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Kunal Verma
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शर्म है कि किसी को शर्म आती नहीं
किस-किस की शर्म की बातें करें। कल हम अपनी स्वतंत्रता के 71वें साल में प्रवेश करने जा रहे हैं। हर एक क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ने वाले हमारे देश में अगर आज भी सैकड़ों मासूस बेहतर स्वास्थ सुविधाओं के आभाव में अकाल मौत मर रहे हैं इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है। हम सभी को मंथन करना है। सिर्फ फेसबुक और व्हॉट्एप पर मासूमों की याद में डीपी बदलने से किसी को शर्म नहीं आने वाली। शर्म अगर आएगी तो वह अपनी अंतरात्मा को झकझोरने से। आजादी की शाम से पहले यह खबर पूरी दुनिया में पहुंच चुकी है कि कैसे हमारे मासूम आज भी सिस्टम की फेल्योरनेस से तिल-तिल कर मरने को बेबस हैं। आजादी का यह मौका जायज न होने दें। कुछ शर्म करें। शर्म करेंगे तभी कुछ हल निकलेगा। यही उन मासूमों के प्रति श्रद्धांजलि होगी

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भारतीय न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी बातों में एक सबसे बड़ी कमी यह है कि कई महत्वपूर्ण फैसले बिना किसी शोर शराबे के भीड़ में गुम हो जाती हैं। जबकि ऐसे फैसले नजीर के तौर पर पेश किए जाने की जरूरत होती है। चर्चा भी इसलिए जरूरी होती है क्योंकि इससे बड़े बदलाव की कहानी शुरू की जा सकती है। एक ऐसा ही फैसला कुछ दिन पहले मद्रास हाईकोर्ट ने दिया है। कोर्ट ने घरेलू महिलाओं के हक में फैसला सुनाते हुए कहा है कि एक घरेलू महिला को भी वेतन प्राप्ति का पूरा अधिकार है।

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छल कपट की राजनीति से ऊपर उठकर लालू यादव ने राजनीति की नई विधा का सृजन किया। यह विधा थी घोटाला करो, बदनाम हो जाओ और फिर राजनीति के शिखर पर पहुंच जाओ। बाद में मायावती, जयललिता जैसे कई नेताओं ने लालू से सीख लेते हुए खुद को स्थापित किया। लालू ने न केवल इस विधा का सृजन किया, बल्कि इसमें इतने सारे प्रयोग कर डाले की भारतीय जांच एजेंसियां लंबे समय तक सिर्फ और सिर्फ लालू यादव पर रिसर्च करें तो इसे उनके पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है।

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जब आप नाथुला दर्रा से ऊपर भारत की सबसे अंतिम सैन्य पोस्ट पर जाएंगे तो आप चीनी सैनिकों के बेहद करीब होंगे। इतने करीब की आप उनसे हाथ तक मिला सकते हैं। गले मिलकर फोटो भी खींचवा सकते हैं। पर इसी मेल मिलाप के दौरान मेरे साथ गर्इं मेरी वाइफ मेघा की चीनियों के साथ झड़प हो गई। भारतीय सैनिकों ने भी साथ दिया। जीत की मुस्कान के साथ मेघा ने जश्न मनाया। आज उस कहानी को कलमबद्ध कर रहा हूं, इसलिए कि यह बता सकूं कि चीनियों की फितरत क्या है?

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अर्जुन बोलते हैं कैसे मैं अपनों पर ही वाणों की वर्षा करूंगा? कैसे मैं इन्हें मृत होते देख सकता हूं? कृष्ण मुस्कुराते हैं और कहते हैं युद्ध के मैदान में अगर तुम यह देखोगे कि सामने वाला कौन है, उसकी पहचान क्या है, उसकी जाति क्या है, हमारे खून से उसका रिश्ता क्या है, फिर युद्ध कभी नहीं जीत सकते। इसी प्रसंग के साथ कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। जिसे हम हमेशा पढ़ते और पढ़ाते रहते हैं। अब जरा मंथन करिए भारतीय संविधान के सर्वोच्च पद पर हो रहे चुनाव पर।

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कुल मिलाकर आप यह फिल्म जरूर देखें। हर एंगल से महसूस करें। हां, अपने अंदर के भी ट्यूबलाइट को देखने का प्रयास करें।
और अंत में .. नाच मेरी जान हो के मगन तूं, छोड़ के सारे किंतु परंतु।

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कश्मीर में हालात काबू में हैं इसीलिए लाल चौक पर पिछली बार धमाका कब हुआ था यह किसी को याद नहीं, लेकिन मनौवैज्ञानिक तौर पर हम कश्मीर से दूर होते जा रहे हैं। भावनात्मक तौर पर भी पूरी दुनिया में कश्मीरी युवाओं की बेहद कू्रर तस्वीर उभर रही है। पर शहीद उमर फैयाज ने खुद को बलिदान कर कश्मीर के युवाओं को बड़ा संदेश दे दिया है।

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‘‘अगर तू दोस्त है तो फिर ये खंजर क्यूं है हाथों में,
अगर दुश्मन है तो आखिर मेरा सर क्यूं नहीं जाता? ’’
दरअसल यह एक दिन की कहानी नहीं है। इस पतन की कहानी उसी दिन शुरू हो गई थी जब अरविंद केजरीवाल ने अघोषित रूप से खुद को सबसे बड़ा ईमानदार व्यक्ति प्रचारित और प्रसारित करवाते हुए पार्टी पर कब्जा कर लिया था। पार्टी बनने से पूर्व इस युवा संगठन में जितने भी बड़े चेहरे थे सभी को एक-एक कर बाहर निकालकर केजरीवाल ने पार्टी में हिटलरशाही के एक नए युग की शुरुआत की थी।

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लोकतंत्र के स्वाभिमान पर मूत्रतंत्र’ से करारा प्रहार
किसानों की इन मांगों में एक भी मांग ऐसी नहीं है जिसे गैर जरूरी करार दिया जाए। बात सिर्फ इतनी सी है कि तमिलनाडु में फिलहाल कोई चुनाव नहीं है। नहीं तो तत्काल सभी राजनीतिक दल अपने मेनिफेस्टो में इन सभी मांगों को शामिल कर लेती। इसमें भी दो राय नहीं कि सभी मांगों को पूरा करने को लेकर जोर शोर से प्रचार करवाया जाता। पर विडंबना यह है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसानों की समस्याएं और उनकी मांगों को चुनावी लॉलीपॉप के रूप में देखा गया है।

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दहेज प्रथा पर भी कुछ बोल दें मोदी जी
मोदी जी हो सकता है नितीश कुमार से आपकी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता हो। हो सकता है कि आपके पार्टी के लोग आपको नितीश कुमार के इस आह्वान से दूर होने की सलाह दें। पर आप मंथन जरूर करें। दहेज हत्या में जब बेटियां जला दी जाती हैं तो क्या आप खुद को माफ करने के काबिल समझ पाते हैं। नवरात्र पर नौ दिन का व्रत रखकर क्या आप यह संकल्प नहीं ले सकते कि जबतक लोग आपकी बातों को सुन रहे हैं आप दहेज के खिलाफ जोरदार आह्वान करते रहेंगे।
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