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Vinod Bhavuk
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एक रचना अपनी जमात के लिए

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नां बेशक अज्जें चमकें धर्मशाला दा, खास केंह सिद्धबाड़ी, कुस्जो क्या दसणा?
दिलां रा रोग रंगाड़ी कुस्जो क्या दसणा? अपणा टिढ कुहाड़ी कुस्जो क्या दसणा? अप्पु नें ग्लांदे न, सीसे गल्लां लांदे न, लेया क्या नुआड़ी, कुस्जो क्या दसणा? नां बेशक अज्जें चमकें धर्मशाला दा, खास केंह सिद्धबाड़ी, कुस्जो क्या दसणा? भला क्यो कोई प्यारु जोतां लंघदा ...

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अम्बर ही खांदा रेहा खेतिया.
बेला होई संजली, औट फसी मंझली, मिस होई कनिका, औणी काहलू अंजली ( कुल्लू- मंडी रूट पर गुजरते हुए) अज्ज असमाने ते बरेया है रूं.  रसलियां धारां पेई गेया हियूं. कदी गेतिया, कदी पछेतिया. अम्बर ही खांदा रेहा खेतिया.

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चारण कुर्सी पायेगा.
धर्मराज के खाते उपहास लिखा है हमने ही राम को बनवास लिखा है. रामराज में इल्जाम सिया के सर, हमने कान्हा को कारावास लिखा है जो वजह तक नहीं जाओगे.  समाधान कहां से लाओगे. खुद बिगडैल न सुधरे जो, तो किसको क्या समझोगे गूंगा मौज उडाएगा. चारण कुर्सी पायेगा. जो विरोध ...

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लागियो तांदी रख चुक बोबो
हन बड़े सणखे अणमुक बोबो तिस चन्द्रे बिच है फुक बोबो इक गल दसणी रुक रुक बोबो करदा है दिल धुक धुक बोबो ठुक हुस्ने दी इश्क भी समझें दिल कने सीसा नाजुक बोबो तोंद भी आई है ओंद तिन्हा दी लागियो तांदी रख चुक बोबो

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बाबे बड़े परचंडी दिक्ख।।
छड सड़का,पगडंडी दिक्ख। कदी तां जोता हंडी दिक्ख।। धारां, रुखां, पाणिये सोगी, कुछतां गल्लां बंडी दिक्ख।। दोहडू पट्टू कम्मे औणे, झुल्दी होआ ठंडी दिक्ख।। है रोज दराटे पलदा पर, कदीतां बलुआं चंडी दिक्ख।। चिड़ियां औणा चोगा चुगणा, रोणे चौलां छंदी दिक्ख।। रिहलू, रैत, ...

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फिर तोहफे में चंबा रूमाल हो जाये...........
जब कोई यू हीं हमख्याल हो जाये। सारी दुनिया में तो बवाल हो जाये।। फिर तो जीना मुहाल हो जाये,अगर। हर जुबां पे इक ही सवाल हो जाये।। उससे अब भी जो बचपना है बाकि। जो भी मिले उससे निहाल हो पाये।। है मौत के बाद भी जिंदगी का सफर। जिंदगी हो मौत हो मिसाल हो जाये।। बर...

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दुनिया च बखरा चंबा रुमाल.
'दो रूखे टाँके दा नौखा कमाल. दुनिया च बखरा चंबा रुमाल. रागां दी माला, सैह बाहरामासा कृष्णे दी मुरली, राधा दे हाल. दुनिया च बखरा चंबा रुमाल.................. कदी रासलीला, कुथी नाच पोंदे. मोही लें गोपियां, मस्त गोपाल. दुनिया च बखरा चंबा रुमाल....................

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बताओ कब तक?
( कविता जैसा कुछ) बताओ कब तक? टुकड़ों पर पलने वाले, घुटनों के बल आयेंगे. जब जब आका गुर्रायेंगे प्यादे चीखेंगे- चिल्लायेंगे सियासत की आड़ में, वोटों के जुगाड़ में पलते जो लफंगे रहेंगे इस देश में दंगे रहेंगे ...विनोद भावुक......

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गोकुल से पूछिए मथुरा न जाने, क्यों माखन चोर मुरारी रहे हैं.
वो सिंहासन के आभारी रहे हैं नौकर जो भी सरकारी रहे हैं तभी हुनर को लाचारी रही है जुगाड़ वाले सभी भारी रहे हैं गूंगे राजाओं के किले सदा से बहरे बजीरो की आभारी रहे हैं. बाघों की बगावत गांव शहर जगल में अब शिकारी रहे हैं सरकारें तो आती जाती रही हैं काबिज अक्सर दर...
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