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B N Mishra
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अध्यात्म वह शक्ति है, जो हमारे जीवन की अद्भुत संरचना और बदलाव ला सकती है। इसके माध्यम से नाकामयाबी की गर्त में जाता व्यक्ति सफलता के शिखर पर पहुंच सकता है। बस जरूरत है तो खुद को थोड़ा सा बदलने की।
प्रभु के प्रति अगाध श्रद्धा और अध्यात्म का संगम किसी व्यक्ति को कहां तक पहुंचा सकता है, इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। बस मन और इच्छाशक्ति मजबूत होने चाहिए। मन चार तरह का होता है- कॉन्शस, अनकॉन्शस, कलेक्टिव और कॉस्मिक। ध्यान के जरिए जब हम अपने आज्ञा चक्र को सुदृढ़ करते हैं, तब हमारे कलेक्टिव माइंड को मजबूती मिलती है। मजबूत कलेक्टिव माइंड हमें वह शक्ति देता है, जिससे कोई भी बाधा हमारे लक्ष्य की राह को नहीं रोक सकती।
महत्वपूर्ण कर्म है। अगर कर्म महान हैं तो व्यक्ति देवताओं से भी महान बन सकता है। वहीं अगर कर्म नीच हैं तो हो सकता है कि राक्षसों से भी निम्न श्रेणी प्राप्त हो।

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एक पत्रकार की जिम्मेदारी है क़ि
परिवर्तन की गति को पहचाने और उसे तेज करे। ऐसे वक्त में जब लोगों के हक मारे जा रहे हों, लोगों पर जुल्म हो रहे हों, अपराध बढ़ रहे हों, अपनी वृहत्तर जिम्मेदारियों को समझने की जगह अधिकांश लोग निजी एजेंडे पूरा करने में लगे हों, तब इस धारा को उलटने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है। परंतु आजकल मीडिया या पत्रकार इस विजन के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं दिखता क्योंकि वह पूंजी से नियंत्रित हो रहा है। पूंजी के लिए मीडिया अन्य धंधों की ही तरह एक धंधा है। धंधे में फायदा होना चाहिए। इसीलिए पत्रकार का नजरिया जरूरी मुद्दों को पहचानने और उन्हें उठाने की जगह अब शायद यह बन गया है कि जिन मुद्दों को उठाने से धंधा बढ़ सकता हो, वही उठाये जायें। इस दबाव ने पत्रकारों को पूरी आजादी से वंचित कर रखा है। इस धंधे में कई बार वे चीजें भी अच्छा माल बन जाती हैं, जो समाज को या देश को लाभ पहुंचा सकती हैं। लेकिन ऐसा दुर्घटनावश होता है, किसी दृष्टि के कारण नहीं।

एक पत्रकार की जिम्मेदारी है क़ि
परिवर्तन की गति को पहचाने और उसे तेज करे। ऐसे वक्त में जब लोगों के हक मारे जा रहे हों, लोगों पर जुल्म हो रहे हों, अपराध बढ़ रहे हों, अपनी वृहत्तर जिम्मेदारियों को समझने की जगह अधिकांश लोग निजी एजेंडे पूरा करने में लगे हों, तब इस धारा को उलटने में मीडिया की बड़ी भूमिका हो सकती है। परंतु आजकल मीडिया या पत्रकार इस विजन के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं दिखता क्योंकि वह पूंजी से नियंत्रित हो रहा है। पूंजी के लिए मीडिया अन्य धंधों की ही तरह एक धंधा है। धंधे में फायदा होना चाहिए। इसीलिए पत्रकार का नजरिया जरूरी मुद्दों को पहचानने और उन्हें उठाने की जगह अब शायद यह बन गया है कि जिन मुद्दों को उठाने से धंधा बढ़ सकता हो, वही उठाये जायें। इस दबाव ने पत्रकारों को पूरी आजादी से वंचित कर रखा है। इस धंधे में कई बार वे चीजें भी अच्छा माल बन जाती हैं, जो समाज को या देश को लाभ पहुंचा सकती हैं। लेकिन ऐसा दुर्घटनावश होता है, किसी दृष्टि के कारण नहीं।

कलम न रुकनी चाहिए और न झुकनी चाहिए, कलम न अटकनी चाहिए और न ही भटकनी चाहिए। एक पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी होती है उसकी कलम।
चुनौतियां हर युग में रही हैं। रामायण और महाभारत के काल में भी सज्जन पुरूषों को परेशान किया जाता था लेकिन उस जमाने में भी नारद जैसे लोग लोकोपयोगी कार्य करने में कोताही नहीं बरत रहे थे ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं आदि पत्रकार ..........
नारद मुनी
होली की शुभ कामना

