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Suresh Kumar Sharma
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Counselor & Therapist (Total Solution For All Walks Of Life & Beyond)
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चिकित्सा को आपदा प्रबन्धन मंत्रालय के अधीन कर स्वास्थ्य को इस सरकार का केन्द्रीय विषय बनाया जाना चाहिए।
स्वास्थ्य और चिकित्सा एक दूसरे की विरोधी है अब पूरक नही रही। स्वास्थ्य मनुष्य की नैसर्गिकवृत्ति है जब कि चिकित्सा आपातकालीन आवश्यकता। केंद्र सरकार ने एक ही मंत्रालय के अधीन दोनों दोनों तंत्र दे दिये हैं। अगर चिकित्सा स्वास्थ्य कर्मियों के अधीन रहता तो ये एक शुभ दशा होती परंतु हालात ये है कि चिकित्सा उद्योग के कब्जे में मनुष्य की नैसर्गिकवृति स्वास्थ्य चल रहा है। परिणाम ये है कि चिकित्सा उद्योग अपने निहित स्वार्थों के चलते स्वास्थ्य जैसे नैसर्गिक गुण को विकसित ही नही होने दे रहा है।
इसे इस तरह से देखें कि बच्चे को चलना सीखने के लिए सहारा भी चाहिए और स्वावलम्बन के लिए प्रोत्साहन भी। अगर मातापिता का बच्चे के पंगु रहने से कोई ऐसा स्वार्थ सधने लग जाए जिससे वे बच्चे को चलने या स्वावलम्बी होने देने में ही बाधक होने लगें तो वे उसे निरंतर सहारा देने लगेंगे प्रोत्साहन नही देंगे।
देखने में तो लगेगा कि अभिभावक अपने बच्चे के चलने की लाचारी में मददगार है पर वह घोर प्रज्ञापराध कर रहे होंगे।
हमारा चिकित्सा उद्योग आज उसी अभीभावक की तरह से पनप रहा है जो स्वास्थ्य क्रियाओं पर बात करना भी पसन्द नही करता।
सोचिये फायर ब्रिगेड अपनी सेवाओं को जिन्दा रखने के लिए जगह जगह आग लगने के अवसरों को उपेक्षित कर दे तो क्या होगा?
क्या आबकारी विभाग के अधीन मद्य निषेध अधिकारी काम कर रहे हैं?
तो फिर चिकित्सा मंत्री के अधीन स्वास्थ्य सेवाएं कैसे युक्ति संगत है?
सरकार जो धन खर्च कर रही है उसका स्वास्थ्य और चिकित्सा (आपदा प्रबन्धन ) में अनुपात कितना है?
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