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madhu singh
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I am housewife,my husband is Professor in Department of Geography,Kumaun University,S.S.J.Campus Almora, Having one son,working as system eng.Reading,U.K, and one daughter lives in LA, California, both married ,
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मधु सिंह : रज सुरभित आलोक उड़ाता
  तुहिन सेज पर ठिठुर-ठिठुर कर   निशा  काल  के  प्रथम प्रहर में  बैठा   एक     पथिक    अंजाना  था तीब्र प्रकम्पित हिमजल में  तभी प्रात की स्वर्णिम किरणें  लगी मचलने व्योंम प्राची पर हाथ पसारे  निस्सीम तेज ले  लगी उतरने  हिम छाती  पर  रज  सुरभित  आलोक  उड़ाता ...

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मधु सिंह : रज सुरभित आलोक उड़ाता
  तुहिन सेज पर ठिठुर-ठिठुर कर   निशा  काल  के  प्रथम प्रहर में  बैठा   एक     पथिक    अंजाना  था तीब्र प्रकम्पित हिमजल में  तभी प्रात की स्वर्णिम किरणें  लगी मचलने व्योंम प्राची पर हाथ पसारे  निस्सीम तेज ले  लगी उतरने  हिम छाती  पर  रज  सुरभित  आलोक  उड़ाता ...

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मधु सिंह : ये इश्क भी खुदा नें क्या चीज़ बनाई है
अब  दर्द ज़िन्दगी का  सहा भी नहीं जाता हया  के  पर्दे से कुछ कहा  भी नहीं जाता आलम -ए - तन्हाई  औ ये  बेबसी भी कैसी के  उनके बगैर तन्हां रहा भी नहीं जाता ख़्वाबों के  समंदर  में हमने डूब के देखा है ख्वाबों  में न आयें तो रहा भी नहीं जाता ये    इश्क भी खुदा ने...

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मधु सिंह : भंग निशा की नीरवता कर
गोधूली  के  धूलि गगन से        बोलो !  तुम्हें  बुलाऊँ  कैसे भंग निशा की नीरवता कर बोलो !   दीप जलाऊँ   कैसे नद-  नदिओं के झुरमुट से आहट  एक  कोई  आती है हौले-   हौले  पग चापों  को बीणा  का तार  बनाऊँ  कैसे अश्रु  बह  रहे निर्झरणी बन नील  गगन  स्तब्ध मौन है...

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मधु सिंह : भंग निशा की नीरवता कर
गोधूली  के  धूलि गगन से        बोलो !  तुम्हें  बुलाऊँ  कैसे भंग निशा की नीरवता कर बोलो !   दीप जलाऊँ   कैसे नद-  नदिओं के झुरमुट से आहट  एक  कोई  आती है हौले-   हौले  पग चापों  को बीणा  का तार  बनाऊँ  कैसे अश्रु  बह  रहे निर्झरणी बन नील  गगन  स्तब्ध मौन है...

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