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Mansa Anand
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जीवन एक जूगनू की चमक की तरह है...जो इस पल चमका ओर फिर गयाब हो गय...फिर चमका...ओर फिर वही....एक विश्‍यष सर्कल।स्‍वामी अानंद प्रसाद
जीवन एक जूगनू की चमक की तरह है...जो इस पल चमका ओर फिर गयाब हो गय...फिर चमका...ओर फिर वही....एक विश्‍यष सर्कल।स्‍वामी अानंद प्रसाद

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पिरामिड का बनने का काम लगाता नहीं चलता था। परंतु बीच—बीच में उसमें अविराम आ जाता था। क्यों कि रामरतन अंकल जब भी अपने घर जाते तो दो तीन महीने से पहले कभी नहीं आते थे। चाहे वह दिपावली हो या होली हो। क्यों कि घर पर जाने के बाद पाँच काम आपका इंतजार कर रहे होते है सो उन्हें भी निपटाना होता था। फिर यहां आने के बाद तो वह पड़े ही रह जायेगे। परंतु ये कोई चिंता का विषय नहीं था ये तो पूरे घर लिए एक आनंद उत्सेव और छूट्टी का माहोल हो जाता था। इन्हीं दिनों तो जंगल में घूमने में आनंद आता था क्यों कि होली के दिनों में मौसम बसंत का होता है। और दीपावली के समय में भी बारीस जा चूकि होती है और शरद आने को होती है। सौ दोनों संध्याै बड़ी सुंदर होती है। परंतु अब काम की गति कुछ पहले से अधिक हो गई थी। क्यों कि रामरतन अंकल ने अब इधर उधर के सारे काम छोड़ दिये थे। और केवल यही काम अपने हाथ से करते थे।
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आज श्‍याम से ही वह लंगुर बंदर छत पर उतपात मचा रहा है। में कितनी बान उसे डरा चुका हूं परंतु वह तो मुझ पर हमला करनेके लिए तैयारहै....सो जब पापा जी आते है तो हम सब मिल कर उसे वहां से खदड़ेने के लिए तैयार होते है। क्‍योंकि हैमांशु भईया को कमरा तो सबसेउपर था। वह तोजाने को तैयार ही नहीं था। एक बार मेरे साथ गया तब लंगुर बंदर ने उसे बड़े—बड़े दाँत दिखलायेतो वह अपने कान बोचकर जो नीचे भागा.....तब से मम्‍मीके पास ही है। अरे बीच में वरूण भैया का कमरा पड़ता है। तब क्‍या किया जा सकता था। सब ने अपनी रक्षा के लिए हाथों में एक—एक डंडा ले लिया था। सबसे आगे पापा जी थे...कभी—कभी में भी सबसे आगे हो जाता था। हम बंदर को एक तरफसेभगता तो वह दूसरी तरफ से नीचे आ जाता। जब हम नीचे आते तो वह उपर दिखाई देता...इसी तरह कितनेही चक्‍करलगवा चुका था। सब परेशान हो रहे थे।
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कितना आनंद और उत्सव में सराबोर था, इस टेहनी से उस टहनी पर कुदता फांदता कितना मन को मोह रहा था। मैं पेड पोधो को पानी डालते उसे खुब नहलाया वह कैसे फंख खोल कर नहा रहा था। जैसे उसे वो सब चाहिए। तब हम पूरी की और चले गये वहां पहुचने पर बेटी बोधी उनमनी में कहा की वह तोता तो अपको चारो ओढूंढ रहा है ओर बहुत शौर मचा रहा है मैंने उसे सेब आदि खाने के दिये परंतु वह कुछ ढूढता सा प्रतित हो रहा है और मेरे नीचे चले जाने के बाद बहुत शौर मचा रहा है काम करने वाली भी कह रही थी की मेरे पास आ कुछ कहना चाहता था। ओर उसका भी दिल भर आया। कि शायद मम्मी-पापा को ढूंढ रहा है। ओर सच वह श्याम होते न होते उड गया। बेटी ने फोन किया की पापा वह तोता तो उड गया....शयद आपको ढूंढता रहा...ओर आप उपर नहीं आये तो चला गया।