एक पत्रकार की कलम से..........
मुझे मरना मंजूर है, बिकना मंजूर नहीं.जो मुझे खरीद सकें, वो चांदी के कागज अब तक बनें नहीं. मेरा बस यह कहना है कि आप आये हो, एक दिन लौटना भी होगा. फिर क्यों नहीं तुम ऐसा करो कि तुम्हारे अच्छे कर्मों के कारण तुम्हें पूरी दुनिया हमेशा याद रखें. धन-दौलत कमाना कोई बड़ी बात नहीं, पुण्य कर्म कमाना ही बड़ी बात है.
दोस्तो, मैं खुद को शोषण की भट्टी में झोंककर समाचार प्राप्त करने के लिए जलता हूँ. फिर उस पर अपने लिए और दूसरों के लिए महरम लगाने के लिए इस कार्य को लेखनी से अंजाम देता हूँ. आपका यह नाचीज़ दोस्त समाज हित में लेखन का कार्य करता है और कभी-कभी लेख की सच्चाई के लिए रंग-रूप बदलकर अनुभव प्राप्त करना पड़ता है. तब जाकर लेख पूरा होता है. इसलिए पत्रकारों के लिए कहा जाता है कि
रोज पैदा होते हैं और रोज मरते हैं. बाकी आप अंपने विचारों से हमारे मस्तिष्क में ज्ञानरूपी ज्योत का प्रकाशकरें।
निष्पक्ष,निडर,अपराध विरोधी व आजाद विचारधारा वाला प्रकाशक, मुद्रक, संपादक, स्वतंत्र पत्रकार, कवि व लेखक एक सच्चा समाजसेवी है।

