबासाहेब के विचारों से प्रभावित होकर नेतागिरी के अधिकारों में जनता का सेंध लगाना ठीक वैसे ही यह संवैधानिक है जैसे चुनाव के वक्त नेता का गरीब के घर चला जाना!

गांधीवाद, समाजवाद, राजनीतिवाद करते रहो बेटा! मलाई खाने वाले मलाई खा खा कर तोंद फुला लेंगे लेकिन सूंघने तक नहीं देंगे साले...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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सामने से 56 इंच दिखाओ!

कश्मीर, गरीबी और नेता से देश का माहौल हमेशा रंगीन रहता है| मार-काट, भुखमरी और बेरोजगारी पेशेवर नेताओं और नेताइनियों का ग्लूकोज है| अरबपति दलित कहे जा रहे हैं और दलित अरबपतियों के लिए बलि चढ़े जा रहा हैं| मुल्ले पाकिस्तान की जीत पर पटाखे फोड़े जा रहे हैं और नेता उसका सबकुछ चाट रहा है|

सरकार राष्ट्रवादियों की है मगर राष्ट्रवादियों को ये समझ नहीं आ रहा की साला सरकार चला कौन रहा है? भयंकर धांसू हिंदुत्व का चोला पहनने वाली बीजेपी भगवा से घबरा क्यूँ रही है? राम मंदिर और धारा 370 के मसले पर हरियाली के प्रति बीजेपी और मोदी का सद्भाव सबका साथ- सबका विकास के कारण है या इस्लामी-सेकुलरों के डर से! देश में हिंदुत्व के शासन का प्रतिनिधि मौनमोहन का रिकॉर्ड तोड़ने वाले हैं! समूची पार्टी को सिर्फ चुनाव दिखने लगा लगा है, हाँ बीच में फुर्सत मिलने पर घूम-टहल भी आते हैं फॉरेन से!

बीजेपी ने युवाओं का सपना तोडा है| बेरोजगार बनाकर घर बैठा दिया, मोबाइल थमाकर जिओ दिला दिया! बेटा करते रहो फेसबुक, व्हाट्सएप्प! लड़ते रहो संघी-कांग्रेसी बनकर! रोजगार से ज्यादा जरूरी युवाओं के लिए हीरो-हेरोइन और बाहुबली का सस्पेंस दिखता है!
सत्ता पक्ष का इतना पिलपिला रूप कभी नहीं देखने को मिला जब विपक्ष में राहुल गाँधी और लालू के लाल जैसे नेता प्रायोजित किये जाते हों| फिर भी इनसे न तो वामपंथी संभल रहे न ही नक्सली| जिसे जो मन आता है वो भरपेट सरकार और मोदी को गरिया दे रहा है| क्या फायदा इतने प्रचंड पहुमत का जब आपसे एक कन्हैया एक उमर खालिद तक कंट्रोल नहीं होता? कांग्रेसी मध्य प्रदेश में दंगा करते हैं और आप ही के नेता अनशन पर बैठ जाते हैं! कश्मीर में मुल्ले सेना को घसीट-घसीट मार रहे और आप महबूबा के आशिकी के फंसे हो! पाक रोज अन्दर आकर देश के सीने में खंजर घोंप रहा और आप नवाजियत में उलझकर अमेरिका का मुंह ताकते हो! चीन तो आपके बस का है ही नहीं, छेड़ोगे तो अरुणाचल भी दे दोगे! बची खुच मर्यादा अमेरिका की चमचागिरी में ही ढीली कर ही लीजिये!

एक थी सोनिया, जो रात में भी लाठी चलवाकर कितनों को सलवार-कमीज पहना देती थी| कभी फिल होता है की ये बीजेपी की सरकार न होकर बिजली का खम्भा है, जिसपर हर विरोधी कुत्ते टांग उठाकर हल्का हो लेता है! अब आपके भक्तगण भी लाइन में लगने वाले हैं!
माफ़ कीजिये हमने आपको बहुमत इसलिए नहीं दिया था की विकास का मतलब रोज नए-नए टैक्स थोपकर इकॉनमी बेहतर करें! बेहतर होगा की जनता की जेब लुटने के बजाए अपने खर्चे पर लगाम लगाइए! नेताओं की सुविधा, वेतन-भत्ते में कटौती कीजिये| देशद्रोहियों की सुरक्षा हटाइए| ये आपके लिए मुश्किल हो सकता है क्योंकि आपने शायद लोकतंत्र की सारी मान-मर्यादा का ठेका ले रखा है|

डरते क्यों हो, सख्त बनो! जो भी जरा भी चोंच खोले या जिसको भी आजादी चाहिए सारे रासुका, पोटा, टाडा कानून थोप मारो| सीबीआई, ईडी को शेर की तरह चोरों के जंगल में छोड़ दो| असली राष्ट्रवादी चेहरा दिखाओ| कश्मीर पर खुल के बोलो, विरोध करे या आतंकवादियों का समर्थन करे सीधी गोली मारो| अमेरिका ब्रिटेन कोई विरोध करे तो बहिष्कार करो उसका| पाक में बलूचिस्तान और गिलगिट क्षेत्रों में सीधी हस्तक्षेप करो! चीन-पाक कॉरिडोर में अड़ंगे लगवाओ! सेना को राजनीति से दूर रखो, खुली छुट दो! इजराइल जा रहे हो, वहां से मोसाद को कश्मीर लाओ, सेना को ट्रेनिंग दिलवाओ और पाक के खिलाफ छद्म युद्ध छेड़ो! पत्थरबाजों पर सिर्फ पैलेट गन चलाओ, गैस-वैस से काम नहीं चलेगा! ज्यादा उलझे तो गोली चलाओ बाकी से मोसाद निपट लेगा! कोर्ट चूं-चां करे उसका भी इंतजाम करो!
भारतीय बाजार का इस्तेमाल करो और दुनिया में कारोबार के बदौलत सामरिक ताकत बढाओ! अधिकार-कानून की जो भी बात करे उसे बाजार से बैन करो और खौफ पैदा करो! सऊदी अरब और जापान-कोरिया जैसे देशों से नजदीकियां बढाओ! ईरान और सऊदी के बीच शिया-सुन्नी की लड़ाई का भरपूर फायदा उठाओ!

