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Ashok Singh
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जब चले जाएँगे हम लौट के
जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह  याद आएँगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह  ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उन की गली में मेरा  जाने शरमाए वो क्यूँ गाँव की दुल्हन की तरह  मेरे घर कोई ख़ुशी आती तो कैसे आती उम्र-भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह कोई कंघी न मिली जिस से सुल...
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ख़ुदारा यादें मत लेना
शिकस्ता हूँ मगर दौलत भी है हासिल हुई हम को  गुज़ारे साथ जो पल क़द्र उस की हो नहीं किस को  बने सरमाया हैं वो ज़िंदगी का प्यार से रखना  ख़ुदारा यादें मत लेना  *शिकस्ता=टूटा हुआ; सरमाया=पूँजी यही यादें हैं ले जाएँगी हम को आख़री दम तक न कोई हम-सफ़र होगा न जाएगा...
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जश्न
जश्न-ए-नौरोज़ भी है जश्न-ए-बहाराँ भी है शब-ए-महताब (चाँद रात) भी जश्न-ए-मह-ए-ताबाँ (चमकता चाँद) भी है सुनते हैं आज ही जश्न-ए-शह-ए-ख़ूबाँ (अच्छा राजा) भी है आइए ऐ दिल-ए-बर्बाद चलें हम भी वहाँ जश्न की रात है सौग़ात तो बटती होगी अपने हिस्से की चलें हम भी उठा ...
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कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं
कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं जब दर्द की लहरें डूब गईं जब आँखें चेहरा भूल गईं तुम सोच के आँगन में कैसे फिर याद के घुँगरू ले आए मैं कैसी महक से पागल हूँ फिर रक़्स-ए-जुनूँ में शामिल हूँ कुछ होश नहीं, कुछ होश नहीं फिर चेहरा चेहरा तेरा चेहरा फिर आँख में तेरी आँखों...
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गया है जब से मन का मीत
अक्षर-अक्षर मौन हो गए, मौन हुआ संगीत परदेसी के साथ गया है, जब से मन का मीत। चलता है सूरज वैसे ही दुनिया भी चलती है और तिरोहित होकर संध्या वैसे ही ढलती है किंतु गहनतम निशा अकेली मन को ही छलती है अधरों पर सजने लगता है, अनजाना-सा गीत। डाल-डाल पर खिले सुमन को ॠ...
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तुझे याद करते करते
तुझे याद करते करते तिरी राह तकते तकते मिरे अजनबी मुसाफ़िर कई दिन गुज़र गए हैं कोई शाम आ रही है: कोई ख़ुशनुमा सितारा जो फ़लक (आसमान) पे हँस रहा है किसी मह-जबीं (चाँदे से माथे) की सूरत जो नज़र को डस रहा है वही एक इस्तिआ'रा (रूपक) तिरी याद रहगुज़र पर मिरा हम-स...
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तब याद तुम्‍हारी आती है
गरमी में प्रात: काल पवन बेला से खेला करता जब तब याद तुम्‍हारी आती है। जब मन में लाखों बार गया- आया सुख सपनों का मेला, जब मैंने घोर प्रतीक्षा के युग का पल-पल जल-जल झेला, मिलने के उन दो यामों ने दिखलाई अपनी परछाईं, वह दिन ही था बस दिन मुझको वह बेला थी मुझको ब...
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ओ पिता
ओ पिता, तुम गीत हो घर के और अनगिन काम दफ़्तर के। छाँव में हम रह सकें यूँ ही धूप में तुम रोज़ जलते हो तुम हमें विश्वास देने को दूर, कितनी दूर चलते हो ओ पिता, तुम दीप हो घर के और सूरज-चाँद अंबर के। तुम हमारे सब अभावों की पूर्तियाँ करते रहे हँसकर मुक्ति देते ह...
ओ पिता
ओ पिता
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ईद-मुबारक
फूटी लब-ए-नाज़ुक से वो इक शोख़ सी लाली थोड़ी सी शफ़क़ आरिज़-ए-ताबाँ ने चुरा ली फिर बाम की जानिब उठे अबरू-ए-हिलाली और चाँद ने शर्मा के कहा ईद-मुबारक *शफ़क़=शाम की लालिमा; आरिज़=गाल; ताबाँ=चमक; बाम=छत; अबरू=भौँएं; हिलाली=चाँद के (आकार) जैसी छेड़ा वो हसीं शब न...
ईद-मुबारक
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धूप के पेड़ पर कैसे शबनम उगे
धूप के पेड़ पर कैसे शबनम उगे, बस यही सोच कर सब परेशान हैं मेरे आँगन में क्या आज मोती झरे, लोग उलझन में हैं और हैरान हैं तुमसे नज़रें मिलीं ,दिल तुम्हारा हुआ, धड़कनें छिन गईं तुम बिछड़ भी गए आँखें पथरा गईं,जिस्म मिट्टी हुआ अब तो बुत की तरह हम भी बेजान हैं डू...
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