वराहमिहिर राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। वे एक गणितज्ञ, खगोलज्ञ और ज्योतिषी थे। उन्होंने पंच सिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहत् जातक, लघु जातक, योग यात्रा और विवाह पटल आदि ग्रंथ लिखे। वे एक अद्भुत विश्लेषक थे। उन्होंने अपनी पुस्तक बृहत्संहिता में यूनानियों और उनके गूढ़ वैज्ञानिक ज्ञान की प्रशंसा की। 
मिहिर का जन्म: मिहिर के पिता आदित्यदास और माता इंदुमती थीं। उनके पिता आदित्यदास सूर्यदेव के प्रबल उपासक थे। उनको सभी प्रकार की सुख-सुविधाएं उपलब्ध थीं परन्तु उनकी कोई संतान नहीं थी। वे निरन्तर सूर्यदेव से संतान पाने की प्रार्थना करते कि उन्हें पुत्र संतान की प्राप्ति हो। पच्चाीस वर्ष की लंबी तपस्या के बाद भी जब उन्हे संतान प्राप्ति नहीं हुई तो उन दोनों ने अपना जीवन समाप्त करने का सोचा। वे दोनों एक नदी के किनारे सूर्यदेव से अंतिम बार प्रार्थना करने गए। अचानक एक बूढ़ा वहां आया, वह स्वयं सूर्यदेव थे। सूर्यदेव ने उन दोनों को आशीर्वाद दिया और बताया कि उन्होंने अपने पिछले जन्म में कुछ पाप कर्म किए थे जिसकी वजह से उन्हें इस जन्म मे नि:संतान रहना प़डा। उन दोनों की लंबी अवधि तक की जाने वाली उपासना के फलस्वरूप उनके जन्म का अपुत्र दोष समाप्त हो गया है। सूर्य देव ने उन्हें यह भी बताया कि आदित्यदास और इंदुमती का पुत्र सूर्य के समान प्रकाश फैलाने वाला होगा और वह राजा विक्रमादित्य के दरबार से जु़डेगा।
 विक्रमादित्य से परिचय: जब मिहिर 21 वर्ष के हुए तब उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। वे एक ब़डे ज्योतिष के रूप में उभरे और उन्हें वाक्सिद्धि (वाक्सिद्धि का अर्थ है बोले गए शब्दों की सत्यता) प्राप्त थी। एक दिन सायंकाल जब मिहिर अपनी संध्या पूजा कर रहे थे तभी राजा विक्रमादित्य अपने सौतेले भाई भाटी के साथ एक व्यापारी के वेश में वहां आए। विक्रमादित्य ने मिहिर से कहा कि हम लोग व्यापारी हैं और किन्हीं विशेष व्यापारिक कारणों से यहां आए हैं। राजा ने मिहिर से पूछा कि उन्हें व्यापारिक सफलता मिलेगी अथवा नहींक् विक्रमादित्य ने मिहिर को 100 स्वर्ण मुद्राएं दीं। मिहिर ने ध्यानपूर्वक देखा और कहा कि वे दोनों व्यापारी नहीं हैं। मिहिर पूर्ण आत्मविश्वास से विक्रमादित्य की ओर संकेत किया और कहा कि आप राजा हैं और भाटी की ओर संकेत किया कि वे मंत्री हैं। साथ ही मिहिर ने यह भी कहा कि आप दोनों सौतेले भाई हैं तथा परिवार की कुछ अन्य गुप्त बातें भी बताई। विक्रमादित्य आश्चर्यचकित रह गए और मिहिर से अत्यधिक प्रभावित हुए। विक्रमादित्य मिहिर को अपने साथ अपने दरबार में ले गए और आजीवन मिहिर वहां रहे। 
मिहिर-वराहमिहर कैसे बने: वराहमिहिर से संबंधित जानकारी यद्यपि अधिक उपलब्ध नहीं है परन्तु फिर भी इनसे संबंधित एक रोचक प्रसंग का उल्लेख मिलता है। वाराह का अर्थ है- जंगली सूअर। राजा विक्रमादित्य का राजा चिन्ह वाराह था। भगवान विष्णु के तीसरे अवतार भी वाराह थे।
 जब राजा विक्रमादित्य की रानी ने पुत्र संतान को जन्म दिया तब राज्य के प्रमुख ज्योतिषियों को राजकुमार की जन्मपत्रिका बनाने के लिए कहा गया। सभी ज्योतिषियों की गणनाओं के अनुसार राजकुमार के 18वें वर्ष में उनके जीवन को खतरा था परन्तु किस प्रकार का खतरा था इस बात को लेकर सभी के विचार भिन्न थे। मिहिर ने दुस्साहसपूर्ण भविष्यवाणी की तथा कहा कि राजकुमार के 18वें वर्ष के एक निश्चित दिन राजकुमार की मृत्यु वाराह द्वारा होगी और कोई भी उपाय राजकुमार के जीवन की रक्षा नहीं कर पाएगा। विक्रमादित्य और उनके मंत्रियों ने आपस में सलाह मशविरा किया और उस खतरे को कम करने के लिए विशेष प्रबंध किए। एक ब़डे महल का निर्माण कराया जिसकी दीवारें 80 फुट ऊंची थीं। विशेष्ा सैनिक पहरेदार नियुक्त किए गए और राजकुमार का उस महल से बाहर जाना वर्जित कर दिया गया। 
इतने प्रबंध के पश्चात् प्रत्येक व्यक्ति इस बात से आश्वस्त हो गया कि राजकुमार अन्य किसी भी प्रकार से जख्मी हो सकते हैं परन्तु वाराह से नहीं क्योंकि उस महल में पंछी भी पर नहीं मार सकता था। इसके विपरीत मिहिर को इस बात का पूर्ण विश्वास था कि कोई भी मनुष्य ग्रहों और देवताओं द्वारा निर्धारित विधान पर विजय नहीं पा सकता। मिहिर की गणना के अनुसार राजकुमार की मृत्यु शाम में लगभग पांच बजे तय थी। सभी कठोर व्यवस्थाओं के पश्चात् विक्रमादित्य ने मिहिर से अपनी भविष्यवाणी पर पुनर्विचार करने के लिए कहा, परन्तु मिहिर तब भी यही बोले कि मैं अपने कथन पर अडिग हूं। सभी मंत्रियों और अन्य महत्वपूर्ण राज दरबारियों के बीच विक्रमादित्य ने यह घोषणा कर दी कि यदि मिहिर की भविष्यवाणी सत्य होती है तो वे अपना राजचिन्ह उनको हस्तांतरित कर देंगे और वे वराह मिहिर आचार्य के नाम से जाने जाएंगे। 
निश्चित समय पर राजा के पास यह सूचना आई कि राजकुमार महल मे खुश और स्वस्थ हैं। मिहिर तब भी शांतचित्त बैठे रहे और उन्होंने राजा से कहा कि राजकुमार तो पहले ही मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं और इस तथ्य की जांच कर ली जानी चाहिए। महल में सबकुछ शांत था परन्तु मिहिर ने कहा कि राजकुमार रक्त रंजित प़डे हैं और किसी भी चौकीदार (दरबारी) ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया। वे सभी महल की छत पर गए और राजा अपने पुत्र के शव को देखकर क्षुब्ध रह गए। उन्होंने देखा कि राजकुमार खून के तालाब में डूबे हुए हैं।
 वह नकली वराह जो राजचिन्ह के रूप में बनाया गया था, वह नीचे गिर गया है और उससे राजकुमार को चोट लगी और उनकी मृत्यु हो गई। मिहिर की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। यद्यपि विक्रमादित्य बहुत दु:खी थे परन्तु फिर भी उन्होंने मिहिर को अपना राजचिन्ह वराह दे दिया और तब से वे वराह मिहिर आचार्य कहलाए।

