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Kajal Kumar
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Kajal Kumar

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KajalKumarCartoons 28 8 2015
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Kajal Kumar

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(लघुकथा) बेटा
उसकी उमर बहुत हो गई थी. पर फि‍र भी घर के नज़दीक ही एक
डॉक्‍टर के छोटे से प्राइवेट क्‍लीनि‍क में सफाई-पोचे का काम करती थी. घर पर कुछ
ख़ास काम नहीं होता था सो, सुबह-सवेरे पहुंच जाती, धीरे-धीरे आराम से काम नि‍पटाती,
पूरा दि‍न वहीं रहती और फि‍र शाम को ही घर जात...
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Kajal Kumar

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(लघुकथा) गंवई
वह
गांव से शहर आकर एक सि‍क्‍योरि‍टी कंपनी में गार्ड लग गया था. रि‍सैटलमेंट कॉलोनी
में कि‍राए का एक कमरा भी सही
कर लि‍या था. शुरू-शुरू में उसे रात की ड्यूटी मि‍लती. आमतौर से यहां-वहां ग़ुप
हाउसिंग सोसायटि‍यों के गैट पर चौकीदारी करता. रात को सीनि‍यर गार्ड सोत...
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Kajal Kumar

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(लघुकथा) समय
वह बचपन से ही माता पि‍ता
के साथ शहर में रह कर पला बढ़ा. और फि‍र आगे की पढ़ाई करने के लि‍ए वह अमरीका चला
गया था. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह अब वहीं नौकरी कर रहा था और उसे ग्रीन कार्ड भी
मि‍ल गया था. वह लंबे समय बाद भारत लौटा था और आजकल समय नि‍काल कर अपने पुश्...
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Kajal Kumar

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चींटि‍यां
उसे अपनी ज़िंदगी से यूं
तो कोई शि‍कायत नहीं थी पर फि‍र भी बहुत से ऐसे सवाल थे जि‍नके जवाब उसके पास नहीं
थे ; कि‍ताबें थीं कि‍ उनमें अलग-अलग तरह की बातें लि‍खी मि‍लतीं. और उन कि‍ताबों
से भी उठते दूसरे सवालों के जवाब देने वाला फि‍र कोई न होता. इसी ऊहापोह में ...
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Kajal Kumar

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(लघुकथा) भूत
बहुत
भागदौड़ के बाद एक दि‍न, वह एक बहुत बड़ी सरकारी कंपनी में छोटा सा बाउ बन गया.
उसे बाबू होने से शि‍कायत नहीं था, पर छोटा-बाबू होना उसे रास न आता था. उसने यूनि‍यनबाजी
कर ली और जल्‍दी ही यूनि‍यन का प्रधान भी हो गया. कंपनी ने नाममात्र के लि‍ए उसे,
लोगों की ...
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(लघुकथा) लेखक
उसे लि‍खने का बहुत शौक था. नौकरी तो थी पर उसमें, लेखक होने
के बावजूद कोई इज्‍ज़त नहीं थी. कोई उसकी इस बात को भाव नहीं देता था कि‍ वह लेखक
था. वह बचपन से ही कवि‍ताएं लि‍खता आ रहा था. उसे कवि‍ के बजाय लेखक कहलाना पसंद
था. उसने अपनी कवि‍ताओं की डायरि‍यां बड़ी ...
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Kajal Kumar

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(लघुकथा) थप्‍पड़
वह
बहुत बड़ा लीडर था. और यह, उस लीडर के मातहत एक छोटा सा मुलाजि‍म. लीडर एक दि‍न इस
मुलाजि‍म के यहां दौरे पर आया. साथ चल रहे लोगों पर रौब गांठने की गर्ज़ से, कुछ
बहाना बना कर उसने मातहत को एक थप्‍पड़ जड़ दि‍या. मातहत ने केस दर्ज़ करा दि‍या.
मामला चलता रहा. स...
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बहुत खूब मातहत होने का अपना सुख है अहम विसर्जन सशक्त लघुकथा। 
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(लघुकथा) परि‍वार
उस शहर की सड़क के फुटपाथ
पर तीन छोटू रहते थे, बड़ा छोटू, छोटा छोटू और बि‍चका छोटू. यही उनके नाम थे. पूरा
दि‍न यहां-वहां कूड़े में से, तीनों कुछ-कुछ काम की चीज़ें चुनते रहते और शाम को
एक कबाड़ी के यहां उन्‍हें बेचकर चार पैसे कमा लेते. फि‍र खा-पी कर रात को वह...
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Kajal Kumar

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(लघुकथा) चोरी
' अजी सुनते हो , सेफ़्टी पिन नहीं मिल रहीं . कहीं देखीं ?’ ' तुमने ही इधर - उधर रख दी होंगी . ध् ‍ यान से ढूंढो . ’ उसने बुदबुदाते हुए ड्रॉअर और अल्मारि ‍ यां बारी - बारी से खोलनी शुरू कर दीं – ‘दि ‍ ल करता है , आज ही काम से नि ‍ काल दूं इसे . जब देखो तब कु...
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कार्टून :-इस्‍तीफा मांगने वालों का इलाज

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Kajal Kumar

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(लघुकथा) जीवन
वह स्‍कूल से नि‍कल कर
कॉलेज आया तो उसकी ज़िंदगी में मानो पंख लग गए. नए दोस्त बने. कोई पूछने वाला
नहीं, कोई बंदि‍श नहीं. जहां दि‍ल कि‍या वहां घूमे, जो चाहा सो कि‍या. देखते ही
देखते तीन साल यूं ही बीत गए. सब ग्रेजुएट हो गए. कुछ नौकरि‍यों में चले गए कुछ
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पिछले कई सालों से कार्टून बना रहा हूँ. 'लोटपोट' हिन्दी बाल साप्ताहिक के लिए ढाई दशक तक 'चिंप्पू' और 'मिन्नी' भी बनाये... एक अनुरोध... कार्टून आख़िर कार्टून है. आप भी किसी कार्टून को गंभीरता से न लें.
Introduction
मुझे कार्टूनिंग के अलावा कुछ नहीं आता...
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