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Ankit Joshi
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ग़ज़ल - इस लम्हे का हुस्न यही है
आँखों में फ़रयाद नहीं है यानी दिल बर्बाद नहीं है मुझ को छोड़ गई है गुमसुम ये तो तेरी याद नहीं है तुम बिन मुरझाये से हम हैं जैसे पानी खाद नहीं है इस लम्हे का हुस्न यही है के ये इसके बाद नहीं है उसने आह भरी तो जाना दर्द मेरा बेदाद नहीं है नींद खुली तो ढह जायेंग...

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ग़ज़ल - रंग सब घुलने हैं आख़िर इक कलर में
ख़ौफ़ शामों का सताता है सहर में कुछ अँधेरे घर बना बैठे हैं घर में उम्र पर चढ़ती सफ़ेदी कह रही है रंग सब घुलने हैं आख़िर इक कलर में धूप कुछ ज़्यादा छिड़क बैठा है सूरज छाँव सब कुम्हला गई हैं दोपहर में ज़िन्दगी यादों की दुल्हन बन गई है बूँद अमृत की मिला दी है ज़हर में ...

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ग़ज़ल - उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे
उसकी आँखों ने फिर ठगा है मुझे हिज्र इस बार भी मिला है मुझे नींद बैठी है कब से पलकों पर और इक ख़्वाब देखता है मुझे जिस्म नीला पड़ा है शब से मेरा साँप यादों का डस गया है मुझे ज़िन्दगी की तवील राहों पर उम्र ने रास्ता किया है मुझे एक उम्मीद के बसेरे में शाम होते ह...

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ग़ज़ल - लौटती हर सदा बताती है
लौटती हर सदा बताती है आसमां तक पुकार जाती है एक तस्वीर पर्स में मेरे देखता हूँ तो मुस्कुराती है क्यूँ ये दिल मुँह फुलाये बैठा है? एक धड़कन इसे बुलाती है प्यार की एक दुखती रग दिल को हाँ, बहुत ज़ोर से दुखाती है मुझ पे ठहरी निगाह इक तेरी कोई मंतर सा बुदबुदाती है...

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ग़ज़ल - हर इक साँचे में ढल जाये ज़रा ऐसे पिघल प्यारे
हर इक साँचे में ढल जाये ज़रा ऐसे पिघल प्यारे तू अपनी सोच के पिंजरे से बाहर तो निकल प्यारे  झुकायेगा नहीं अब पेड़ अपनी शाख पहले सा  तेरी चाहत अगर ज़िद्दी है तो तू ही उछल प्यारे  पस-ए-हालात में ख़ामोशियाँ भी चीख उट्ठी हैं  रगों में गर लहू बहता है तेरे तो उबल प्या...

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ग़ज़ल - ख़ुश्क निगाहें, बंजर दिल, रेतीले ख़्वाब
वक़्त तेरे जब आने का हो जाता है दीवाना… और दीवाना हो जाता है आँखें ही फिर समझौता करवाती हैं नींद से जब मेरा झगड़ा हो जाता है ख़ुश्क निगाहें, बंजर दिल, रेतीले ख़्वाब देख मुहब्बत में क्या-क्या हो जाता है एक ख़याल ख़यालों में पलते-पलते रफ़्ता-रफ़्ता अफ़साना हो जाता है ...

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ग़ज़ल - युग बदलती सोच की सौगात के
जब हम बार-बार ये सोचते हैं कि किसी ख़ास शख़्स या शै के बारे में बिलकुल भी न सोचें, तो हम ख़ुद को उन्हीं गलियों की तरफ मोड़ते हैं जहाँ हम जाना नहीं चाहते, मगर चाहते हैं कि जाये। अपने को बेहतर तरीके से जानने के लिए, ये 'न चाहना' का 'चाहना' ज़रूरी भटकाव है, शायद ! ...

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ग़ज़ल - ज़रा आवाज़ दे उसको बुला तो
न जाने कितनी आवाज़ें हमारे साथ हमारे कदमों से लिपट कर ताउम्र बेसाख़्ता चलती रहती हैं। उनमें से कई तो गुज़रते वक़्त के साथ दम तोड़ देती हैं तो कुछ ताउम्र पाँव में घुँघरू बन कर छन-छन बजती रहती हैं। इन्हीं आवाज़ों में कहीं, हमसे बहुत पीछे छूटा हमारा मुहल्ला है, तो क...

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हुई हैं राख कितनीं रात फिर भी
ये इक सिगरेट नहीं बुझती कभी से

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ग़ज़ल - ये इक सिगरेट नहीं बुझती कभी से
न जाने कितने ही लम्हें ऐसे होते हैं जो राख हो कर भी अपनी आँच सम्हाले रखते हैं ताकि कारवान-ए-ज़िन्दगी को सर्द वक़्त में गर्माहट दे सकें, और ज़िन्दगी खुशरंग बनी रहे।  कहूँ क्या शोख़ कमसिन सी नदी से तेरे अंदाज़ मिलते हैं किसी से हमारे होंठ कुछ हैरान से हैं तुम्हारे...
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