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devendra gautam
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कितनी विचित्र चीज है ये आदमी ... किसी के सकझ नहीं अत ... फिर भी सब हैं आदमी ...

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ये कैसे दौर से यारब, गुजर रहे हैं हम
न आज चेहरों पे रौनक न आइने रौशन.

किसी वरक़ पे हमें कुछ नजऱ न आएगा
किताबे-वक्त में जब होंगे हाशिये रौशन

हवेलियों पे तो सबकी निगाह रहती है
किसी गरीब की कुटिया कोई करे रौशन.

हरेक सम्त अंधेरों की सल्तनत है मगर
दिलों में फिर भी उमीदों के हैं दिये रौशन.

हमारे पांव तो कबके उखड़ चुके हैं मगर
ज़मीं की तह में अभी तक हैं जलजले रौशन

सवाल सबके भरोसे का है मेरे भाई
कलम संभाल अंधेरे को जो लिखे रौशन.

Read more: http://www.gazalganga.in/2014/12/blog-post_30.html#ixzz3O78mgl9E

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स्वानुभूति बनाम सहानुभूति का साहित्य
हिन्दी साहित्य में अभी दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श और स्त्री विमर्श का अभियान जोरों पर है। वैचारिक बहसों के अलावा तमाम विधाओं का रचनात्मक साहित्य इन्हीं के ईर्द, गिर्द घूम रहा है। लेकिन साहित्य के कुछ पुरोधाओं ने साहित्य का नए सिरे से वर्गीकरण करने की मुहिम...

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