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Praveen Pandey
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संग मेरे क्षितिज तक मेरा परिश्रम
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शक्ति बिना उत्सव सब फीके
रस की चाह प्रबल, घट रीते, शक्ति बिना उत्सव सब फीके। सबने चाहा, एक व्यवस्था, सुदृढ़ अवस्था, संस्थापित हो, सबने चाहा, स्वार्थ मुक्त जन, संवेदित मन, अनुनादित हो, सबने चाहा, जी लें जी भर, हृदय पूर्ण भर, अह्लादित हों, सबने चाहा, सर्व सुरक्षा,  शुभतर इच्छा, आच्छा...
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हाँ, जिसके हाथ खुले हों, उसी को जला दो।
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सबके अपने युद्ध अकेले
सबके अपने युद्ध अकेले, और स्वयं ही  लड़ने पड़ते,  सहने पड़ते,  कहने पड़ते, करने पड़ते, वह सब कुछ भी, जो न चाहे कभी अन्यथा। कल कल जल भी जीवट होकर, ठेल ठेल कर, काट काट कर, पाषाणों को सतत, निरन्तर, तटबन्धों को तार तार कर, अपनी गति में, अपनी मति में, जूझा भिड़त...
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मित्र हो मन
कब बनोगे मित्र, कह दो, शत्रुवत हो आज मन, काम का अनुराग तजकर, क्रोध को कर त्याग मन, दूर कब तक कर सकोगे, लोभ-अर्जित पाप मन, और कब दोगे तिलांजलि, मोह-ऊर्जित ताप मन, अभी भी निष्कंट घूमो, भाग्य, यश विकराल-मद में, प्रेमजल कब लुटाओगे, तोड़ ईर्ष्या-श्राप मन । कब तृ...
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एक पार्टी खोल लेने से तो बहुत बचत हो जायेगी
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बराबरी कराने वाला निर्णय
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