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डॉ. कौशलेन्द्रम
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कहने को कुछ ख़ास नहीं -----------अभी तक विद्यार्थी हूँ ------- आँखें खुली हैं इसलिए थोड़ा बेचैन रहता हूँ . अलग पगडंडी पर चलना अच्छा लगता है. शेष धीरे-धीरे आपको पता चल ही जाएगा --------न भी पता चले तो क्या फर्क पड़ता है ? बस, आइना साफ़ रहे --------यही प्रयास रहेगा . जय हिन्दी ..जय भारत ...जय आर्यावर्त...
कहने को कुछ ख़ास नहीं -----------अभी तक विद्यार्थी हूँ ------- आँखें खुली हैं इसलिए थोड़ा बेचैन रहता हूँ . अलग पगडंडी पर चलना अच्छा लगता है. शेष धीरे-धीरे आपको पता चल ही जाएगा --------न भी पता चले तो क्या फर्क पड़ता है ? बस, आइना साफ़ रहे --------यही प्रयास रहेगा . जय हिन्दी ..जय भारत ...जय आर्यावर्त...

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नक्सली आतंक के नाम तीन कवितायें ...(सुकमा में हुये हमले के सन्दर्भमें)
1- चिंतित
हैं पच्चीस सिपाहियों की वे
पच्चीस विधवायें जिनके
पति मार दिये गये चिंतागुफा
में घात लगाकर । चिंतित
हैं बिलखती विधवायें कि क्या
बतायेंगी जब बड़े
होकर पूछेंगे बच्चे माँ ! किस देश
की सरहद पर मारे गये मेरे पिता ? किस
शत्रु देश के योद्धाओं ने मारा मेरे ...

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धन्यवाद सिंगापुर !
आदरणीय
ब्लॉग पाठको !   सादर नमस्कार ! विगत कई वर्षों से आप सब हमारे साथ हैं ।
विश्व के प्रायः सभी देशों के सुधीजन हमारे लेखन के साक्षी रहे हैं । अभी तक
उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार भारत और अमेरिका के पाठकों ने हमें अपना सर्वाधिक स्नेह
दिया है किंतु पिछले कुछ दिन...

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आस्तिक देश के नास्तिक लोग...
        भारत
सदा से ही विदेशी आक्रांताओं, बलात्कार, लूट और हत्याओं की श्रृंखलाओं से जूझता
रहा है । विदेशी आक्रांताओं के बलात्कार से उत्पन्न संतानों में अपराध और क्रूर
हिंसा के दुर्गुण आज भी विद्यमान हैं और अब वे भारतीय समाज में कैंसर की तरह
घुलमिलकर भितरघात...

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प्रगति प्रतीप
  मेरा आदर्श है वही
सत्य जो मुझे दिखायी देता
है   मेरा आदर्श है वही
सत्य   जो मुझे सुनायी देता
है मैं लड़ूँगी सत्य के
लिये   मैं लड़ूँगी न्याय के
लिये   जगाने हैं मुझे   सोते हुये मज़दूर और
किसान नहीं स्वीकारना मुझे   तुम्हारे ढकोसले...
तुम्हारे बलात्कारी भगवा...

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अ-संस्कृति की ओर
दादा जी के मुँह से कभी-कभार निकलने वाला एक वाक्य अब
बारबार निकलने लगा है – “अब तो भगवान ही मालिक है इस देश का”। दादी जी सांत्वना देती
हुयी पूरी आशा के साथ कहने लगी हैं – “देर है, अन्धेर नहीं । कभी तो अवतार लेंगे
भगवान । यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,...

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झुकते-झुकते
हमने जल
बिन मेघ घनेरे इधर-उधर देखे हैं फिरते । घिर कर
चक्रव्यूह में सबने अभिमन्यु अनेकों देखे मरते ॥ संदेहों
के मेघ विषैले लिये पोटली में सब फिरते । कुछ
चमकीले लोग न जानें कितने दाग छिपाये फिरते ॥   पल-पल
मरते वे जीते-जीते, हम जीते हैं मरते-मरते । बीत गया
क...

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मार्क्स का नया अवतार – फ़्रेंकफ़र्त स्कूल
हम मानते हैं कि ‘सामाजिक समानता’ समाज की एक उच्च आदर्श
स्थिति है । यद्यपि व्यावहारिक धरातल पर इस स्थिति को अपने पूर्ण आदर्श स्वरूप में
प्राप्त कर सकना सम्भव तो नहीं तथापि सामाजिक समानता की अधिकतम स्थिति को प्राप्त
करना सम्भव है और इसके लिये सत्ता एवं समाज क...

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आलोचना का सिद्धांत (The theory of Criticism)...
आलोचना (Criticism) एक सामान्य एवं स्वाभाविक बौद्धिक प्रतिक्रिया (Cognitive
reaction) है जो बौद्धिक एवं आचरणजन्य
विकारों से मुक्ति (emancipation from the intellectual morbidity and moral deviation) की दिशा में परिमार्जन (Ablution) का प्रथम चरण
होती है । यह व...

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पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने
“मेरे
पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा” किसी
सैनिक की मृत्यु का कारण क्या है, देश या युद्ध ? जब गुरमेहर ने ‘देश’ को नहीं
‘युद्ध’ को सैनिक की मृत्यु का कारण बताया तो हलचल मच गयी । हर वह बच्चा गुरमेहर
हो सकता है जिसके पिता युद्ध में मारे गये हैं । यदि...

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राष्ट्रवाद और देशप्रेम
  कबीला तंत्र से लेकर देश और राष्ट्र
तक की अवधारणा के लिए समाज के एक विशाल संकुल को दीर्घ यात्रा करनी पड़ती है । मानव
इतिहास में यह यात्रा बहुत संघर्षपूर्ण रही है, यात्रा अभी पूरी नहीं हुयी है, कभी
पूरी होगी भी नहीं । जिस युग में पश्चिमी समाज धार्मिक नियंत्र...
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