नेतागिरी और गांधीगिरी का कम से कम इस्तेमाल करो! विपक्ष और मीडिया को रिस्पांस देना बंद करो! जब जनता साथ है तो सारी ऊर्जा झाड़ू लगाने में बर्बाद मत करो! विकास बाद में हो लेगा!
रोल में आओ, सामने से 56 इंच दिखाओ! देखो कोई नहीं टिकेगा सब घाघरा उठाकर भागते मिलेंगे! फिर भी उसके चूतड पर बजाओ ताकि तथाकथित राष्ट्रवाद और असली राष्ट्रवाद में अंतर पता चलते रहे................

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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उपजाऊ खेतों में भूखा अन्नदाता

देश में किसानों की हो रही आर्थिक दुर्दशा भविष्य में कृषि क्षेत्र के प्रति किसानों की बेरुखी गंभीर खाधान्न संकट पैदा कर सकती है| भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि के योगदान को चुनावी लाभ का अड्डा बना देना बेहद निराशाजनक है| एक कृषि प्रधान देश में किसानों की आत्महत्या साबित करती है की खेती अब फायदे की जगह घाटे और मजबूरी का सौदा बनते जा रही है| राजनीतिक रंजिश में किसानों को बलि का बकरा बनाया जाना सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है|

मंदसौर में किसानों के साथ जो हुआ वो कोई नयी बात नहीं है| अक्सर सरकार और किसान भिड़ते रहे हैं और अपने हक़ के लिए लड़ने वाला किसान मारा जाता रहा है| लेकिन महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश से लेकर देश के अन्य खेतिहर राज्यों में किसान आन्दोलन का बढ़ता दायरा सरकार के लिए संकट पैदा कर सकता है| मतलब साफ़ है की किसान अब कर्ज माफ़ी और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे प्रावधानों को बेअसर मान रहे हैं| भयंकर सूखे या बाढ़ जैसे हालातों में किसानों को अपने हाल पर छोड़ना भारी पड़ रहा है| प्राकृतिक आपदाओं में किसान फसल बचाने की कोशिशों में पूरी तरह साहूकारों और सूदखोरों के चुंगुल में फंस रहे हैं| सरकार की फसल बीमा योजना धरातल पर किसी जुमले से अधिक नहीं दीखता| ऊपर से सरकारी महकमे का शिथिल और भ्रष्टाचारी रवैया इस योजना में किल ठोक देता है| ऐसा बिलकुल भी नहीं है की इस योजना का लाभ किसी को नहीं मिल रहा बल्कि इसका लाभ वो लोग उठा रहे हैं जो शिक्षित और संपन्न हैं|

कर्ज के जाल में छटपटा रहे किसानों की हालात बदतर होती जा रही है| आश्वासनों और कर्ज माफ़ी के वायदों से किसान कब तक अपना पेट भरता रहेगा? कर्ज लेने की आदत को सरकार दिन प्रति दिन बढ़ावा देती जा रही है| किसान को तो एक किलो प्याज के पचास पैसे मिल रहे हैं और उपभोक्ता उसे बाजार में तीस रूपये किलो तक खरीद रहे हैं| ये मुनाफाखोरी सरकार के अस्पष्ट नीतियों के कारण हो रही है| मुनाफाखोरी का ये खेल स्थानीय नेताओं के इशारों पर होता है जो अंदरूनी तौर पर जमाखोरी और मुनाफाखोरी को संरक्षित करते हैं| स्थानीय स्तर पर नेताओं का सहयोग न मिलना किसानों के शोषण के लिए कथित तौर पर जिम्मेदार है|
विभिन्न कृषि वैज्ञानिकों के सलाह को नजरंदाज करके राजनीतिक नफा-नुकसान हमेशा कृषि-सुधार में अड़ंगे लगाता है| सिंचाई के उचित प्रबंधन के मसले पर अरबों रूपये बहाने के बावजूद भी खेतों में पानी न के बराबर पहुँच रहा है| सरकार की मौसमी परिवर्तनों से फसलों को बचने की कोई स्पष्ट योजना अबतक नहीं दिखी है|

वर्तमान मोदी सरकार से किसानों को जो अपेक्षाएं है वो तीन साल गुजरने के बावजूद भी प्रभावी नहीं दिखती| न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढाकर पीठ थपथपाने के बजाये सरकार को ये देखना चाहिए की क्या किसान वास्तव में निर्धारित मूल्य पर खाधान्न बेच पा रहे हैं या उनके अफसरों की मनमानी का शिकार होकर बाजार में शोषित हो रहे हैं| स्थिति का अंदाजा सभी को है| सरकार की प्रतिबद्धता सभी को ख़बरों में दिख जाती है और कांग्रेस के वक्त भी दिख जाती थी, पर बदला क्या ये बताना जरुरी हो जाता है|

