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Mukesh Kumar Sinha
Works at Govt. of India
Attended Deoghar College, Deoghar
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Mukesh Kumar Sinha

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बुद्धि झिझकती है, पर हृदय ?
वो तो आर या पार 
जैसा कुछ सोचता है 
बिना झिझके, बिना ठिठके 
चल देता है, बढ़ जाता है 
अनजानी ! अपरिचित !!
राहों पर ....... 
बस अंदर से आवाज आनी चाहिए 
नहीं होती जरूरत किसी मार्गदर्शक की 
बिना नक्से के, ढूँढने लगते हैं खजाना .... !! 
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मैं कवि नहीं हूँ
    नजरों के सामने फड़फड़ाते पन्नों में झिलमिलाते शब्दों के समूह जिनमें कभी होता प्यार तो कभी सुलगता आक्रोश कभी बनता बिगड़ता वाक्य विन्यास कह उठता अनायास “मैं कवि नहीं हूँ” सफ़ेद फूल में, चमकते तारे में धुंधले दर्द में, सुनहले मुस्कुराहट में गुजरे यादों मे, अखर...
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    नजरों के सामने फड़फड़ाते पन्नों में झिलमिलाते शब्दों के समूह जिनमें कभी होता प्यार तो कभी सुलगता आक्रोश कभी बनता बिगड़ता वाक्य विन्यास कह उठता अनायास “मैं कवि नहीं हूँ” सफ़ेद फूल में, चमकते तारे में धुंधले दर्द में, सुनह...
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Mukesh Kumar Sinha

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सिमरिया पुल :)
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जब भी जाता हूँ गाँव  तो गुजरता हूँ, विशालकाय लोहे के पुल से  सरकारी नाम है राजेन्द्र प्रसाद सेतु  पर हम तो जानते हैं सिमरिया पुल के नाम से पार करते, खूब ठसाठस भरे मेटाडोर से  लदे होते हैं, आलू गोभी के बोरे की तरह  हर बार किरा...
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Ashok Kumar's profile photo
 
This bridge how many time older, because it is older than, his way travel very risky
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Mukesh Kumar Sinha

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:)
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बेवकूफ लड़की ! तुम्हें कहाँ होगा याद  भूल चुके होगे तुम ‘सब’ पता नहीं कैसे कैसे  अजीब अजीब सी सौगंधों से  बांधा करती थी तुम ! हाँ, मुझे भी बस इतना ही है याद  और उन सौगंधों का अंत  होता था, दो शब्दो के साथ  “गंदी बात” सिगरेट पी...
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Mukesh Kumar Sinha

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यादें, .............कुछ भी :)
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जब भी “मैया” खोलती लोहे का काला बक्सा तो, आदत से मजबूर वहीं आस पास मँडराता पता नहीं, क्या रहती थी उम्मीद? अच्छा सा लगता था बस मैया के पल्लू को पकड़े रह, निहारना बड़े जतन से रखती पुरानी बनारसी साड़ी बाबा का काला गरम सूट बेशक अंति...
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Mukesh Kumar Sinha

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टिकोज़ी
जब भी “मैया” खोलती लोहे का काला बक्सा तो, आदत से मजबूर वहीं आस पास मँडराता पता नहीं, क्या रहती थी उम्मीद? अच्छा सा लगता था बस मैया के पल्लू को पकड़े रह, निहारना बड़े जतन से रखती पुरानी बनारसी साड़ी बाबा का काला गरम सूट बेशक अंतिम  बार कब पहना गया था नहीं मुझे ...
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जब भी “मैया” खोलती लोहे का काला बक्सा तो, आदत से मजबूर वहीं आस पास मँडराता पता नहीं, क्या रहती थी उम्मीद? अच्छा सा लगता था बस मैया के पल्लू को पकड़े रह, निहारना बड़े जतन से रखती पुरानी बनारसी साड़ी बाबा का काला गरम सूट बेशक अंति...
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Mukesh Kumar Sinha

