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Nirmal Gupta
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निर्मल गुप्त
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पिता को याद करते हुए.....
मेरे पिता सेवानिवृत हुए तो दफ्तर की मेज पर रखे विदाई के सामान वहीं छोड़ आये अपनी अधिकारिक अहमन्यता   मोटे अक्षरों में छपी मानस की प्रति और नक्काशीदार फोल्डिंग छड़ी भी. दे आये छावनी पेड़ के नीचे   शताब्दियों से बैठी जिस तिस को दुआएं देती माई को गलत हिज्जों में ...

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निशब्दता की मुनादी
थक गया हूँ शायद सरकंडे की कुर्सी पर
बैठा अकेला अब तो कोई यह भी
नहीं कहता परे सरको हमें भी दो
  टिकने लायक जगह रिक्तता ऐसी जैसे
निशब्द बियाबान. लिखने के लिए
स्निग्ध कागज है बेहतरीन कलम है बिना स्याही में
डुबाये फरफर हवा की तरह
चलने वाली हवा है ही नहीं जो
उड़ा...

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निशब्दता की मुनादी
थक गया हूँ शायद सरकंडे की कुर्सी पर
बैठा अकेला अब तो कोई यह भी
नहीं कहता परे सरको हमें भी दो
  टिकने लायक जगह रिक्तता ऐसी जैसे
निशब्द बियाबान. लिखने के लिए
स्निग्ध कागज है बेहतरीन कलम है बिना स्याही में
डुबाये फरफर हवा की तरह
चलने वाली हवा है ही नहीं जो
उड़ा...

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इतिहास का तंदूर
काश्मीर सुलग रहा है।स्वर्गिक
घाटी में केसर की जगह आग की फसल लहलहा रही है।इतिहास ने अपनी भूलों को  दोहराने के लिए तंदूर सुलगा लिए हैं।अग्नि का
जश्न मनाने के लिए उत्सवधर्मी भीड़ सडकों पर उतर आई है।चारों ओर जिंदगी मौत का
पुनर्पाठ कर रही है।जीवन और मरण के बीच की...

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गधे दरअसल गधे ही होते हैं
गधे पर
राष्ट्रव्यापी विमर्श जारी है।बेचारे को इस बात का पता भी नहीं।वह मैदान में इधर
उधर विचरता हरी घास चर रहा है।बीच बीच में वह दुलत्ती झाड़ने की प्रेक्टिस करता है
तो वातावरण में धूल उठती है।देखने वाले समझते हैं कि वह विमर्श के लिए कोई जरूरी
सवाल उठा रहा है...

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