कर्जमाफी एक चुनावी हथियार है जिसका इस्तेमाल किसानों को लहूलुहान करने के लिए उसी के ऊपर किया जाता है| सबका भला हो जाता है, शौक से कर्ज लेने वालों का भी और किसानों को लुटने वालों का भी| लेकिन किसान से नहीं उबरता और न ही उबरेगा! कितना भी कोशिश कर लीजिये, कर्ज बाँट दीजिये फिर भी उसे आत्महत्या ही करना होगा| चमचे की नज़र में शौक हो सकता है पर वास्तव में वो मिट्टी के लिए दी गई कुर्बानी का एक उदाहरण बन जाता है|

खूब आयात कीजिये! सब बाहर से मंगवाइये! सस्ता पड़ता है और भारत बाजार के रूप में बड़ा भी बनता है! निवेशक आते हैं उससे खूब टैक्स वसुलिये, जनता का उद्धार कर दीजिये! किसान की क्या जरुरत है देश में! स्मार्ट बनो, खेतों में बिल्डिंग बनाओ, कंक्रीट के जंगल उगाओ और खाने के लिए भिखमंगे बन जाओ!
फिर देखो विकास किसे कहते हैं!...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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मेरे देश की मिट्टी नेता उगले!
देश के निक्कमे किसान अनपढ़ हैं!
उसे न तो जीएम टाइप फसलों की कोई जानकारी है और न ही हाइब्रिड बीजों और तेजी से बढ़ने वाले रासायनिक दवाओं का!
जब देखो सड़क पर उतरकर सरकार को कोसते हैं!
अरे भाई मेहनत करो, नेता टाइप जैसा!
देखो कैसे कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है!
सीखो कुछ इससे!

इन सारे किसानों ने सरकार और नेताओं का हमेशा भेजा खाया है!
भाई फसल नष्ट होती है तो सरकार को ठेका देते हो क्या?
मुनाफा में से एक हिस्सा पार्टी को चंदा दे दें ये भी तो न होता तुमसे!
साले फालतू का सड़क पर उतारकर डांस करते हो!
दूसरों के खेतों से चुराई सब्जियां फेंकने का नाटक करते हो!
तुमलोगों से बड़ा ड्रामेबाज और कमीनापन का मास्टर डिग्री है भाई इधर!

चुटिया समझते हो नेताओं को तुमलोग! सब वसूल कर लेंगे धीरे-धीरे!
सड़क पर आकर लौंडघेरी करना छोड़ दो नहीं तो अभी छह को ठोकवाये हैं आगे से लिस्ट में एक पेज और लगेगा!
आन्दोलन-फान्दोलन से कुछ नहीं उखाडोगे मेरा! है ही नहीं कुछ क्या उखाडोगे! ही ही ही....!
संभल जाओ भाई, जनता को चुतिया बनाना बंद करो!
सीधी बात है खेत में जाओ चुपचाप जोतो, उपजाओ और बेचो! फालतुगिरी नहीं करो!
कर्ज है तो चुनाव तक इन्तजार करो, उपाय हो जाएगा 10 परसेंट पर!
ज्यादा उछलोगे तो खेत में फैक्ट्री लगवा देंगे! जो है उससे भी हाथ धो बैठोगे!

को-ऑपरेट करो, साथ आओ, पार्टी के हित में चलो!
जनता का पैसा है तो का, लूटा दें क्या निकम्मों पर! फैसलिटी और विजिबिलिटी नेताओं का अधिकार है! चक्कर में मत पड़ो! और कानून संविधान का ज्ञान मत पेलो! अन्दर हो जाओगे तुरंत!

समझ लो बेटा ठंढे दिमाग से!
ज्यादा बौराओ नहीं! न तो सब बाहर से मंगवाने लगेंगे, ठंढा जाओगे तुरंत!
इसलिए कीप्स गोइंग ऑन विथ योर खेती एंड फॉलो संविधान!................

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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नगर निगम@पटना
पटना नगर निगम चुनाव में इस बार ज्यादातर सीटों महिला आरक्षित किया गया है| निगम के 72 वार्डों में लगभग वही हो रहा जो देश के अन्य चुनावों में होते हैं| जातीयता, वोटरों की खरीद-फरोख्त से लेकर तमाम महिला उम्मीदवारों को सिंबॉलिक बनाकर उसके घर के पुरुष वर्चस्व के लिए लड़ रहे| इसमें हर कोई अपना फायदा ढूंढने में लगा है| समर्थक का हुजूम टोलियाँ बनाकर अलग-अलग उम्मीदवारों के यहाँ अपना पेट पाल रहा है| नंबर वन का पोजीशन बताकर कईयों ने उम्मीदवारों की जेब भी काट ली है| धन-बल का चुनाव में प्रयोग इस बात का स्पष्ट सन्देश है की चुनाव बाद जीतने वाला जनता को लूटकर हिसाब बराबर करेगा| निकाय या पंचायत चुनाव में वोटरों की असमंजस अन्य बड़े चुनावों की तुलना में काफी गंभीर होती है|

