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sushil bhole
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कर के साज-संवांगा बेटी....
कर के साज-संवांगा बेटी देख होगे हे तइयार अरे मंदरिहा ताल बजा, झन कर रे मुंधियार हमर संस्कृति के निसदिन होही तभे बढ़वार नवा पीढ़ी जब अगुवा बनके आही खेवनहार सुशील भोले संजय नगर, रायपुर (छ.ग.) मो. 9826992811, 79747-25684

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कर के साज-संवांगा बेटी....
कर के साज-संवांगा बेटी देख होगे हे तइयार अरे मंदरिहा ताल बजा, झन कर रे मुंधियार हमर संस्कृति के निसदिन होही तभे बढ़वार नवा पीढ़ी जब अगुवा बनके आही खेवनहार सुशील भोले संजय नगर, रायपुर (छ.ग.) मो. 9826992811, 79747-25684

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"आखर अंजोर" विमोचित...
छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप पर सुशील भोले द्वारा लिखे गये आलेखों का संकलन "आखर अंजोर" का 12 जून को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के हाथों विमोचन हुआ। राजधानी रायपुर के सिविल लाईन स्थित मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित विमोच...

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चंदा उसका नाम सखी रे ...
खामोशी में नयन-शब्द से जो मन की बातें करती है चंदा उसका नाम सखी रे, हृदय-कमल में रहती है.. चंचल-चपल मृगनयनी सी, प्रेमावन की है बाला अपने अधरों से ही पिलाती, मादक प्रेम का जो हाला मेरे गीतों में राग सुहानी, सरगम बन वह झरती है... दूर देश की है वह पंछी, मन-बगि...

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लइका मनला नान्हे पन ले ...
लइका मनला नान्हे पन ले पूजा-पाठ संग जोरव देव-कृपा के निरमल लहरा म सुघ्घर बने बोरव खुलथे रद्दा एकरेच ले जम्मो बढ़वार के संगवारी ज्ञान-संस्कार पाए के पाछू तब महकाहीं फुलवारी सुशील भोले संजय नगर, रायपुर (छ.ग.) मो. 9826992811, 79747-25684

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तोर हमर संगी कइसे जुरही मितानी...
तोर हमर संगी अब तो कइसे जुरही मीत-मितानी हम करथन आरुग ज्ञान-गोठ, तैं गढ़थस कहानी परबुधिया नइ रहिन अब लोगन पढ़ बनगे हें ज्ञानी हंस बरोबर अलगिया देथें इन तो सिरतो दूध-पानी सुशील भोले संजय नगर, रायपुर (छ.ग.) मो. 9826992811, 79747-25684

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"आखर अंजोर " का आवरण पृष्ठ...
छत्तीसगढ़ के मैदानी भाग में प्रचलित संस्कृति के मूल स्वरूप पर मेरे द्वारा लिखे गए आलेखों का संकलन "आखर अंजोर " का आवरण पृष्ठ... विश्वास है, यह संकलन यहां के मूल धर्म और संस्कृति पर अपने नाम के अनुरूप "अक्षर का प्रकाश " फैलाएगा... "आखर अंजोर " के आवरण पर अंक...

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शिव लिंग की वास्तविकता....
आध्यात्मिक जगत में बहुत से ऐसे बहुरूपिए और षडयंत्रकारी लोग भी आते रहे हैं, जिनके कारण इसका वास्तविक स्वरूप और मूल दर्शन भ्रमित होता रहा है। कई मनगढ़ंत किस्सा-कहानी और मूर्खता की पराकाष्ठा को लांघ जाने वाली परंपरा भी इन सबके चलते हमारे बीच स्थान बनाने में सफ...

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आखर अंजोर...कव्हर...


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पांव फिसल तो जाही रे...
सम्हल-सम्हल के रेंगबे बइहा पांव फिसल तो जाही रे फेर झन कहिबे ठोकर खाके बताये नहीं कुछु-कांही रे.... ये दुनिया तो निच्चट बिच्छल जब देख पांव फिसलथे आगू बढ़त देख के कतकों, गोड़ ल धर के तीरथें पग-पग डबरा-खंचका इहां कब कोन मेर धंस जाही रे... अपन-बिरान के दिखय नह...
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