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New Hindi Songs Geet Kavita
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पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती

आँखों की शर्म मुझे रोने नहीं देती।
पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती।।

किस से गम छुपाऊँ और किस को घाव दिखाऊं 
इस पेट काटती भूख को कैसे मैं बहलाऊँ 

समझ नही आता मुझे क्यों दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती 
सुलगती भूख की मुलाक़ात रोटी के टुकड़े से अक्सर नहीं होती 

इंसानियत बेचकर खा गया इंसान, हम मज़लूमों पर उनकी निगाह अक्सर नहीं होती 
बेसहारा निराश्रित भूख से बिलबिलाते चेहरों पे, दर्द की शिकन रह गुज़र नहीं होती 

रचियता : आनंद कवि आनंद 



- See more at: http://newhindisongsgeetkavita.blogspot.in/2015/09/blog-post_27.html#sthash.9jYbdUak.dpuf
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पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती

आँखों की शर्म मुझे रोने नहीं देती।
पेट की भूख मुझे सोने नहीं देती।।

किस से गम छुपाऊँ और किस को घाव दिखाऊं 
इस पेट काटती भूख को कैसे मैं बहलाऊँ 

समझ नही आता मुझे क्यों दो जून की रोटी मयस्सर नहीं होती 
सुलगती भूख की मुलाक़ात रोटी के टुकड़े से अक्सर नहीं होती 

इंसानियत बेचकर खा गया इंसान, हम मज़लूमों पर उनकी निगाह अक्सर नहीं होती 
बेसहारा निराश्रित भूख से बिलबिलाते चेहरों पे, दर्द की शिकन रह गुज़र नहीं होती 

रचियता : आनंद कवि आनंद 



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ना जाने क्यूँ

इक छवि पलकों की कोर तक आके जा रही है।
दूर खड़ी हो अधरों से खुद ही मुस्कराए जा रही है।
प्यारी सी मनमोहक अदा लिए मन को रिझा रही है।
ना जाने क्यूँ फिर भी पास आने से हिच किचा रही है।

तुम बांधो तारीफों के पूल फिर हो के खुश भी क्या करना।
जब तुम ही हासिल नहीं जग में तो ऐसे जहाँ का क्या करना।
अब आके गले लगाले मौत फिर घुट घुट जी के क्या करना।

नदी के मुहाने पे खड़ा सोचता हूँ की वो धारा कब आएगी 
जब लाएगी चैन ओ सुकून और ज़िन्दगी महकाएगी 

खुदा करे वो दिन जरूर आये और मेरे इस सपने को साकार कर जाए 
या तो नदी ही किनारे से दो चार हो जाए या खुद किनारा ही नदी में समा जाए 

रचियता : आनंद कवि आनंद 
http://newhindisongsgeetkavita.blogspot.in/2015/09/blog-post_98.html
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हकीम से ही ठन गई
हकीम से ही ठन गई

ये सुनकर तो मेरी भौंहे तन गई।
उस नाकारा हकीम से ही ठन गई।

जो मेरी बिमारी को लाइलाज बताता है।
मोहब्बत नाम का रिवाज़ बताता है।

अब क्या करूं सारे ज़माने से दुश्मनी कैसे मौल लूँ।
अब हो गई मोहब्बत तो उसे तराजू में कैसे तौल लूँ।

ऐ ज़माने तू ही बता कोई कैसे जिए चला जाए?
जब खरामा खरामा इस दिल का सुकून चला जाए?

रचियता : आनन्द  कवि आनंद 
- See more at: http://newhindisongsgeetkavita.blogspot.in/2015/09/blog-post.html#sthash.gpGjDsXU.dpuf
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पाती मेरे पी की पाती मेरे पी की पिया से भी प्यारी  पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी  बार-बार चूमूँ  तोहे गले से लगाऊं  प्राणप्यारी पाती कब पिया जी को पाऊं  पिया बिन जिया मोरा मारे है उडारी   पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी  तकिये के नीचे तेरी सेज बिच्छादूं  ज़ुल्फों की छाँव करके आ तुझको सुलादूं  लोरी गाऊं मीठी आए नींद की ख़ुमारी  पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी  भोर भए तो तुझे वक्ष में छुपालुं  दुनिया की जलती नज़र से बचालुं  आ मेरे अँग लगजा तुझपे सारी ज़िन्दगी वारी  पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी  जाने काहे फड़के आज़ मोरी बायीं अँखियाँ  आये मोहे हिचकी तो ताना मारे सखियाँ  राम करे पूरवैय्या ले आये खबर तुम्हारी  पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी  पाती मेरे पी की पिया से भी प्यारी  पिया के ही प्यार कारन बनी तूँ  हमारी  रचयिता : आनन्द कवि आनन्द कॉपीराइट

#ns
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आपकी मौजूदगी  ज़लवा ए हुस्न आपका, रोशन हो गया यह ज़हाँ  नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ  आपके आने से पहले, महफ़िल थी कुछ खोई-खोई  चन्द्रमा की चाँदनी भी, मद्धिम सी थी सोई-सोई  आपकी मौजूदगी का चर्चा चारों ओर यहाँ  नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ खुशबु ए ज़न्नत से, सरोबार थी पहले भी महफ़िल  आपके दीदार से यहाँ, धड़क उठे लोगों के दिल  दिल थाम के बैठे हैं हम तो कहीं लग जाए ना यहाँ-वहाँ  नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ एक नज़र पाने को आतुर, सब दिल को बिछाए बैठे हैं कहीं थम ना जाए दिल की धड़कन, साँस थमाए बैठे हैं  पर आपको मैं क्या कहूँ जो दिल दे बैठे हो वहाँ कहाँ  नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ ज़लवा ए हुस्न आपका, रोशन हो गया यह ज़हाँ  नज़र ए इनायत आपकी, महफ़िल हो गई और जवाँ 

#ns
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