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मनुष्य-जाति फिर उस बिंदु के करीब आ रही है जहां वह अपने को बढ़ा कर समाप्त हो सकती है। बुद्ध के जमाने में इस देश की आबादी दो करोड़ थी। लोग अगर थोड़े खुशहाल थे तो कोई सतयुग के कारण नहीं। जमीन थी ज्यादा, लोग थे कम। अतीत की जो हम स्मृतियां लाए हैं खुशहाली की, वे खुशहाली की स्मृतियां नहीं हैं। वे स्मृतियां हैं जमीन के ज्यादा होने की, लोगों के कम होने की। भोजन ज्यादा था, लोग कम थे, इसलिए खुशहाली थी।
सारी मनुष्य-जाति की संख्या--और अगर हम दो हजार साल पीछे चले जाएं बुद्ध से--तो आज से पांच हजार साल पहले सारी पृथ्वी की संख्या ही दो करोड़ थी। आज पृथ्वी की संख्या साढ़े तीन अरब से ऊपर है, साढ़े तीन सौ करोड़ से ऊपर है। पृथ्वी उतनी ही है, संख्या साढ़े तीन सौ करोड़ से ऊपर है। और हम प्रतिदिन उस संख्या को बढ़ा रहे हैं। वह संख्या हम इतनी तेजी से बढ़ा रहे हैं कि अंदाजन डेढ़ लाख लोग रोज बढ़ जाते हैं। जितनी देर मैं यहां घंटे भर बात करूंगा उतनी देर मनुष्यता शांत नहीं बैठी रहेगी। उस घंटे भर में हजारों लोग बढ़ चुके होंगे। यह सदी पूरी होते-होते, अगर दुर्भाग्य से आदमी को समझ न आई तो इस सदी के पूरे होते-होते यानी आज से तीस वर्ष बाद, जमीन पर कोहनी हिलाने की जगह न रह जाएगी। तब सभाएं करने की बिलकुल जरूरत नहीं पड़ेगी। हम चौबीस घंटे सभाओं में होंगे।
यह हो नहीं पाएगा। यह हो नहीं पाएगा, कोई न कोई सौभाग्य, युद्ध, महामारी--कोई न कोई सौभाग्य मैं कह रहा हूं--इसे होने नहीं देगा। लेकिन अगर यह महामारी और युद्ध से हुआ तो मनुष्य की बुद्धि पर बड़ा कलंक लग जाएगा। जिन डायनासोर की मैंने बात की, जिन छिपकलियों की बात की जो हाथियों से बड़ी थीं, अब नहीं हैं, उनके पास कोई बुद्धि न थी, शरीर बहुत बड़ा था। वे कोई उपाय न कर सके, वे कुछ सोच न सके, वे मर गए।
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इस देश का मन समझना जरूरी है तभी उस मन को बदलने की बात भी हो सकती है; क्योंकि जिसे बदलना हो उसे ठीक-से समझ लेना आवश्यक है। इस देश का मन अब तक कैसा था? क्योंकि उस मन के कारण ही यह देश जैसा रहा, वैसा रहा। यह देश अगर नहीं बदला पांच हजार वर्षों तक, अगर इस देश में कोई क्रांति नहीं हुई, तो कारण इसकी चेतना में कुछ तत्व थे जिनके कारण क्रांति असंभव हो गई। और वे तत्व अभी भी मौजूद हैं। इसलिए क्रांति की बात सफल नहीं हो सकती जब तक वे तत्व भीतर से टूट न जाएं।
