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Shalini Rastogi
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हास करे, परिहास करे
सवैया  हास करे, परिहास करे मन की गति वो समझे नहिं मेरी। आय, सताय,रुलाय,मनाय,करे मन की सुनता नहिं बैरी। लाज भरी इनकार करूँ झट बात बना करके मति फेरी। लेकर सौं इक बात कहूँ अब बात न मानु कभी पिय तेरी।।

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फागुन के रंगों में रंगी दो कुण्डलियाँ
फागुन के रंगों में रंगी दो कुण्डलियाँ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~ वियोग का रंग ~~~~~~~~ धरती फागुन में सजी, जोगन जी संताप। विरहा अगनी तन जले, उड़े बूँद बन भाप।। उड़े बूँद बन भाप, सखी की हँसी ठिठोली। करे जिया पर चोट, धँसे जी में बन गोली।। साजन-सजनी संग, आँख विरहन की भर...

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जीवन का डर
बार-बार चुभ रही है   आँखों में   उसकी खाली सीट   उठ रहे हैं मन में कई सवाल | क्या हुआ होगा ?   किस वज़ह से उठाया होगा   उसने यह कदम ? ऐसा कौन सा डर था जिससे डर कर उसने जीवन के सबसे बड़े डर मृत्यु को किया होगा अंगीकार ? क्या वास्तव में मौत से भी भयंकर है   जीव...

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नहीं बन पाती शिला
नहीं बन पाती शिला पूरी तरह कोई अहिल्या कभी उस पाषाणी आवरण के नीचे हमेशा छलकता रहता है मीठे जल का एक सोता गाहे-बगाहे जिसमें उग आते हैं कभी इच्छाओं के कमल। समझ नहीं पाती हर झरोखे , हर झिरी को बड़े यत्न से मूँदने के बाद भी जाने कहाँ से प्रवेश कर जाती है   उम्मी...

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अश्वत्थामा
अश्वत्थामा बन गई है वो, अपने पकते-रिसते घाव को अंतरात्मा पर ढोती, मूक पीड़ा को पीती| शुष्क आँसुओं के कतरों की  चुभन आँखों में लिए फिर रही है| हाँ, अश्वत्थामा बन गई है वो .... भेद जाती हैं कान अंतस से उठती आवाजें अपने ही मन के कुरुक्षेत्र में  अपना ही रचा महा...

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जाने किस बहकावे में
जाने किस बहकावे में आकर उर्वरा धरती को चढ़ी है जिद साबित करने की खुद को ऊसर अपनी हरियाई कोख को पीट- पीट कर रही विलाप अकूत सम्पदा को आँचल में छिपाए आँखों में आँसू, होंठों पर गुहार लिए मांगती फिर रही अनाज के दो दाने आक्रोश से फटी पड़ती है कि भीतर के लावे से ...

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त्रिवेणी
1  बहुत मुश्किल रहा तोड़ना दीवारें भरम की। कितने जतन से खुद, चिना था हमने जिन्हें । ............. सच है कि अपनी कैद से रिहाई आसाँ नहीं होती। 2. दिमाग का सुकूँ देके , जिस्म का आराम खरीदा है। पैसों के एवज रूह बेच, जी का जंजाल खरीदा है ............. जाने क्यों ...

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साजिश
दिशाओं ने की है साजिश पूरब के खिलाफ़ भड़काया है बादलों को कि मत होने दो सुबह बहुत इतराती है ये प्राची कि सूरज इसके दामन से निकलता है रोक लो रास्ता उदित होती हर किरण का चलो छा जाओ कि दुनिया देख न पाए उजाला गरजो, बरसों, बिजलियाँ गिराओ बूँदे नहीं, धरा पर सैलाब ब...

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प्रेम हो या परमात्मा
प्रेम हो या परमात्मा कौन तुम ? अंतर , बाह्य , चहुदिशि , चहुँओर आच्छादित तुमसे अस्तित्व मेरा | संशय में हूँ अब मुझमें कितनी बची शेष मैं ? या आवृत कर डाला
है तुमने सम्पूर्ण मुझे पर देखो   कैसा ये आश्चर्य कि इस संकुलता
से घुटते नहीं
प्राण मेरे न अकुलाते
मुक्ति...

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लगाव
लगाव तुमसे अलग- सा ही है कुछ अदृश्य, अपरिभाषित, अपरिमित अकल्पित हैं सीमायें इसकी है कौन -सा आकर्षण जो विकर्षण की हर सीमा तक जाकर भी फिर - फिर तोड़ समीपता की हर एक सीमा समाहित कर देता है मुझे तुममें सोचती ... कुछ तो कहा होगा किसी ने कुछ नाम तो दिया होगा इस आक...
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