नगर निगम एक स्वायत संस्था है जो राज्य सरकार के नगर विकास विभाग के अधीन आता है| किसी भी सरकारी संस्थान में एक नंबर करप्ट विभाग पीडब्लूडी के बाद नगर निगम को माना जाता है|
सब पैसा खाते हैं... लाइट से लेकर सड़क-पानी-बिजली और कूड़े तक में लुट मचा देते हैं| पार्षदों को जनता का दर्शन आसानी से नहीं मिलता| जनता किसी भी काम के लिए सबसे पहला हक़ पार्षदों पर करती है| लोग दौड़ जाते हैं उनके पास! दर्शन नहीं मिलता तो हल्ला मचा देते हैं! ज्यादा गुस्सा आया तो अगले चुनाव में देख लेने की धमकी के सिवाय उसके पास कोई आप्शन नहीं होता|
नेता कितना भी भाषण झाड़ ले की लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए है लेकिन साहब ये लिंकन का अमेरिका नहीं है! ये भारत है जहाँ डाल-डाल पर पैसे के भुक्खड़ बैठे हैं! वो भी किसी डाल पर आप भी बैठे मिलोगे! आसानी से दोगे तो ठीक है नहीं दोगे तो नोच डलवाओगे|
पानी के लिए सड़क जाम करो, बिजली के लिए सड़क जाम करो और पुलिस की लाठी खाओ! कोई नहीं सपोर्ट करेगा!
जनता का यही काम है! उसका प्रतिनिधि निगम की बैठकों में चोरी के पैसे से पुलाव, मिठाई- कोल्ड ड्रिंक के गुलछर्रे उड़ा रहा होता है| कमाई का नया-नया शोध व अविष्कार इन बैठकों के जरिये किया जाता है!
सड़क का टेंडर लेने के लिए भगदड़ मच जाती है! पांच की जगह तीन इंच ढलाई करके दो इंच की मलाई से तोंद पाल लेते हैं ये लोग!
शहर की नालियाँ हमेशा बजबजाती रहती है| सफाईकर्मी रोज सफाई करता है फिर भी दोष उसके काम को माना जाता है| कोई ये नहीं पूछता की लुटेरों ने जो नालियों का स्ट्रक्चर बनाया है उसमें बिहार के किस घटिया कॉलेज के इंजिनियर को लगाया था? साले पढ़े लिखे तो होते नहीं हैं लेकिन कमाने में एक नंबर के घाघ!

जनता को इस बार जितने वाले पार्षदों की बजानी होगी!
- हर काम पर नजर रखो. जरा सा भी गड़बड़ लगे तुरंत आरटीआई फाइल करो. पूरा हिसाब मांगो. जानकारी नहीं दे तो अपील में जाओ तुरंत देगा.
- वार्ड की तमाम योजनाओं की जानकारी रखो. सबसे ज्यादा पैसा ये लोग योजनाओं के अंदर लुटते हैं. ध्यान दो की किस किस को बेवजह स्कीमों का फायदा पहुँचाया गया है. कितने अमीरों को कॉलोनी दी गयी है. सब की सूचना सम्बंधित विभाग तक पहुँचाओ.
- सड़कों के शिलान्यास से लेकर उद्घाटन तक नज़र रखो. मेटेरिअल की क्वालिटी से लेकर मजबूती का अंदाजा लगाओ. शक हो तो फ़ौरन जबाबदेह विभाग को शिकायत भेजो. या फिर इंजिनीअरों का सड़क को पास सर्टिफिकेट देने के बाद ये खेल खेलो और उसे रूबी राय बना दो.
- बरसात में नालियों का स्पष्ट समाधान के लिए पार्षदों पर दबाब डालो. नहीं सुने तो सारे लोग इकट्ठे होकर उसके घोटालों के खिलाफ लिखा-पढ़ी शुरू करो. देखो कैसे नंगे पाँव दौड़ा चला आता है. जनता को चुतिया समझना बंद कर देगा.
- जो भी जीते उसे जनता के प्रति उत्तरदायी बनाओ. हर पार्षद को हर एक सप्ताह हर मोहल्ले में सभा लगाकर समस्या सुनने की आदत लगाओ. अगर ऐसा हो जाए तो जनता से जनप्रतिनिधि का मोहभंग जल्दी नहीं होगा.
- सीधी बात करो. काम करो या वापस जाओ. नहीं जाओगे या काम नहीं करोगे बैठकर जनता का माल खाओगे तो लोटा लेकर खेत में भिजवा दो.
जो खाया है वो हगवाओ, देखना अगली बार से खाने की जल्दी नहीं करेगा.

~ सही निर्णय लें, वोट को सार्थक बनाएं और लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में आगे बढें. अच्छा उम्मीदवार अगर नहीं चुन पाएं हों तो उसी को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके अच्छा बनाने का प्रयास आपसे अपेक्षित होगा.
(भाषा की निम्नता के लिए खेद है... परिस्थिति नेताओं के लिए ऐसे शब्द-इस्तेमाल को मजबूर करती है)
#Plese_cast_ur_vote
लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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नौकरी मुक्त भारत?

भारत में सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में तेज़ी से घटती नौकरियां, सरकार की नौकरी मुक्त देश की तरफ कदम बढ़ा सा प्रतीत होता है| सरकारी कर्मचारियों की रिक्त स्थानों में लगातार कटौती रोजगार की संभावनाओं पर करारा प्रहार है| विकास और आर्थिक प्रगति के तमाम दावों के बावजूद भारत में रोजगार का परिदृश्य और भविष्य धुंधला ही नजर आता है| एक रिपोर्ट में कहा गया है की बीते चार वर्षों से रोजाना साढ़े पांच सौ नौकरियां गायब हो रही है| यह दर अगर सरकार के मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया जैसी जुमलेबाजी से जारी रही तो वर्ष 2050 तक देश से 70 लाख नौकरियां ख़त्म हो जायेंगी|

