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विमलेश त्रिपाठी
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प्यार लिखना चाहता हूं...
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लवली गोस्वामी की कविताएँ
लवली गोस्वामी लवली गोस्वामी की कविताएँ ही उनका परिचय हैं –   कभी उनका इतर परिचय जानने का अवसर न मिला।
फेसबुक पर सक्रिय कम महिलाएँ हैं जो इतनी सशक्त कविताएँ लिख रही हैं। इस कवि के
पास अपनी एक खांटी भाषा है और बिंबों को रखने और बरतने का एक अलग मिजाज भी। इनकी
...

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देशप्रेम किसे कहते हैंः शंभुनाथ
देशप्रेम
किसे कहते हैं शंभुनाथ शंभुनाथ अतीत से आलोचनात्मक संबंध तोड़ना और उससे संकीर्ण
राजनैतिक संबंध स्थापित करना अंध-राष्ट्रवाद का लक्ष्य होता है। संस्कृति के
सुवासित धार्मिक वस्त्रों के भीतर बर्बरता छिपी होती है। दरअसल , बहिष्कारपरक देशप्रेम ही अंध-राष्ट्...

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पहली बार नीलोत्पल रमेश की कविताएँ अनहद पर
नीलोत्पल रमेश की कविताएँ सहज तो हैं ही उनके अंदर अख्यानता के भी दर्शन होते हैं। हिन्दी कविता में इस तरह की कविताओं की अपनी परंपरा रही है - और महत्व भी। अच्छी बात है कि कवि को लोक और उसकी शब्दावली से जुड़ाव है। वर्षों से लोक कथा और आख्यानों में जीता रहा है, ...

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      विमुद्रीकरण राजा को जब हो जाता है
एहसास मेरे द्वारा
प्रचलित मुद्राएँ काला-बाजारियों
द्वारा बेधडक हो रही हैं
इस्तेमाल तब वह    बार-बार सोचने पर हो जाता है विवश राजा बुलाता है अपने
मंत्रियों को इस गंभीर समस्या के
समाधान हेतु और दे देता है
कार्य कि इस पर...

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भोजपुरी का दुखः मृत्युंजय पाण्डेय
भोजपुरी का दुख मृत्युंजय पाण्डेय मृत्युंजय पाण्डेय युवा आलोचक और प्राध्यापक हैं। हिन्दी की
बोली भोजपुरी को भाषा की मान्यता मिलनी चाहिए या नहीं इसको लेकर हिन्दी जगत में दो
समूह तैयार हो गया है। सदानंद साही तथा निलय उपाध्याय जैसे लेखकों की माँग है कि भोजपुरी
...

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विमलेश शर्मा की कविताएँ
विमलेश शर्मा विमलेश शर्मा की कविताएँ पढ़ते हुए आप एक प्रवाह का अनुभव करेंगे जहाँ बीच-बीच में संवेदना के
द्वीप आपकी राह तकते खड़े मिलेंगे। यहाँ कोई बड़ी बात नहीं कही जा रही होती न ही
कोई बड़ा दावा ही किया जा रहा होता है – कई बार अपने मन की तंतुओं को खोलकर कर...

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बाकलम खुद कुमारिल, खुद प्रभाकर : हिंदी के नामवर - प्रफुल्ल कोलख्यान
बाकलम खुद कुमारिल , खुद प्रभाकर : हिंदी के नामवर प्रफुल्ल कोलख्यान ‘ समाज का संगठन आदिकाल से
आर्थिक भीत्ति पर होता आ रहा है। जब मनुष्य गुफाओं में
रहता था , उस समय भी उसे जीविका के लिए छोटी - छोटी टुकड़ियाँ बनानी
पड़ती थीं। उनमें आपस में लड़ाइयाँ भी होती रहत...

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जेएनयू को बचाने की ज़रूरत है - डॉ. ऋषि भूषण चौबे
जेएनयू को बचाने की ज़रूरत है डॉ. ऋषि भूषण चौबे डॉ. ऋषि भूषण चौबे पिछले साल
देश के नामी विश्वविद्यालयों में शुमार जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय , दिल्ली (जेएनयू ) में कुछ लोगों ने तथाकथित तौर पर देश विरोधी नारे
लगाये थे । इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर वहाँ के तत्...

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भरत प्रसाद की कविताएँ
भरत प्रसाद भरत प्रसाद ने कविता, कथा और आलोचना तीनों ही विधाओं में लागातार श्रेष्ठ लेखन किया है। किसी भी रचनाकार की लागातार सक्रियता मुझे बेहद आकर्षित करती रही है। भरत जी न केवल लागातार सक्रिय हैं वरन् महत् लेखन भी कर रहे हैं। उनकी कविताओं में अपनी जड़ो के प...

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कोलकाता में अभी मनुष्य बसते हैं - शंभुनाथ
कोलकाता में अभी मनुष्य
बसते हैं शंभुनाथ   शंभुनाथ मैंने 1970 के दशक में कोलकाता के लेखकों का प्रचंड व्यवस्था-विरोध देखा है , जो अब एक मरती हुई भावना है। हिंदी और बांग्ला लेखकों के बीच तब नमस्कार-भालोबासा
कहीं नहीं तो देशी शराब के एक चर्चित अड्डे खलासीटोला म...
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