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umashankar singh
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लोकसप्तक – घोषणा-पत्र
                  लोकसप्तक – घोषणा-पत्र यह समय संघर्षों का समय है- एक संघर्ष जो अनवरत
प्रतिक्रियावादी और प्रगतिशील शक्तियों के बीच चल रहा है। इस संघर्ष में प्रतिक्रियावादी
शक्तियाँ विजय की ओर अग्रसर हैं। विजयोन्माद में ये शक्तियाँ भूल चुकी हैं कि मूल्य
क्या...

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जीवन की अनुकृति रचती कविताएँ
                   जीवन की अनुकृति रचती कविताएँ हरे प्रकाश उपाध्याय प्रतिभाशाली कवि हैं
अपनी नवीन भाषा के साथ नवीन संवेदनों व सहज बोध की जरूरी भंगिमा को आत्मसात किए
हुए भविष्य की कविता का ऊर्जावान युवा चेहरा हैं ।इनकी खासियत है कि अपनी कविता
में रोजमर्रा के...

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जनपद झूँठ नही बोलता पर वरिष्ठ आलोचक रमाकांत शर्मा
कृतिओर पत्रिका के पूर्व
संपादक एवं वरिष्ठ आलोचक रमाकान्त शर्मा   तमाम व्यस्तताओं के बाद भी आज भी रचनात्मक
रूप से निरन्तर सक्रिय हैं ।"लोक" की सांस्कृतिक अवधारणाओं व हिन्दी
कविता की लोकधर्मी परम्परा पर उनका बडा काम है । लोकधर्मी चेतना को उन्होने
रौमैन्टिक भा...

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सुशील कुमार की कविताएँ
              सुशील कुमार की कविताएँ सुशील
कुमार हमारे समय के जरूरी कवि हैं राजधानी और वहाँ की आबोहवा , राजनीति व साहित्य के टूटते जुडते गठबन्धनों से बहुत दूर
झारखंड के बीहड और सुविधा विहीन गाँवों के भूगोल और इतिहास में  गहरी पैठ   ने उनकी
कविता का समाजशास्...

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जीवन का बिम्ब रचती कविताएँ- भारत यायावर
     जीवन का बिम्ब रचती कविताएँ -  भारत यायावर अस्सी के दशक में युवा
कवियों की एक नयी पीढी का आगमन हुआ था इस पीढी में सुधीर सक्सेना ,   अनिल
जनविजय   भारत यायावर , शम्भू बादल   जैसे शानदार कवि
थे । इस पीढी ने बाद के तमाम बदलावों को अपनी कविता में समेटा पर क...

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अनिल जनविजय की कवितायें
       अनिल
जनविजय की कवितायें कवि के पास जन्मजात दृष्टि नही होती है उसे
दृष्टि मिलती है | मतलब कवि अपने समय के संघातों , विचारधाराओं , प्रभावों , समाजिक संरचनाओं , निजी संघर्षों को जब
समग्रता से जीता है तो वह दृष्टि का निर्माण कर रहा होता है । यही दृष्टि क...

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योगेन्द्र कृष्ण की कवितायें
                  योगेन्द्र कृष्ण की कवितायें दूर दराज किसी शहर या गाँव में कविता लिखने
वाले किसी यथार्थजीवी कवि पर भूमंडलीकृत   आलोचना की नजर एकदम
नहीं   पहुँचती है । हुकुम ठाकुर और योगेन्द्र
कृष्णा व ओमप्रकाश मिश्र ऐसे कवियों में हैं जो कविता लिख भर नही र...

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                                     राजतंत्र धर्म और समाज संदर्भ: उदय प्रकाश जी  का लेख एवं साक्षात्कार        जैसा कि परिलक्षित
है हम और हमारी पूरी दुनिया पर पूंजीगत समय का अनुशासन बहुत तीव्रता से बढ़ता जा रहा
है। समाज का मनोविज्ञान राजतंत्र की जकड़न में हो...

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कोहरे से सूरज और धूप की तरफ अग्रसर कवि                       -डॉ अजीत प्रियदर्शी भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के बढ़ते दुष्प्रभावों से भरा यह समय
मनुष्यमात्र के लिए गहरे , तनाव , दबाव , निराशा और खीझ से भरा है। कविता के लिए भी समय तनाव , दबाव , प्रतिरोध और असंतोष...
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