इसी तरह रेलवे की गैर तकनीकी संवर्ग में बहाली का वर्ष 2015 की नियुक्ति प्रक्रिया भी सरकार के नौकरी मुक्त भारत के सपनों की भेंट चढ़ चुकी है| विभिन्न पदों के 18,252 नियुक्तियों को बहाली प्रकिया में लेटलतीफी का खामियाजा युवाओं को भुगतना पड़ रहा है| डिजिटल और कैशलेस इंडिया के सपने को हकीकत बनाने के लिए 4229 पदों को ख़त्म करके अब मात्र 14,023 रिक्तियां दिखाई जा रही है| मतलब साफ़ है की सरकार की मंशा सीधी तौर पर रेलवे को आईआरसीटीसी तथा अन्य कॉर्पोरेट दलालों को पूरी तरह सौंपने की दिखाई देती है| दूसरी तरफ रेलवे संसाधन की कमी का हवाला देकर नित्य नए नए किराये वृद्धि का प्रस्ताव देती रहती है लेकिन कर्मचारियों की नियुक्ति पर मौन साध लेती है| अभी हाल में अख़बार के रिपोर्टों के अनुसार केंद्र सरकार के विभिन्न दफ्तरों में 2 लाख से अधिक खाली पड़े क्लर्क ग्रेड की नौकरियां समाप्त कर दी गयी| मतलब, भविष्य में रोजगार और बेरोजगारी के मुद्दों पर युवाओं को रिक्तियां न होने का परमानेंट जबाब सरकार ने ढूढ निकला है|

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट है की सरकार का लक्ष्य 2020 तक राजकोषीय एवं राजस्व घटे को कम करने की है| इसका सबसे बेहतर उपाय युवाओं के हक़ को छिनकर नेताओं के गैर-जरूरी और अय्याश्बाजी पर जनता का पैसा उडाना है| गैर-आधिकारिक स्त्रोत के मुताबिक सरकार ने पिछले कुछ सालों में उधोगपतियों का लगभग 32 लाख करोड़ का कर्ज माफ़ किया| सच्चाई की पुष्टि के लिए तो हम युवाओं के पास न तो संसाधन है और न ही जनता की कमाई को लुटाने का खैराती अधिकार! फिर भी सरकार के रवैये से एक नजरिये में सच भी प्रतीत होता है| इसी तरह माल्या जैसे रईसों के 9,000 करोड़ रूपये लेकर भाग जाना सरकार की राजकोषीय और आर्थिक नीतियों के लिए एक मामूली घटना होती है जिसे समय-समय पर जनता के ऊपर नए-नए टैक्सों और अतिरिक्त सेस जोड़कर घाटे की पूर्ति कर ली जाती है|

सरकार की आर्थिक नीतियों में रोजगार की संभावनाओं की अनदेखी भविष्य में भयावह सामाजिक असमानताओं के ओर स्पष्ट तौर पर इशारा कर रही है| सरकारी विभाग कर्मचारियों और अधिकारियों की व्यापक कमी से हांफ रहा है, फिर भी सरकार रोज नये-नये स्कीमों को लादकर अपनी पीठ खुद थपथपा रही है| सरकार की नज़र में अर्थव्यवस्था में काफी तेज़ी से बढ़ रही है| सेंसेक्स काफी तेज़ी से नयी उचाईयां छू रहा है| रेटिंग एजेंसीयां भारत को एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति भी मानने लग गया है| बस समस्या यही है की अगर सरकार नौकरियां जारी करने लगे तो अर्थव्यस्था चौपट हो जायेगी| फिजूलखर्ची बढ़ेगी, खजाने पर दबाब बढेगा! लेकिन नेताओं की वेतन-सुविधा वृद्धि आर्थिकी की रफ़्तार में गति लाती है!
हद है भाई जनता को चुतिया बनाने की!

अवसर की समानता के नाम पर सरकार ठेके पर नौकरियां देने लगी है| युवा नौकरी की तलाश में वक्त, समय और पैसा सब बर्बाद कर रहे हैं, लेकिन सरकार आर्थिक नाकेबंदी का हवाला देकर युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दे रही है| अक्सर नौकरियां देने के मसले पर सरकारी अमला आंकड़ों का सहारा लेकर बड़ी आसानी से युवाओं को ये समझा देता है की सरकार पूरी तरह से उनकी रोजगार की जरूरतों की दिशा में काम कर रही है बस सपना देखते रहे! अक्सर नौकरियों को सरकारी खजाने पर बोझ समझा जाता है पर उसी खजाने का एक बड़ा हिस्सा नेताओं के वेतन, पेंशन और सुविधाओं पर गैर-जरूरी खर्च होता है|
कभी नेताओं, मंत्रियों की संख्या को आर्थिक बोझ क्यों नहीं माना जाता? अगर दफ्तरों में 50 फीसदी कर्मचारियों से ही जनता का काम चल सकता है तो फिर 50 फीसदी सांसद, मंत्रियों से सरकार क्यों नहीं चल सकती? एसी कमरों और होटलों में ही सरकारी बैठकें क्यों होती है? एक महीने लिए भी सांसद या विधायक बनने वालों को जनता के पैसे जीवन भर पेंशन देने का खैराती अधिकार सरकार को किसने दिया?