जैसे, इस देश का मन-मानस, प्रतिभा--पूरे अतीत के इतिहास में, विचार पर नहीं विश्वास पर आधारित रही है। और जो देश, जो मन, जो चेतना विश्वास पर आधारित होती है, वह अनिवार्यरूपेण अंधी हो जाती है; उसके पास सोच-विचार की क्षमता क्षीण हो जाती है। मनुष्य के जीवन का यह अनिवार्य वैज्ञानिक अंग है कि हम जिन अंगों का उपयोग करते हैं वे विकसित होते हैं, जिन अंगों का उपयोग नहीं करते हैं वे पंगु हो जाते हैं। एक बच्चा पैदा हो और उसके पैर हम बांध दें, बीस साल बाद उसके पैर खोलें तो उसके पैर मर चुके होंगे; वह उन पैरों से कभी भी न चल सकेगा। और यह भी हो सकता है कि बीस साल बाद हम उससे कहें कि इसीलिए तो हमने तेरे पैर बांधे थे कि तू पैरों से चल ही नहीं सकता है। और तब वह भी हमारी बात पर भरोसा करेगा; क्योंकि चल कर देखेगा और गिरेगा। अगर आंखें बंद रखी जाएं बीस वर्षों तक तो आंखें रोशनी खो देंगी। हम जिस हिस्से का प्रयोग बंद कर देंगे वह समाप्त हो जाएगा। जीवन का आधारभूत नियम है कि हम जिस हिस्से का जितना प्रयोग करते हैं, वह उतना विकसित होता है।
यह जिंदगी ऐसी है, जैसे कोई आदमी साइकिल चलाता है।
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सारी दुनिया आध्यात्मिक रूप से एक गुलामी में है और गुलामी का कारण है एक मानसिक आलस्य, एक मेंटल लेथार्जी। भीतर हम कुछ भी नहीं करना चाहते हैं। इसलिए कोई भी जोर से कह दे कि मेरी बात मानो, मैं भगवान हूं; या चार नासमझों को इकट्ठा कर ले और बाजार में डुंडी पिटवा दे कि एक बहुत बड़े महात्मा गांव में आ रहे हैं, तो हम मानने को एकदम तैयार हो जाते हैं। हम मानने को तैयार ही बैठे हैं--कोई आ जाए और हमें कहे कि मैं ठीक हूं; जोर से कहना चाहिए; और वस्त्र उसके रंगे हुए होना चाहिए; और उसके आस-पास प्रचार की हवा होनी चाहिए; फिर हम मानने को तैयार हो जाते हैं।
क्या हम सोचने को कभी भी तैयार नहीं होंगे? मनुष्य-जाति का जन्म ही नहीं होगा अगर मनुष्य सोचने को तैयार नहीं होता है। लेकिन हम सोचने को बिलकुल तैयार नहीं हैं।
मेरा कोई भी आग्रह नहीं है कि मैं जो कहता हूं उसे मानें; और इसलिए न मानें इसका भी आग्रह नहीं है। आग्रह कुल इतना है कि जो मैं कहता हूं उसे सुनें, समझें। वही मुश्किल हो गया, क्योंकि भाषा ही ऐसी मालूम पड़ती है। मैं कोई और भाषा बोलता हूं, आप कोई और भाषा समझते हैं।
एक गांव मैं गया हुआ था। एक मित्र आए और कहने लगे, लोकतंत्र के संबंध में आपका क्या खयाल है? डेमोक्रेसी के बाबत आप क्या सोचते हैं? मैंने कहा, जिसे तुम लोकतंत्र कहते हो अगर यही लोकतंत्र है, तो इससे तो बेहतर है कि मुल्क तानाशाही में चला जाए। उन्होंने जाकर गांव में खबर कर दी कि मैं तानाशाही को पसंद करता हूं।
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यह बात ध्यान में रख लेनी जरूरी है कि अगर मेरे आस-पास इकट्ठे हुए मित्र कोई संगठन करना चाहते हैं, तो वह संगठन धार्मिक नहीं होगा। और उस संगठन में सम्मिलित हो जाने से कोई मनुष्य धार्मिक नहीं हो जाएगा। जैसे एक आदमी हिंदू होने से धार्मिक हो जाता है, मुसलमान होने से धार्मिक हो जाता है, वैसे जीवन जागृति केंद्र का सदस्य होने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता।
