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नीतीश मिश्र
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नमक पर प्रेमपत्र लिखता हूँ
मैं कागजों पर नहीं  नमक पर प्रेमपत्र लिखता हूँ  जिससे प्रेमपत्र का स्वाद  सदियों तक सुरक्षित रहे  हाँ  मैं अब तुम्हे नमक के टुकड़ों पर प्रेमपत्र लिखता हूँ ताकि मेरा प्रेमपत्र समुद्र भी पढ़ सके अनाज भी इंसान भी और बर्तन भी आग भी।।
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प्रश्न दीवारों में जीवित हैं .
सारे प्रश्न  अभी भी दीवारों में  जीवित हैं ...... रात भर मैं  अपनी आत्मा से प्रश्नो की केंचुल उतारकर  दीवारों पर सजाता रहता हूँ मेरी दीवारें मेरी आत्मकथा हैं मैं दिन भर धरती पर  उत्तर की खोज में साईकिल से भटकता रहता हूँ ......  इस क्रम में आँखों में कई बार ...
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एक बार गहरी नींद सोना चाहता हूँ
मैं युद्ध पर जाने से पहले  एक बार गहरी नींद सोना चाहता हूँ  और नांव के एकांत को  अपने भीतर भरना चाहता हूँ  मैं युद्ध पर जाने से पहले एक बार  अपने घर की नीव में उतरना चाहता हूँ  और वहां माँ की रखी हुई आस्था को  एक नया अर्थ देना चाहता हूँ मैं युद्ध पर जाने से...
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मेरा प्रेमपत्र लेकर कबूतर उड़ रहा हैं
मैं तुमको ऐसा प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ जिसे कबूतर लेकर सरहदों के पार   उड़ सके आसमान उसमे कुछ रंग भर सके देवता प्रेमपत्र का वाचन कर सके गरूण देखे तो कुछ देर तक बंद कर दे अपनी उड़ान ..... इंद्र देखे तो उसे  भोग से घृणा होने वृहस्पति देखे तो टूट जाए उसका  अं...
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इस सदी का प्रेमपत्र लिखना ही धर्म है
केवल मैं ही तुम्हें प्रेमपत्र नहीं लिखता हूं मेरे प्रेमपत्र में मेरा शहर भी शामिल होता है मेरे शहर की हवा भी उपस्थित रहती है मेरे कमरे का अंधेरा भी प्रेमपत्र में शामिल हो जाता है मैं जब खुश होता हूं या जब दुखी रहता हूूं या जब  सुख- दुख कुछ भी नहीं होता है त...
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मैं कविता नहीं लिखना चाहता
अब मैं कविता नहीं लिखना चाहता  या कविता लिखने की मुझमे योग्यता नहीं है  अब मैं केवल और केवल  प्रेमपत्र लिखना चाहता हूँ  प्रेमपत्र सिर्फ मैं उस लड़की को नहीं लिखना चाहता हूँ  जो मुझसे प्रेम करने की साहस रखती थी बल्कि उस लड़की को भी लिखना चाहता हूँ जिससे मैं प्...
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जूते की शिकायत
बारिश से पूरा शहर खुश था  सबसे अधिक शहर के नाले खुश थे  साल में कुछ ही दिन तो होते है  जब नालों की प्यास बुझती है प्यास बुझने के बाद नाले शहर के विवेक को बचाने में जूट जाते है अगर नाले शहर में न हो तब शहर का विवेक मर जाता है कभी कभी बहुत जरूरी होता है नालों...
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दिल्ली केवल भाषा है
दिल्ली एक आईना है  जहाँ हर कोई अपना चेहरा देखना चाहता है  दिल्ली एक किताब है  जहाँ पूरा हिंदुस्तान अपना अध्याय खोज रहा है  दिल्ली एक जूते के समान है  जिसे हर पाँव पहनना चाहता है  दिल्ली एक बेल्ट है  जिसे सभी लोग कमर में कसना चाहते है  दिल्ली एक पर्स है  जो ...
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सड़क सब कुछ जानती है
तुम कहाँ हो तुम कैसी हो मुझे नहीं मालूम  कई बार जानना चाहा पर परिंदों की तरह शाम को अजान होने से पहले खाली मुंह वापस लौट आता लेकिन तुम्हारे बारे में मुझसे अधिक सड़के जानती है हर सड़क को मालूम है तुम्हारा वजन कितना है हर सड़क को मालूम है तुम्हारे पाँव में जूते ...
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मेरा जूता बारिश को बुलाता हैं
मुझसे अधिक बारिश का इंतजार  मेरे जूते  को हैं ....  आत्मा को कभी कभी  पानी नसीब हो जाता हैं   मेरी सजगता के चलते जूते की प्यास नहीं बुझती  जूता तभी भींगता हैं  जब बारिश होती हैं  मेरा जूता इस वक्त मरने के कगार पर हैं  इसके बाद भी  इंद्र को हर रोज ढेंगा दिखा...
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