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    नजरों के सामने फड़फड़ाते पन्नों में झिलमिलाते शब्दों के समूह जिनमें कभी होता प्यार तो कभी सुलगता आक्रोश कभी बनता बिगड़ता वाक्य विन्यास कह उठता अनायास “मैं कवि नहीं हूँ” सफ़ेद फूल में, चमकते तारे में धुंधले दर्द में, सुनह...
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Mukesh Kumar Sinha

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अंतिम फेंकने से पहले शेविंग क्रीम या टूथ पेस्ट के ट्यूब से अंतिम कोशिश करो तो एक दम से पिचक कर थोड़ा सा क्रीम या पेस्ट बाहर आ ही जाता है  हम मध्यम वर्गीय मेनटॅलिटी के लोग, एक सुखद अहसास इस छोटे से कार्य से भी फील कर लेते हैं,...
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Mukesh Kumar Sinha

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सिमरिया पुल
जब भी जाता हूँ गाँव  तो गुजरता हूँ, विशालकाय लोहे के पुल से  सरकारी नाम है राजेन्द्र प्रसाद सेतु  पर हम तो जानते हैं सिमरिया पुल के नाम से पार करते, खूब ठसाठस भरे मेटाडोर से  लदे होते हैं, आलू गोभी के बोरे की तरह  हर बार किराये के अलावा, खोना होता है  कुछ न...
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जब भी जाता हूँ गाँव  तो गुजरता हूँ, विशालकाय लोहे के पुल से  सरकारी नाम है राजेन्द्र प्रसाद सेतु  पर हम तो जानते हैं सिमरिया पुल के नाम से पार करते, खूब ठसाठस भरे मेटाडोर से  लदे होते हैं, आलू गोभी के बोरे की तरह  हर बार किरा...
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papu sharma's profile photo
 
Hallo
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Mukesh Kumar Sinha

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“गंदी बात”
बेवकूफ लड़की ! तुम्हें कहाँ होगा याद  भूल चुके होगे तुम ‘सब’ पता नहीं कैसे कैसे  अजीब अजीब सी सौगंधों से  बांधा करती थी तुम ! हाँ, मुझे भी बस इतना ही है याद  और उन सौगंधों का अंत  होता था, दो शब्दो के साथ  “गंदी बात” सिगरेट पीना? गंदी बात शराब को हाथ लगाना ...
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बेवकूफ लड़की ! तुम्हें कहाँ होगा याद  भूल चुके होगे तुम ‘सब’ पता नहीं कैसे कैसे  अजीब अजीब सी सौगंधों से  बांधा करती थी तुम ! हाँ, मुझे भी बस इतना ही है याद  और उन सौगंधों का अंत  होता था, दो शब्दो के साथ  “गंदी बात” सिगरेट पी...
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Priya Singh's profile photo
 
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Mukesh Kumar Sinha

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कुछ अलग से पन्ने, पढ़ेंगे तो अच्छा लगेगा !!
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बहुत अजीब हो गए हैं हम  कुछ गमलों में चमकते फूलों की  रंगीन पंखुड़ियों को देख कर  समझते हैं कि हमारा पर्यावरण  सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है ! आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से  अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं  पर, हमें जरा...
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Mukesh Kumar Sinha

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जिंदगी के पन्ने
बहुत अजीब हो गए हैं हम  कुछ गमलों में चमकते फूलों की  रंगीन पंखुड़ियों को देख कर  समझते हैं कि हमारा पर्यावरण  सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है ! आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से  अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं  पर, हमें जरा भी गुमान तक नहीं होता  कि उसका...
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बहुत अजीब हो गए हैं हम  कुछ गमलों में चमकते फूलों की  रंगीन पंखुड़ियों को देख कर  समझते हैं कि हमारा पर्यावरण  सिर्फ और सिर्फ शुद्धता बरसा रहा है ! आफिस गार्ड की कड़क यूनिफार्म से  अंदाजा आर्थिक अवस्था का लगाते हैं  पर, हमें जरा...
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  • Deoghar College, Deoghar
    Science (maths), 1988 - 1991
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  • Govt. of India
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