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Umesh Pant
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"Like a gazelle from the hand of hunter, like a bird from the snare of the fowler, free yourself"
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The Mask Makers of Majuli. A short film on world's biggest river island.
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हमारी ज़िंदगी में हमारे अपनों के होने के मायने क्या हैं ? बिना जताए, बिना एहसास कराये, बिना बोले, बिना साथ रहे भी क्या ये मायने ऐसे ही रह जाएंगे. क्या किसी का न होना वो खालीपन भर है जो किसी के होने से भर जाता है ? या उस न होने से ज़िंदगी के नक़्शे पे कुछ और भी बदलता है ? ‘वेटिंग’ इस दार्शनिक से सवाल का जवाब खोजने के लिए एक ऐसी जगह मोहय्या कराती है जहां आपके सिवा और कोई नहीं होता. ठीक वैसा वक्त जब आप उन दुखों को भोग रहे होते हैं जिन्हें भोगने के लिए आपके सिवा आपके साथ और कोई नहीं होता. कई रिश्तों के होने से जो सुख मिलते हैं उन रिश्तों के ख़त्म हो जाने से मिलने वाले दुःख आपको अकेले भोगने होते हैं. उनका कोई और सहभागी नहीं होता.
Film : #Waiting 
Film waiting
Film waiting
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Trekking Solang valley. 
लेकिन वो ढाई घंटे जब हम उस बे-रास्ता पहाड़ पर जूझ रहे थे उन अनुभवों में शुमार हो गए थे जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता. हमारा इंसानी शरीर मानसिक सीमाओं में जीता है. वो सीमाएं जो हमें ये बताती हैं कि हम क्या कर सकते हैं क्या नहीं. अगर वो पहाड़ जिसपे हम चढ़ रहे थे उसकी दुरुहता को हम पहले ही जान पाते तो शायद हम उस पर कभी चढ़ते ही नहीं, ये सोचकर कि हम चढ़ ही नहीं सकते. पर अभी इस वक्त हम वो तमाम सीमाएं तोड़ चुके थे.
Solang trek, Manali
Solang trek, Manali
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बंद कमरों ने सारे मौसम छीन लिए
ऐसे ‘शिफ्टों’ में घर का दफ्तर होना
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हर आत्महत्या कई सवाल छोड़ जाती है...
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल अपने मन की बात में सोलर लालटेन की मदद से गाँव को रौशन करने वाली कानपुर के दरियांव की ‘नूरजहां’ का ज़िक्र किया और वो चर्चा में आ गई और ये खबर हर मीडिया हाउस की सुर्ख़ियों में. लेकिन ये बात तब की है जब मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं थे, और गाँव कनेक्शन देश का सबसे बड़ा ग्रामीण अखबार नहीं था. तब कानपुर की ही ऐसी और भी कई महिलाओं पर मैंने एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी थी. नूरजहां के बहाने  अरुणा देवी, शिखा यादव, शकीना जैसी कई महिलाओं के चेहरे जैसे अचानक ज़हन में ताज़ा हो गए हों. उन महिलाओं के अभावों और हौसलों की कहानियां सचमुच किसी फिल्म से कम नहीं हैं. देश के प्रधानमंत्री के मन की बात के बहाने ये रिपोर्ट एक बार फिर  पेश है ताकि ‘नूरजहां’ और उन जैसी महिलाओं को सुर्ख़ियों में शामिल करने के बाद बस यूं ही उनके हाल पर ना छोड़ दिया जाए. ताकि हमें महसूस होते रहे कि देश के उन ग्रामीण अंधेरों को ऐसी कई महिलाएं रोशन कर रही हैं. सुर्ख़ियों से परे , गुमनाम रहकर ही सही.
#Mankibaat #noorjahaan #modi  
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दुमंजिला लोहापुल जिसके ऊपर महंगी-महंगी गाड़ियां रात-दिन आवाजाही करती हैं उसके नीचे हर रात करीब चार सौ बेघर लोग सिनेमा के सहारे सोने की कोशिश करते हैं. कभी-कभी यूं भी होता है कि अचानक यमुना का जलस्तर बढ़ जाता है तो इन लोगों की नींद खतरे में पड़ जाती है. इस ‘स्लीप सिनेमा’ को संचालित करने वाला रंजीत एक तरह से उन सैकड़ों लोगों को नींद का भरोसा देता है जिन पर बड़े-बड़े दावे करने वाले सियासी सौदागरों की नज़र तक नहीं पहुंच पाती. नींद जैसी मूलभूत ज़रुरत को पूरा करने में जहां राजधानी की सत्ता मात खा जाती है वहां रंजीत की सिनेमाई लोरियां कई बेघरों को नींद और छत के अभाव में मरने से बचा लेती हैं.
Cities of sleep
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फिल्म की अच्छी बात वो सन्नाटे हैं जो पहाड़ी गांव की पृष्ठभूमि होनेे की वजह से अपने आप कहानी का हिस्सा बन जाते हैं। जंगल के बीच से गुजरती संकरी पगडंडी, पगडंडी पर भागते बच्चों के आगे बदहवास भागती बकरियां, अम्मा, बाबू, दीपाल दा जैसे रिश्तों के सम्बोधन, ‘क्या आदमी है यार तू’ जैसे ताने और ‘कौन सी बड़ी बात हो रही है एक्की पीरियड तो छूटेगा’ जैसी मासूम बेपरवाहियां, ‘हगबगा क्या रहा है’ जैसे मुहावरे। फिल्म ठेठ कुमाउनी शब्दावलियों और लहज़ों को एकदम एफर्टलेस होकर कहानी में पिरोती है।
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