धार्मिक होना दूसरी ही बात है। उसके लिए किसी संगठन का सदस्य होने की जरूरत नहीं है। बल्कि सच तो यह है कि जो किसी संगठन का--धार्मिक संगठन का--सदस्य है, वह धार्मिक संगठन की सदस्यता उसके धार्मिक होने में निश्चित ही बाधा बनेगी। जो आदमी हिंदू है वह धार्मिक नहीं हो सकता। जो जैन है वह भी धार्मिक नहीं हो सकता। जो मुसलमान है वह भी धार्मिक नहीं हो सकता। क्योंकि संगठन में होने का अर्थ संप्रदाय में होना है। संप्रदाय और धर्म विरोधी बातें हैं। संप्रदाय तोड़ता है, धर्म जोड़ता है।
इसलिए पहली बात तो यह समझ लेनी जरूरी है कि मेरे आस-पास अगर कोई भी संगठन खड़ा किया जाए तो वह संगठन धार्मिक नहीं है। उसे धार्मिक समझ कर खड़ा करना गलत होगा। इसलिए जिन मित्रों ने कहा कि धार्मिक संगठन नहीं हो सकता, उन्होंने बिलकुल ही ठीक कहा है, कभी भी नहीं हो सकता है। लेकिन उनको शायद भ्रांति है कि और तरह के संगठन नहीं हो सकते।
और तरह के संगठन हो सकते हैं। जीवन जागृति केंद्र भी और तरह का संगठन है, धार्मिक संगठन नहीं। इस समाज में इतनी बीमारियां हैं, इतने रोग हैं, इतना उपद्रव है, इतनी कुरूपता है कि जो मनुष्य भी धार्मिक है, वह मनुष्य चुपचाप इस कुरूपता, इस गंदगी, इस समाज की मूर्खता को सहने को तैयार नहीं हो सकता। जो मनुष्य धार्मिक है वह बरदाश्त करने को तैयार नहीं होगा कि यह कुरूप समाज जिंदा रहे और चलता रहे। जिस मनुष्य के जीवन में भी थोड़ी धर्म की किरण आई है वह इस समाज को आमूल बदल देना चाहेगा।
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हम थोड़े ज्यादा बेईमान हैं। हम धर्म से सारा संबंध भी तोड़ लिए हैं, लेकिन हम ऊपर से यह भी दिखाने की चेष्टा करते हैं कि हम धर्म से संबंधित हैं। हमारा कोई आंतरिक नाता धर्म से नहीं रह गया है। हमारे कोई प्राणों के अंतर्संबंध धर्म से नहीं हैं। लेकिन हम ऊपर से दिखावा जारी रखते हैं। हम ऊपर से यह प्रदर्शन जारी रखते हैं कि हम धर्म से संबंधित हैं, हम धार्मिक हैं।
यह और भी खतरनाक बात है। यह अधर्म को छिपा लेने की सबसे आसान और कारगर तरकीब है। अगर यह भी स्पष्ट हो जाए कि हम अधार्मिक हो गए हैं, तो शायद इस अधर्म को बदलने के लिए कुछ किया जा सके। लेकिन हम अपने को यह धोखा दे रहे हैं, एक आत्मवंचना में हम जी रहे हैं कि हम धार्मिक हैं।
और यह आत्मवंचना रोज महंगी पड़ती जा रही है। किसी न किसी को यह दुखद सत्य कहना पड़ेगा कि धर्म से हमारा कोई भी संबंध नहीं है। हम धार्मिक भी नहीं हैं और हम इतने हिम्मत के लोग भी नहीं हैं कि हम कह दें कि हम धार्मिक नहीं हैं। हम धार्मिक भी नहीं हैं और अधार्मिक होने की घोषणा कर सकें, इतना साहस भी हमारे भीतर नहीं है।
तो हम त्रिशंकु की भांति बीच में लटके रह गए हैं। न हमारा धर्म से कोई संबंध है, न हमारा विज्ञान से कोई संबंध है। न हमारा अध्यात्म से कोई संबंध है, न हमारा भौतिकवाद से कोई संबंध है। हम दोनों के बीच में लटके हुए रह गए हैं। हमारी कोई स्थिति नहीं है। हम कहां हैं, यह कहना मुश्किल है। क्योंकि हमने यह बात जानने की स्पष्ट कोशिश नहीं की है कि हम क्या हैं और कहां हैं। हम कुछ धोखों को बार-बार दोहराए चले जाते हैं और उन धोखों को दोहराने के लिए हमने तरकीबें ईजाद कर ली हैं। हमने डिवाइसेज बना ली हैं और उन तरकीबों के आधार पर हम विश्वास दिला लेते हैं कि हम धार्मिक हैं।