सवाल बेहद तीखे और गंभीर हैं| राजकोषीय घाटे की आड़ में जनता और युवाओं से चुतियागिरी करने का साहस उन्हें हमसे ही आता है| वे जिस लोकतंत्र और संविधान के हवाले हमारे भविष्य से खिलवाड़ करते हैं, उसे उसी की भाषा में उनकी राजनीतिक भविष्य को ठिकाने लगाना होगा|
नहीं तो एक दिन सारे युवा इन चोरों का गुलाम बनकर किसी पार्टी का झंडा कंधे पर ढोते नज़र आओगे... कभी अतिराष्ट्रवादी बनकर... तो कभी बाबा साहब और संविधान के झूठे रक्षक बनकर... तो कभी किसी के गुलाम बनकर हक़ छिनवाते रहोगे...
दलाल ही कहलाओगे और कुछ नहीं...
लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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अभिभावकों की जेब पर स्कूलों की डकैती

देश में प्राइवेट स्कूलों की संगठित लूट अभिभावकों की आर्थिक आजादी को सीमित कर रही है| किताब, कॉपी, ड्रेस, ब्रांडेड जूते से लेकर अंडरवियर तक की दुकानें स्कूलों में खुलने लगी है| एमआरपी और खुदरा मूल्य या बाजार के नियमों में हेरफेर करके कैसे मुनाफा कमाया जा सकता है ये अब आईएमएफ वालों को हमारे प्राइवेट स्कूलों से सीखना चाहिए| बच्चे को अंग्रेजी सिखाने के सपने में गरीब अभिभावकों की चमड़ी उधेड़ ली जा रही है| मौसम के मिजाज के अनुसार अभिभावकों को दो गुने दाम पर कम-से-कम एक जोड़ी ड्रेस खरीदनी पड़ रही है| कई स्कूलों में सप्ताह में तीन अलग-अलग रंगों के यूनिफार्म पहनकर आने की गाइडलाइन जारी है| ड्रेस का कलर हर साल बदल दिया जाता है ताकि नया खरीदना पड़े| जूते से लेकर मोज़े तक के डिजाईन और कलर में फेर बदल की जाती है ताकि उसका कोई छोटा भाई या बहन इस्तेमाल न कर पाए| हर स्कूल अपने-अपने ठगने के नियमों में नियमित संशोधन करते रहते हैं| स्कूलों ने अपने हिसाब से किताबें छापकर मनमाने दाम वसूलने का इंतजाम कर रखा है और हर साल बच्चे को विद्वान बनाने की कोशिश में उसकी कवितायों या मुख्य पृष्ठ में बदलाव कर दिया जाता है ताकि वो किसी किसी के पुराने किताब न खरीद ले|

आजादी, आर्थिक स्वतंत्रता जैसे जुमले राजनीति में खूब तरक्की कर रही है पर स्कूलों के मसले पर हवा टाइट हो जा रही है| कई जागरूक अभिभावक स्कूलों के इस संगठित लूट पर इकठ्ठे होकर विरोध-प्रदर्शन भी कर रहे हैं और डीएम से लेकर प्रधानमंत्री तक को भी लिख रहे हैं| भले ही असर कुछ नहीं हो रहा हो पर ये हांथ-पैर जरूर चला रहे हैं| सीबीएसई का गाइडलाइन नेताओं, अफसरों और उपरी पहुँच वाले लोगों पर लागू नहीं होता| हर साल हंगामा मचाता है और हर साल नए-नए ढेर सारे दिशानिर्देश दिल्ली से निकलती है पर स्कूलों तक नहीं पहुँचती| बल्कि इससे उलट प्राइवेट स्कूलों की मनमानी दिन पर दिन बढती जा रही है| राजनीतिक पार्टियाँ इस मसले पर कभी गंभीर नहीं होती क्योंकि प्राइवेट स्कूल काले धन उगाही का एक बड़ा सुरक्षित अड्डा माना जाता है| चंदे की राशि का दोगुना, तिगुना बच्चों के माँ-बाप से वसूले जा रहे हैं|

इस तरह के लूटेरे टाइप स्कूलों में पढनेवाले बच्चे adidas, action के जूते पहनकर उसैन बोल्ट नहीं बन सकते और न ही एक्स्ट्रा एक्टिविटी में समय बर्बाद कर ओलिंपिक में पहुँच सकते हैं| नर्सरी के बच्चों को 5-6 हज़ार की किताबों से पढ़कर न्यूटन तो नहीं बनाया जा सकता या लाखों-लाख एडमिशन फी वाले स्कूलों में पढ़ाकर बच्चे को आइन्स्टीन भी पक्का नहीं बनाया जा सकता| हद तो ये भी है की कई स्कूलों ने शर्ट के बटन में भी स्कूल का लोगो खुदवाया हुया है जिसके टूटने पर 20-30रु० का इंतजाम हो ही जाता है| साइंस किट और स्टेशनरी के सामानों की आज के जरूरतों के हिसाब से बहुत जरुरी है, तो इस तरह से आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसे लोग झूठे होंगे|

अभिभावकों को लाचार बना दिया गया है| विरोध करने पर बच्चे को स्कूल से निकाले जाने की धमकी भी उन्हें ‘मदर ऑफ़ आल बम’ की तरह ‘मदर ऑफ़ आल धमकी’ जैसी शक्ति देता है| अनुशासन के नाम पर लेट फाइन ठगी का नया अविष्कार है| पेरेंट्स-टीचर मीटिंग का एकमात्र उद्देश्य अभिभावकों को बच्चे के भविष्य के नाम पर ब्लैकमेल करके उनकी जेब लूटना है| स्कूलों की इन गुंडागर्दी का परोक्ष कारण स्कूल के मालिक का पूर्व आईएस, आईपीएस या नेता होना है|
स्कूलों के लूटकर पैसे कमाने की सनक बच्चे का भविष्य क्या बनाएगा नहीं पता, पर उसे संगठित तौर पर ठग जरूर बना सकता है|

प्राइवेट स्कूलों की बढती मनमानी शोषण का नया तरीका भी कहा जा सकता है और पढ़े-लिखे नागरिकों को आर्थिक गुलाम बनाने की आधुनिक कला भी| गुलामी का ये चक्र अंग्रेजों से भी भयावह है और निश्चित ही वो एक मानसिक गुलामों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रही है न्यूटन, आइन्स्टीन बनने के सपने में बेरोजगार बनकर सरकार के आंकड़ों का गुलाम जरूर बन बैठेगा...
नहीं तो राजनीति का जरूर...

