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Bijay Kumar Singh
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स्वामी विवेकानन्द ने स्वाधीनता प्राप्ति के ५० वर्ष पूर्व ही, राजनैतिक स्वाधीनता कि प्रयोजनीयता को स्वीकार करते हुए भी, यह बात स्पष्ट रूप से समझा दिया था कि- " यथार्थ मनुष्यों का निर्माण किए बिना, केवल राजनातिक स्वाधीनता प्राप्त करने मात्र से ही देश की मूल समस्याओं का समाधान हो पाना कभी संभव न होगा। वे जानते थे कि भ्रष्ट, स्वार्थी, देशद्रोही, अमानुषों का नेतृत्व कभी भी भारत कल्याण नहीं कर सकता।उस समय स्वामी विवेकानन्द में श्रद्धा रखने वाले बहुत कम लोग ही यह सोच पाते थे कि- " मनुष्य बनना और मनुष्य बनाना " ही स्वामीजी के संदेशों का सार है, या 'मनुष्य-निर्माण' ही उनके समग्र चिंतन का केन्द्र-बिन्दु है। या उनके भारत-निर्माण सूत्र- " Be & Make" के निर्देशानुसार केवल यथार्थ मनुष्य गढ़ने से ही भ्रष्टाचार को मिटाया जा सकता है और देश कि समस्त समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।"

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'Man-Making'- is never possible only through bookish learning. The youth should, ' plunge Heart (soul), Head (mind) and Hand (body) ' or "3H"- into self-less work for the good of others. That is the only way to follow the 'motto' provided by Swamiji in his pointed and forceful expression: " BE AND MAKE. "

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पूर्ण को कभी अपूर्ण नहीं बनाया जा सकता।......तुम लक्ष्य तक पहुंच चुके हो-जो भी गन्तव्य है। मन को कदापि न सोंचने दो कि - तुम लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाये हो। हम जो कुछ सोंचते हैं, वही बन जाते हैं। यदि तुम अपने को हीन पापी सोंचते हो तो, तुम अपने को सम्मोहित कर रहे हो।....यह सब कौतुक है। " (९:१४३)
* 'BE AND MAKE ' का अर्थ है - स्वयं एक पैगम्बर बनो और दूसरों को भी पैगम्बर बनने में सहायता करो !..." अंगूर कि लता पर जिस प्रकार गुच्छों में अंगूर फलते हैं, उसी प्रकार भविष्य में सैंकडो ईसाओं का आविर्भाव होगा."(७:१२) -स्वामी विवेकानन्द

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हे भारत ! मत भूलना की ,तुम्हारी नारी जाति का आदर्श -सीता,सावित्री और दमयन्ती है। मत भूलना कि , तुम्हारे उपास्य -उमानाथ ! सर्वत्यागी शंकर हैं !

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ठीक ऐसा ही प्रश्न भागवत में जड़भरत और राजा रहूगण संवाद में मिलता है -महात्मा जड़भरत जी सिन्धु देश के राजा रहूगण से कहते है - हे राजन ! तुम मुझसे पूछते हो कि मै कौन हूँ ? किन्तु तुम स्वयं से पूछो कि तुम कौन हो ? जगत स्वप्न जैसा है।

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युक्ति-तर्क के परे अस्तित्व की अनेक उच्चतर अवस्थायें हैं। वास्तव में धर्म-जीवन (विवेक-जीवन) की पहली अवस्था --तो बुद्धि की सीमा लाँघने के बाद (समाधि अवस्था से पुनः शरीर में लौट आने के बाद) ही शुरू होती है। जब तुम विचार, बुद्धि, युक्ति -इन सबके परे चले जाते हो, तभी तुमने भगवत्प्राप्ति (अर्थात भगवत्चरित्र-प्राप्ति) के पथ में पहला कदम रखा है ! यही जीवन का सच्चा प्रारम्भ है ! [ मेरी अनपढ़ (केवल पाँचवीं पास) 'गिरिजा बुआ' जी दीक्षित लोगों को कहती थी जय श्री सचतानन् -और निगुरा लोग को कहती थी --तोर जनम होल-व -हे?) दिस दैट इज कॉमनली कॉल्ड लाइफ इज बट ऐन एम्ब्रीओ-स्टेट। जिसे हम साधारणतः (अज्ञान की अवस्था या हिप्नोटाइज्ड अवस्था में ) जीवन समझते हैं, वह तो असल जीवन (भगवत-चरित्र प्राप्त अवस्था या डीहिप्नोटाइज्ड अवस्था) की भ्रूण-अवस्था (अपूर्ण दशा) मात्र है। (इसीको रॉबर्ट ब्राउनिंग कहते हैं मैन पार्टली इज फुल्ली होप्स टु बी)

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