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Veena Srivastava
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कबसे भटक रहे हो
कट-काट रहे हो
मानवता के उपले बनाकर
नफ़रत की पुआल में रेशे-रेशे जला रहे हो
मंदिर के गर्भ ग्रह
मस्जिद की अजान
गुरुद्वारे की अमृत वाणी
या फिर चर्च में सलीब की ठिठुरन में ही
क्यों काँपती है तुम्हारी निर्जीव माटी
धर्म के कुहासे में कब तक
करते रहोगे नर संहार
कब तक कलबूते दिखाकर
दुहते रहोगे इंसानियत का दूध
बहाते रहोगे मर्यादा, भाईचारे का रक्त
इंसानवाद घायल हो रहा है
भ्रष्ट साही के काँटों से
कछुए के खोल सरीखा
नहीं है कठोर धर्म का साम्राज्य
पिलपिले लिज़लिजे धरातल पर
टिकी हैं आकाओं की बस्ती
सीप में छुपे मोतियों के लिए
मत काटो उस सीपी कीड़े की कोशिकाएँ
उसे पकने दो, मरने दो अपनी मौत
मरने के बाद खोल और मोती दोनों तुम्हारे हैं
शवों पर खड़े होकर मत झाड़ो भाषण
मत बनाओ इंसानों का इंसानों का अस्त्र
अस्त्र का वार, बंदूक़ की गोली
भेद नहीं करती इंसानों में
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http://neocounter.neoworx-blog-tools.net/ इसको कैसे हटाएं....प्लीज सहायता करिए. पोस्ट हो रहा है लेकिन ब्लॉग दिखता है फिर यही नियोकाऊंटर आ जाता है
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काफी लम्बे अंतराल बाद आपके साथ हूं और अब नियमित रहूंगी....
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वाकई यही है जीवन की गति...और जीवन यूं ही चलता है...
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संवेदनाओं की गहराई में डूबी रचना...
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सुंदर रचना...गुरुओं को नमन....
गुरूवर
गुरूवर
chitranshsoul.blogspot.com
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