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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लाल बत्ती भाई को मेरा ख़त

लाल बत्ती भाई, इतने दिनों तक नेताओं, अफसरों और अमीरों के सर पर चढ़े रहने के बावजूद भी तुम्हें देश याद नहीं करता था| जो देश की सवारी करता था तुम उसकी सवारी करते थे, इसलिए हम तुम्हें याद कर रहे हैं, देश याद कर रहा है| क्योंकि तुम 1 मई से किसी कबाड़ख़ाने में पड़े रहोगे या बच्चे के खिलौने बनकर उनकी तोड़फोड़ सहोगे| अंग्रेजों के जमाने से ही तुम चमचमाती और लूटी गई गाड़ियों की शान रहे हो, वीआईपी का सिंबल रहे हो पर तुम आम आदमियों को कभी भी तनिक न सुहाए| बत्ती के अन्दर मुंडी घुमाकर देश चलाने वाले से लेकर देश बेचने वाले तक की चमचागिरी की फिर भी तुम्हें गरीबों की हाय लगी| तुम घमंड करो न करों लेकिन तुम्हारे नीचे गाडी में बैठने वाला तो तुम्हारे दम पर खुद पर घमंड करता था|

पुलिस, व्यवस्था या अधिकारी सब को तुम डराते थे| मुफ्तखोरी के सिंबल से भी कहीं-कहीं नवाज दिए जाते थे| नियम-कानून सब तुम्हें देखकर आँखें मूंद लेते थे| और वो तुम्हारा भाई हूटर...
उसने उसने तुम्हारे साथ मिलकर ट्रैफिक व्यवस्था को जैसे बजाया है, वैसे ही अब मोदी तुम्हारी बजा रहा है| ध्वनि प्रदूषण हूटर से तो होता ही था, लेकिन गरीबों-बेसहारों के आँखों से जो तुम प्रकाश प्रदूषण करते थे, उससे उनकी तिलमिलाई आँखों ने तुम्हें नजर लगा दिया| अमीरियत और शख्सियत का शान अब कबाड़ी में बेचे जाने का इन्तजार करेगा| पता है लाल बत्ती भाई, तुम उसी नियम-कानून से गाड़ियों से उतारे जा रहे हो, जिस कानून का तुम्हें नेताओं ने कभी सम्मान करना नहीं सिखाया| सिपाही-थानेदार अब तक जो देखते ही सॉल्लुट मारते थे, अब वही तुम्हारे कारण गाड़ी रुकवाएगा और मुक़दमा चलाएगा|

तुमने अपने जीवनकाल में मुफ्तखोरों से लेकर अपराधियों, देशद्रोहियों और ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ लोगों तक का सफ़र तय किया| पैसा, पॉवर और रुतबे को नजदीक से देखा| ईमान बेचते देखा, ईमान खरीदते देखा, गरीबी को अमीरी का पाँव पड़ते भी देखा और तुम्हें पाने के लिए वो सबकुछ करते देखा जो नहीं देखना चाहिए| लेकिन लुच्चे-लफंगों के सर पर बैठकर तुम्हारा मन नाचने को पक्का नहीं करता होगा| क्योंकि माना की तुमको अंग्रेजों ने बनाया, पहचान दिलाया फिर भी हो तो तुम भारतीय ही| गरीबों के अधिकारों के हत्यारे भी तुम्हारे कारण उन्हीं गरीबों के बीच इज्जत और जयकारे पा जाते थे, इसलिए दोषी तो तुम भी हुए!

पर लाल बत्ती भाई, राजनीति को तुमसे बेहतर किसने समझा होगा? सत्ता का असली सुख नेताओं को तब महसूस होता था जब तुम अपने भाई हूटर की आवाज पर नाचते हुए सड़कों से गुजरते थे| ईमानदारी से कहूँ तो मैंने जितनी भी बार तुमको देखा है मैं तुमसे जला हूँ| मेरे जैसे कितनों के सपनों के अरमान थे तुम| तुम्हारा रंग पाने की चाहत में युवा खुद को पसीने के रंग में रंग दे रहे हैं| कोई तुम्हें पाने के लिए शॉर्टकट अपनाता है और वह राजनीति ने नाम पर चमचागिरी की सड़ांध मारती गटर में खुद को उतारकर हाईकमान की कृपा का इन्तजार करता है|

पर सच कहूँ लाल बत्ती भाई तो तुम्हारे आगे लगी सरकारी नेम प्लेट तुम्हारी सफलता की गारन्टी लेता था| नहीं तो मैंने कई बार तुम्हें फिरे ब्रिगेड की गाड़ियों से जाम छूटने के इन्तजार में पसीने से तर-बतर देखा है| और तुम्हारा पडोसी, नीली बत्ती! उसे एम्बुलेंस की छत पर चढ़कर शर्मिंदा होना पड़ता है क्योंकि उसकी अहमियत बताने वाला डंडाधारी उसमें नहीं बैठा होता| तुम नेता ले जा रहे होते हो और वह जीवन ले जा रहा होता है फिर भी नेताओं के आगे जीवन का कोई मोल नहीं| वैसे भी नेताओं के नजरिये से आबादी में संतुलन बेहद जरूरी है पर हाँ लोकतंत्र के लिए नेताओं की आबादी में संतुलन नहीं होनी चाहिए!

