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Kamalesh Tewari
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प्रतीक्षा
बढ़ता जाता द्वंद्व खिंचती जाती लकीरें जन्म लेता नर-पशु। करता अट्टहास खोलता खुनी जबड़े आर्तनाद करती मानवता। सभी बन गए पार्थ बैठें हैं संशयग्रस्त दीखते भयातुर। प्रतीक्षा है कृष्ण की देंगे दिव्य दृष्टि जगाएंगे ज्ञान। किन्तु तब तक नर-पशु लील जाएगा समूची मानवता। क...
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बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?
चाय की चुस्की  लेते  ही नरेन को राहत महसूस हुई। हालाँकि चाय में दूध कम था और स्वाद भी कुछ खास नहीं था पर तीन घंटे के लगातार सफर के बाद इस चाय ने खस्ताहाल सड़क पर लगभग उछलती हुई प्राइवेट बस की कमरतोड़ यात्रा के घावों पर मरहम का काम किया। चाय पीते पीते नरेन न...
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बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?
चाय की चुस्की  लेते  ही नरेन को राहत महसूस हुई। हालाँकि चाय में दूध कम था और स्वाद भी कुछ खास नहीं था पर तीन घंटे के लगातार सफर के बाद इस चाय ने खस्ताहाल सड़क पर लगभग उछलती हुई प्राइवेट बस की कमरतोड़ यात्रा के घावों पर मरहम का काम किया। चाय पीते पीते नरेन ने ...
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बत्तू बाबा! इतिहास का क्या करोगे...?
चाय की चुस्की  लेते  ही नरेन को राहत महसूस हुई। हालाँकि चाय में दूध कम था और स्वाद भी कुछ खास नहीं था पर तीन घंटे के लगातार सफर के बाद इस चाय ने खस्ताहाल सड़क पर लगभग उछलती हुई प्राइवेट बस की कमरतोड़ यात्रा के घावों पर मरहम का काम किया। चाय पीते पीते नरेन ने ...
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पावन स्पर्श
पावन
स्पर्श नीरजा
फिर उठी और उसने बाहर वाले कमरे में झाँका। उसे लगा कि अब तो पाँच बज ही गए होंगे।
पिछली बार जब उसने देखा था तो पच्चीस मिनट कम थे। उसके बाद तो वह कितनी ही देर बीच
वाले कमरे में बैठी रही थी। बाहर से आती हुई ‘ घर्रर्रर्रर्रर्र... ’ की आवाज़ को स...
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अबे, तू खवि है क्या!
जैसे ही हम अपनी दैनिक सांध्य-बैठक में पहुँचे तो देखा, तीन-चार यार लोग गुरू के इर्द-गिर्द बैठ, अखबार पर धरी हुई नमकीन मुंगफली के दानों को मसल कर खा रहे हैं और जिससे अखबार पर काफी भूरे-भूरे छिलके बिखर गए हैं। यह बैठक काशी की चाय की थड़ी के पिछले भाग में, जहाँ ...
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बहादुर बंटी
जंगल के उस पार एक नदी बहती थी। नदी में रहती थी बहुत सारी मछलियाँ। नीले, लाल, सुनहरे पंखों वाली कई मछलियाँ। नदी के तल में हरी चट्टानों के बीच मछलियों का महल था। दिन भर वे सब नदी में खेलती फिरती और रात को अपने महल में आ जातीं।  सब मछलियाँ बहुत खुश थीं, पर सोन...
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