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सराहनीय और उपयोगी पोस्ट का आभार।
जानिए की कैसे मनाएं इस वर्ष रक्षाबंधन (29 अगस्त,2015) का पर्व वैदिक विधि द्वारा--- --- यह हैं वैदिक रक्षा सूत्र बनाने की विधि :---

सर्वप्रथम इसके लिए निम्न 5 वस्तुओं की आवश्यकता होती है -

(1) दूर्वा (घास)
(2) अक्षत (चावल)
(3) केसर
(4) चन्दन
(5) सरसों के दाने ।

इन सभी 5 वस्तुओं को रेशम के कपड़े में लेकर उसे बांध दें या सिलाई कर दें, फिर उसे कलावा में पिरो दें, इस प्रकार रक्षाबंधन के लिए वैदिक राखी तैयार हो जाएगी ।

जानिए इन पांच वस्तुओं का महत्त्व -

(1) दूर्वा - जिस प्रकार दूर्वा का एक अंकुर बो देने पर तेज़ी से फैलता है और हज़ारों की संख्या में उग जाता है, उसी प्रकार मेरे भाई का वंश और उसमे सदगुणों का विकास तेज़ी से हो । सदाचार, मन की पवित्रता तीव्रता से बदता जाए ।

दूर्वा गणेश जी को प्रिय है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में विघ्नों का नाश हो जाए ।

(2) अक्षत - हमारी गुरुदेव केप्रति श्रद्धा कभी क्षत-विक्षत ना हो सदा अक्षत रहे ।

(3) केसर - केसर की प्रकृति तेज़ होती है अर्थात हम जिसे राखी बाँध रहे हैं, वह तेजस्वी हो । उनके जीवन में आध्यात्मिकता का तेज, भक्ति का तेज कभी कम ना हो ।

(4) चन्दन - चन्दन की प्रकृति तेज होती है और यह सुगंध देता है । उसी प्रकार उनके जीवन में शीतलता बनी रहे, कभी मानसिक तनाव ना हो ।
साथ ही उनके जीवन में परोपकार, सदाचार और संयम की सुगंध फैलती रहे ।

(5) सरसों के दाने - सरसों की प्रकृति तीक्ष्ण होती है अर्थात इससे यह संकेत मिलता है कि समाज के दुर्गुणों को, कंटकों को समाप्त करने में हम तीक्ष्ण बनें ।

इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई एक राखी को सर्वप्रथम भगवान -चित्र पर अर्पित करें । फिर बहनें अपने भाई को, माता अपने बच्चों को, दादी अपने पोते को शुभ संकल्प करके बांधे ।

इस प्रकार इन पांच वस्तुओं से बनी हुई वैदिक राखी को शास्त्रोक्त नियमानुसार बांधते हैं ।। हम सभी पुत्र-पौत्र एवं बंधुजनों सहित वर्ष भर सुख और स्वस्थ रहते हैं ।

राखी बाँधते समय बहन यह मंत्र अपने भाई के लिए बोले –

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल: |
तेन त्वां अभिबन्धामि रक्षे मा चल मा चल ||

शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय –'अभिबन्धामि ‘ के स्थान पर ‘रक्षबन्धामि’ कहे |

और चाकलेट ना खिलाकर भारतीय मिठाई या गुड से मुहं मीठा कराएँ।।।


अपना देश...
अपनी सभ्यता...
अपनी संस्कृति..
अपनी भाषा..
अपना गौरव...
वन्दे मातरम्..।।
जयतु भारती....।।।

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nice to see well expressed tantra in modern and easy way thanks
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