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RIDHI SIDHI
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ज्योतिष के अनुसार कुंडली में प्रत्येक व्यक्ति के कम से कम दो ग्रह शुभ और दो या इससे अधिक अशुभ ग्रह होते है।शुभ ग्रह के शुभत्व को बढ़ाने के लिए उसका रत्न, धातु का धारण करना और अशुभ के निवारण के लिए ग्रह से संबंधित मंत्र का जाप ओर दान करना ओषधि सेवन ही उचित उपाय है।
कुंडली में सदैव लग्नेश, पंचमेश ओर नवमेश शुभ होता है।कभी कभी पंचमेश/नवमेश के शुभत्व को वोही ग्रह जब सष्ठेश अष्टमेश या द्वाद्वेष हो जाता है तो शुभ प्रभाव कम कर देता है।साथ ही शुभ ग्रह अपना अधिक फल अपनी दशा/अंतर्दशा ओर गोचर में ,वक्री होने पर अधिक देता है।कभी कभी लगन चार्ट में कोई शुभ ग्रह उच्च, स्वयं के राशि में हो लेकिन अन्य षोडश वर्गों में अशुभ स्थान या नीच हो जाये तब भी अशुभ ही फल करने को मजबूर ही जाता है।
इसलिए रत्न धारण करने से पहले कुंडली के लग्नेश के अलावा शुभ ग्रह, योगकारक ग्रह ओर दशा गौचर का भी ध्यान देना आवश्यक है।
कुंडली के लगनेश के साथ पंचमेश , नवमेश योगकारक ग्रहों के निर्धारण के अनुसार त्रिशक्ति तीन रत्नों का कॉम्बिनेशन दे रहा हूँ।किसी किसी लग्न में केवल 2 ही ग्रह शुभ रहेंगे।
1 मेष लग्न -मूंगा+माणक
2 वृष लग्न-नीलम+ओपल(हीरा)(सफेद पुखराज)+पन्ना
3 मिथुन -पन्ना+सफेद पुखराज
4 कर्क लग्न- मोती+मूंगा
5 सिंह लगन- माणक+ मूंगा +पन्ना
6 कन्या लगन- पन्ना+हीरा(ओपल)(सफेद पुखराज)
7 तुला लग्न -हीरा(ओपल)(सफेद पुखराज)+नीलम
8 वृशिचक लगन - मूंगा+मोती+पिला पुखराज
9 धनु लग्न- पिला पुखराज+माणक
10 मकर लग्न-नीलम+ओपल(हीरा)
11 कुम्भ लगन- पीताम्बरी +ओपल (हीरा)(सफेद पुखराज)
12 मीन लग्न-पिला पुखराज +मूंगा°+मोती

आचार्य अनिल वर्मा
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17/01/2018
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मकर संक्रान्ति एवं पुण्यकाल 14 जनवरी को

अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले हिन्दू धर्म के इस पर्व को पूरे भारत में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। संक्रान्ति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संचरण। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश होने एवं सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण होने पर यह मकर संक्रान्ति पर्व मनाया जाता हैं। इसे उत्तरायणी पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व 14 जनवरी को मनाया जायेगा। इस दिन प्रत्युष काल में भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करेंगे।
पौराणिक मान्यताएं-
कहा जाता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाया करते हैं। शनिदेव चूंकि मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के दिन ही पवित्र नदी गंगाजी का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था जो भागीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं। यह भी कहा जाता है कि गंगा को धरती पर लाने वाले महाराज भगीरथ ने अपने पूर्वजों के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिए मकर संक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है। मकर संक्रांति के दिन ही महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर शरीर का परित्याग किया था।भगवान् श्री कृष्ण ने भी गीता में सूर्य के उत्तरायण का महत्त्व बताते हुए कहा है :-
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌
*तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः*।।
हमारे पवित्र पुराणों के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश, आद्यशक्ति और सूर्य की आराधना एवं उपासना का पावन पर्व है, जो तन-मन-आत्मा को शक्ति प्रदान करता है।

धार्मिक मान्यताएं- पौराणिक मान्यताओं से जुड़े होने के कारण इस पर्व पर गंगा तीर्थ स्नान,श्राद्ध-तर्पण,तप, होम,दान-पुण्य,का महत्व बताया गया है। हेमाद्रि में कहा भी गया हैं- *रवे: संक्रमणंराशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते*।
*स्नानदानतपः श्राद्ध होमादिषु महाफला*।।
तीर्थ स्नान के महत्व पर तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में लिखा है- *माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथ पतिहि आव सब होई।।*इस दिन यथाशक्ति वस्त्र,पंचांग,अन्न,बर्तन, तिल,घी,गुड,स्वर्ण,गाय या गौचारे का दान करना
चाहिए ।
संक्रान्ति पर क्या करें-
तिल जल से स्नान करना, तिल दान करना, तिल से बना भोजन, जल में तिल अर्पण, तिल से आहुति, तिल का उबटन लगाना आदि करने के साथ ही सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दिया गया दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता हैं।

आचार्य अनिल वर्मा
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