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RAEES KHAN
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Famous Hindu-Muslim love stories in Indian history-- Dewal Rani and Khizr Khan:

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( broken chid)

Just wanted to send salutations
Don't be weary, I am better than okay
I am still around thanking you all
Please don't worry, won't ask for cash
Dad showed me a baseball yesterday
Told him my chest reminds of that ball
Stitched from top to bottom
Wishing, hoping they hold together
Mom says my heart isn't that strong
Wishing everyone never render my pain
She cries when I wake up everyday
It's a blessing, I know better
Please come closer and place your hand
What do feel or hear my dear
Isn't the strongest but still beats slightly
Mom and dad ask for only one favor
Don't rush off please, calm down a tad
A like, comment or even a share helps
Would you do me that favor? ??


© Victor Javier Garcia 2015


( these isn't the post just wanted to share his story. If you have facebook please I ask everyone to just press like on his page , Not a dime or a nickel is being asked. The little boys name was not told to me but i was asked to help share these. God bless you all )
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पाखण्ड खंडिनी
बोद्ध ग्रंथो में मांसाहार (झूटी अंहिसावाद )
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बोद्ध ओर नवबोद्ध अपने आप को कितना भी संयमी
,सात्विक आहारी बताये लेकिन बोद्ध देशो को देखने पर पता चलता है कि वहा के बोद्धो में काफी हिंसक
भावनाए है ,, वे लोग अपने जीभ के स्वाद के लिए किसी भी प्राणी यहाँ तक कि मानव भ्रूण को तक खाने लगे है |
क्यूंकि जेसा आहार होता है वेसे ही विचार ओर व्यवहार होता है |
मह्रिषी मनु मांस भक्षण को हिंसक ओर पाप मानते हुए कहते है –

” स्मुत्पत्ति च मॉसस्य बवबन्धो च देहिनाम |
प्रसमीक्षय निवर्तेत सर्वमॉसस्य भक्षणात ||
मनु . ५/४९ ||

अर्थात मांस की उत्पति जेसे होती है उसको ,प्राणियों
की हत्या ओर बंधन के कष्टों को देख सब प्रकार के मांस भक्षण से दूर रहे |
ओर कहते है –

” अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी |
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकेश्चेति घातका ||
मनु .५/५१ ||”

मारने की आज्ञा देने वाले ,मांस को काटने वाले पशु को
मारने वाले क्रय विक्रय करने वाले ,पकाने वाले परोसने वाले खाने वाले ये सब हत्यारे ओर पापी है |
इस तरह मनु ने मांस भक्षण को पाप बताया है ,,साथ ही मांस व्यापार को क्यूंकि मांस खाने की आदत ही
जीवो की हिंसा को प्रेरित करती है |
हिन्दू धर्म के काशी खंड में निम्न श्लोक मिलता है –

जातु मांस न भोक्तव्यम प्राणै कंठगतैरपि (काशी खंड ,३५३ ५५ )
चाहे प्राण कंठ तक आ जाए तो भी मांस नही खाना
चाहिए |
अर्थववेद ८/६/९३ में कहा है जो अंडे मांस खाते है उनका मै नाश करता हु |
इस तरह मांस भक्षण को सनातन शास्त्रों में निन्दित
बताया है |

अब हम बोद्ध दर्शन में मांस भक्षण सम्बन्धित बातें देखते है –
बोद्ध ने यज्ञ में पशु वध का विरोध किया लेकिन बोद्ध
मांस भक्षण से अपने आप को दूर नही रख सके इसके बारे में सकलिक सुत्त में देवदत्त विद्रोह नामक अध्याय में आता है, इस अध्याय में एक कथा अनुसार देवदत बोद्ध से निम्न बातो की शर्त रखता है वो इस तरह है | देवदत्त बुद्ध से कहता है ,कि संघ में निम्न नियम बनाये जाए -
(१) भिक्षु वन में रहे नगर में रहे तो दोष हो |
(२) जिन्दगी भर भिक्षा मांग कर खाने वाला हो |
(३) जिंदगी भर फेंके हुए चीथड़े पहने ,जो चीवर का उपभोग करे उस पर दोष हो |
(४) जिन्दगी भर वृक्ष के नीचे रहे |
(५ ) जिन्दगी भर मांस मच्छली न खाए जो खाए उस पर दोष हो |
इसमें से बुद्ध एक भी शर्त नही मानते है ,,हम यहाँ बाकि ४ पर बुद्ध के उत्तर न लिख ५ वे पर लिखते है कि मांस भक्षण पर बुद्ध ने क्या कहा –
बुद्ध कहते है – है देवदत्त ! जो अदृष्ट (जिसे मरते हुए मेने न देखा हो ) अश्रुत (जिसे मरते हुए न सुना हो ) अ परिशंकित (जो संदेह में न हो ) इस तरह का मांस खाने की मेने आज्ञा दी है |
बुद्ध ने देवदत्त के मांस भक्षण के निषेध वाली शर्त को ठुकरा दिया ओर इससे देवदत्त बोद्ध के संघ से अलग हो गया |
इसी तरह की बात जीवक नामक भिक्षु से बोद्ध ने जीवक सुत्तन्त (२/९/५ ) में कही है जीवक से बुद्ध कहते है –
जिस जीव का अपने लिए न मारा जाना हो | जिसे मारे
हुए न देखा हो , न सुना हो न शंका हो | ऐसे मांस को खाने का मैंने आज्ञा दी है |
बोद्ध के उपरोक्त कथन को देखा जाए तो किसी दूकान से मांस खाया जा सकता है ,,क्यूंकि दूर किसी होटल आदि पर पकाए हुए मांस की किसी दूर से आये खाने वाले को कोई जानकारी नही होती |
एक स्थान से दुसरे स्थान की यात्रा में अगर कोई
मांसाहार भोजनालय है तो वहा मांस खा सकते है क्यूंकि खाने वाले ने न प्राणी को कटते देखा है ,न ही वो उसके लिए काटा है न ही वो उसने काटते हुए सुना है |
इस तरह बुद्ध ने हिंसा का एक दूसरा रास्ता खोल दिया |
ओर असंयम को जो कि स्वाद से है को बढ़ावा दिया |
इस तरह एक जातक कथा में भी मांस भक्षण का उलेख मिलता है – जिसके अनुसार एक भिक्षु के पास एक चील द्वारा छुटा हुआ कोई मांस गिरता है भिक्षु बुद्ध से कहता है कि इसका क्या करू बुद्ध उसे वह मांस खाने को कहते है |
इस तरह बोद्ध ग्रंथो में जगह जगह एक अलग प्रकार की हिंसा का उलेख मिलता है जो उनके अहिंसक ओर संयमी होने के दावे पर प्रश्न चिन्ह लगाता है |
शायद बुद्ध को इस बात पर ध्यान देना चाहिय था कि
जैसा आहार वैसा ही विचार ओर व्यवहार हो जाता है |
मांस भक्षण किसी भी प्रकार का जीव हत्या को
बढ़ावा देता है |

संधर्भित पुस्तके एवम् ग्रन्थ –
(१) मनुस्मृति – सुरेन्द्रकुमार जी
(२) मझिम निकाय – राहुल सांस्क्रतायन
(३ ) बुद्धचर्या – राहुल सांस्क्रतायन
(४) दीर्घ निकाय – राहुल सांस्कृतायन
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** मित्रो !! आज से ही प्रण ले की मांस भक्षण नहीं करूँगा

लेख: गणेश राम
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Ma shaa Allah : )
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