तो लाल बत्ती भाई, तुम जा रहे हो... बहुत कमी खलेगी.... हमारे नहीं, नेताओं की जिन्दगी में| क्योंकि अब कौन डराएगा?
पुलिस-प्रशासन, टोल-नाके सब उन गाड़ियों को टोका-टोकी करेंगे| हाईवे पर ट्रक वाले से कुटाई का डर रहेगा और ट्रक वालों का लहरिया कट ओवरटेकिंग का एक नया दौर शुरू होगा| और तो और टेम्पों वालों से भिड़ने पर माननीय को दो-चार झापड़ लगने का भी पूरी सम्भावना रहेगी...
#क्योंकि_हर_भारतीय_VIP_है

तुम्हारा शुभचिंतक
अश्वनी...
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अंबेडकर का महिमामंडन

संविधान के निर्माता व दलितों का मसीहा कहे जाने वाले डॉ भीम राव अंबेडकर का महिमामंडन उनकी शख्शियत को सीमित कर रहा है| राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए या आरक्षण की मांग को लेकर दलित-दलित चिल्लाने वाले अंबेडकर को बेच रहे हैं| उनके सपने को व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनाया जा रहा है| रोज नए-नए दलित प्रेमी पैदा हो रहे हैं और अंबेडकर बनने की चाह में दलितों के अधिकारों का सौदा कर दे रहे हैं| कोई वेमुला आता है तो कोई जेएनयू से कन्हैया आता है| दोनों को आजादी चाहिए, बस फर्क इतना है की उन्हें उनके अंबेडकर के संविधान से आजादी चाहिए, स्वार्थ से नहीं| राजनीतिक ठेकेदारों से पूछना चाहिए की जातियता के विमर्श में दलित होने का अधिकार उनसे कौन छीन रहा है? दलित होने से कौन रोक रहा है?

दलितों के सामाजिक उत्थान की कोशिशों का समूचा ठेका बाबा साहब के पास पड़ी है| आरक्षण के प्रावधानों में दलितों के लिए खूब सोंचा गया, उनके भविष्य निर्धारण के लिए दूसरों का हक़ तक छिना गया| फिर भी आज दलित दलित क्यों है? अंबेडकर के सपनों को लागु कराने वाले ठेकेदार करोड़ों की गाड़ियों में कैसे घुमने लगे? अंबेडकर के नाम और उनकी मूर्तियों का इस्तेमाल करके दलितों के लोकतान्त्रिक अधिकारों को किसने हड़पा? अगर ऐसा था तो रोहित वेमुला की क्रांतिकारी आदर्शों के सामने अंबेडकर की क्या जरुरत है|

भेदभाव-छुआछुत के उन्मूलन के लिए संविधान में बाबा साहेब ने कड़े प्रावधान बनाए| संविधान का निर्माण किया, देश के लिए सोंचा न सोंचा पर दलितों-शोषितों की बेहतरी के लिए खूब दिमाग खपाया| अंग्रेजों के कानून बदले न बदले पर दलितों के लिए कानून बदले, आर्थिक मदद का इंतजाम किया और समानता के सपने देखे| फिर भी दलित उतना क्यों नहीं बदला जितना बदलना चाहिए था? दलितों की विकास रफ़्तार अन्य जातियों के पैरों में दलित विरोधी की बेड़ियाँ लगे होने के बावजूद भी कम कैसे रही? आजादी के इतने सालों के बाद आज जब समाज, उसकी संकीर्ण सोच, उसकी मानसिकता और व्यव्हार में जो व्यापक परिवर्तन हुआ है फिर भी जातियता के बंधन में दलित शब्द का चोट अंबेडकर को घायल करता है| ये चोट जातिवाद के उस संकीर्ण मानसिकता का परिणाम है जिसमें एक दलित ही दलित का उत्थान नहीं चाहता है|

डॉ भीम राव अंबेडकर एक अच्छे संविधान निर्माता हों न हों लेकिन एक अच्छे समाजसेवी जरूर थे| इतिहास उठाकर देखें तो डॉ राव के सन्दर्भ में ढेरों बातें शोर पैदा करती है| आजादी में उनका कोई योगदान ने होने से लेकर गोलमेज विवाद, ब्रिटिशों का पक्ष लेने से लेकर लन्दन में टाई-कोर्ट पहनकर स्वदेशी आन्दोलन का मजाक बनाने तक है| बौद्ध बन जाने तक भी है और आरक्षण विवाद तक भी| शायद इसलिए भी आरक्षण व्यव्स्था उनके दलित होने की सोंच की ही उपज थी|
आरक्षण से देश जोड़ने की हकीकत में एक तरफ आज दलितों का उठता जीवन स्तर और बढ़ती सामाजिक स्वीकार्यता है तो फिर दूसरी तरफ आरक्षण का लाभ उठाये अयोग्यों से देश चलवाकर देश को फिर से सोने की चिड़िया बनने के सपने भी हिलोर मार रही है....!!!
बस दलित-दलित चिल्लाकर या अंबेडकर की मूर्ति बनाकर दलितों के लोकतान्त्रिक अधिकारों को खरीदों मत !!!

लेखक:- अश्वनी कुमार, जो ब्लॉग पर ‘कहने का मन करता है’ (ashwani4u.blogspot.com) के लेखक हैं... ब्लॉग पर आते रहिएगा...
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