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कोई दो सौ वर्ष पहले, जापान में दो राज्यों में युद्ध छिड़ गया था। छोटा जो राज्य था, भयभीत था; हार जाना उसका निश्चित था। उसके पास सैनिकों की संख्या कम थी। थोड़ी कम नहीं थी, बहुत कम थी। दुश्मन के पास दस सैनिक थे, तो उसके पास एक सैनिक था। उस राज्य के सेनापतियों ने युद्ध पर जाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह तो सीधी मूढ़ता होगी; हम अपने आदमियों को व्यर्थ ही कटवाने ले जाएं। हार तो निश्चित है। और जब सेनापतियों ने इनकार कर दिया युद्ध पर जाने से...उन्होंने कहा कि यह हार निश्चित है, तो हम अपना मुंह पराजय की कालिख से पोतने जाने को तैयार नहीं; और अपने सैनिकों को भी व्यर्थ कटवाने के लिए हमारी मर्जी नहीं। मरने की बजाय हार जाना उचित है। मर कर भी हारना है, जीत की तो कोई संभावना मानी नहीं जा सकती।
सम्राट भी कुछ नहीं कह सकता था, बात सत्य थी, आंकड़े सही थे। तब उसने गांव में बसे एक फकीर से जाकर प्रार्थना की कि क्या आप मेरी फौजों के सेनापति बन कर जा सकते हैं? यह उसके सेनापतियों को समझ में ही नहीं आई बात। सेनापति जब इनकार करते हों, तो एक फकीर को--जिसे युद्ध का कोई अनुभव नहीं, जो कभी युद्ध पर गया नहीं, जिसने कभी कोई युद्ध किया नहीं, जिसने कभी युद्ध की कोई बात नहीं की--यह बिलकुल अव्यावहारिक आदमी को आगे करने का क्या प्रयोजन है?
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हां, जरूर एक और भी संतोष है। वह संतोष हारी हुई आकांक्षाओं का संतोष नहीं, समझी गयी आकांक्षाओं का संतोष है। जब तुम किसी आकांक्षा को ठीक-ठीक समझ लेते हो, जब तुम देख लेते हो उसकी गहराई में और पाते हो कि उसके पूरे होने में भी कुछ पूरा नहीं होगा, पूरी हो जाए तो भी तुम अधूरे रहोगे, मिल जाए यह संपदा तो भी तुम्हारी विपदा कम न होगी, और मिल जाए यह प्यारा तो भी तुम्हारी प्रीति की अभीप्सा पूरी न होगी, जब तुम्हारी दृष्टि ऐसी निखार पर होती है, तुम्हारा अंतर्बोध इतना स्पष्ट होता है, जब तुम्हारे चैतन्य के दर्पण में चीजें साफ-साफ जैसी है वैसी परिलक्षित होती हैं, तब एक और संतोष पैदा होता है। वह संतोष सांत्वना नहीं है, सत्य का साक्षात्कार है। जैसे कोई देख ले कि मैं रेते को निचोड़ कर तेल निकालने की कोशिश कर रहा था।
एक संतोष है कि निचुड़ा नहीं तेल, तो तुम यह कहने लगे कि मुझे तेल की जरूरत न थी, इसलिए मैंने श्रम छोड़ दिया। और एक संतोष है कि तुमने गौर से देखा, पहचाना, परखा, साक्षी बने और पाया कि रेत में तेल होता ही नहीं, तुम लाख करो उपाय तो भी रेत से तेल निचुड़ेगा नहीं, ऐसी प्रतीति में, ऐसे साक्षात्कार में एक संतोष की वर्षा हो जाती है।
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