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vishambhar mishra
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वही दोपहरी गांव की
कुछ मेरा मन मतवाला था ऊपर से साथ तुम्हारा था तुम झाड़ी में छुप जाती थीं मैं दूर-दूर तक जाता था कहीं पारिजात की खुशबू थी कहीं लौकिक गंध तुम्हारी थी कैसे भूलूं उस बचपन को कैसे छवि भूलूं गांव की याद आ रही है हमको अब वही दोपहरी गांव की कहीं  गूलर लाल टपकते थे कह...
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सारे ग्रंथों का सार हो तुम
तुम  ईश्वर की संरचना हो जागती आंखों का सपना हो जीवन के सारे सुख तुमसे तुम सबसे सुंदर रचना हो फीके हैं वेद-पुराण सभी फीकी हैं सारी कविताएं सारे ग्रंथों का सार हो तुम तुम से हैं सारी रचनाएं तुम हो तो मेरा जीवन है तुमसे ही मेरा गठबंधन है तुम सच में शुद्ध कल्पन...
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