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Adhyatma Sagar (अध्यात्म सागर)
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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
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इतनी बात सुनने के बाद अब आपका प्रश्न होगा कि “ ईश्वर क्या है ? कैसा है ? और उससे संबंध कैसे स्थापित किया जा सकता है ? ” बस इसी प्रश्न का उत्तर मैं देना चाहता हूँ । मैं केवल एक उदहारण से आपको पूरी बात स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा । तो चलिए आत्मा – परमात्मा के संबंध को अपने दैनिक जीवन के किसी संबंध से समझने की कोशिश करते है ।

जब हम दुनिया में आये तो हमारा सबसे पहला संबंध कोनसा बना । सभी जानते है – माँ का संबंध ! पिता तो जन्म के बाद होता है लेकिन उससे ९ महीने पहले ही जब हम पेट में आये तभी से हमारा और माँ का संबंध हो गया था । अब यदि ईश्वर की बात की जाये तो इस माँ से भी पहले हमारा संबंध उस ईश्वर से है । उसे आप माँ कहलो या पिता कहलो कोई फर्क नहीं पड़ता । क्योंकि आत्मिक स्तर पर स्त्री – पुरुष जैसा कोई अस्तित्व नहीं होता । इस जगत के संबंध तो बनते बिगड़ते रहते है लेकिन ईश्वर से हमारा शाश्वत सम्बन्ध है ।

जिस तरह माँ हमेशा अपने बच्चों से प्रेम करती है । उसी तरह ईश्वर भी हमेशा हमसे प्रेम करता है । जिस तरह माँ को अपने बच्चों की चिंता लगी रहती है, उसी तरह ईश्वर को उससे भी अधिक हमारी चिंता रहती है । अब यहाँ कुछ लोग पूछते है कि फिर भी इन्सान दुखी क्यों है ? अगर ईश्वर को हमारी इतनी ही चिंता है तो फिर हमारी चिंताओं को दूर क्यों नहीं करता ।
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एक दिन मैं गार्डन घुमने गया । वैसे मुझे गार्डन घुमने का कोई शौक नहीं है लेकिन फिर भी जब कभी कोई काम होता है तो घूमते - घूमते पहुँच जाता हूँ । ऐसे ही एक दिन ऐसे घूमते - घूमते गार्डन पहुँच गया । मैंने देखा कि वहाँ मेरा एक दोस्त मुँह लटकाए पहले से बैठा हुआ था । मैं उसके पास गया और बोला – “ और भाई ! कैसे हो ? ”

वो सिर पर हाथ रखते हुए बोला – “ यार ! पूछ मत !”

मैंने कहा – “ क्यों ! क्या हुआ । ऐसा कोनसा पहाड़ टूट पड़ा जो तू इतना परेशान है ।”

मना करते हुए बोला – “ रहने दे भाई तू नहीं समझेगा ! ”

मैं बोला – “ तू बतायेगा तो समझूंगा न ! ”

तो वह बोला – “ क्या बताऊ यार ! जो करता हूँ सब उल्टा हो जाता है ।”

मैं बोला – “ टेंशन मत ले भाई ! जो होता है सब अच्छे के लिए होता है ।”

तो वो गुस्सा हो गया और बोला – “ मैंने कहा था न, तू नहीं समझेगा ! मैं एग्जाम में फ़ैल गया, मेरी गर्लफ्रेंड किसी दुसरे के साथ भाग गई और तू कहता है – जो होता है सब अच्छे के लिए होता है ।”

अब मैं थोड़ा सीरियस हो गया । मैंने कहा – “ सॉरी यार ! मुझे नहीं पता था कि तेरे पर इतनी बड़ी विपत्ति आ पड़ी है । लेकिन तू कुछ भी कह – “ जो होता है अच्छे के लिए ही होता है ।”

अब वो गुस्से से मुझे घूरने लगा । मैंने शांति से कहा – “ देख मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ –
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उपेक्षा की अपेक्षा कोई भी इन्सान नहीं करता । लेकिन हर कोई हमें अहमियत दे इतनी हमारी कीमत भी होनी चाहिए । आज फिर सहदेव के साथ कुछ ऐसा ही हुआ । गुरुजन और दोस्त यहाँ तक कि घर वाले भी अक्सर सहदेव को उपेक्षित कर देते थे । सहदेव आज फिर अशांत, उदास और रुखा सा मुंह बनाये समुन्द्र के किनारे जा बैठा । उसे आखिर समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ ही ऐसा क्यों हो रहा है । उसने ऐसा क्या किया कि लोग उसकी उपेक्षा करने लगे ।

इसी उधेड़बुन में सहदेव अपने एक मित्र आत्मदेव के घर गया । उसने अपनी सारी समस्या आत्मदेव को कही । आत्मदेव को समझ आ गया कि सहदेव की क्या समस्या है । उसने सहदेव से कहा – “ देख मित्र ! यमुना नदी के किनारे आनंद गिरी नाम के एक महात्मा रहते है । उनके पास ऐसा फूल है जिसके पास में रखने मात्र से लोग मोहित हो जाते है । तू जाकर उन महात्मा के पास से वैसा एक फूल ले आ । फिर कोई तुझे उपेक्षित नहीं करेगा ।”

अपने मित्र की बात सुनकर सहदेव तुरंत यमुना नदी की ओर चल दिया । आश्रम पहुंचकर उसने महात्मा को अपनी पूरी व्यथा सुनाई । उसकी बात सुनकर महात्मा ने मुस्कुराते हुए बगीचे की ओर इशारा किया और बोले – “ जाओ सहदेव ! वह फूल तोड़ लो, सब तुमसे प्रसन्न रहेंगे ”

फूल तोड़ते हुए सहदेव ने महात्मा से पूछा – “ गुरूजी ! इसका नाम क्या है ? ”

महात्मा बोले – “ ब्रह्मकमल ! "

ख़ुशी – ख़ुशी सहदेव ने वह फूल तोड़ लिया और महात्मा को धन्यवाद कहकर चलने लगा । इतने में महात्मा बोले – “ यह फूल केवल तभी तक लोगों को मोहित करेगा जब तक कि यह खिला हुआ है और महक रहा है । जैसे ही यह सूखा, बेकार हो जायेगा ।”

सहदेव उत्साह में था अतः जल्दबाजी में लेकर चल दिया . महात्मा भी मुस्कुरा दिए “ जैसी तुम्हारी मर्जी ।”
शाम तक फूल लेकर वह घर पहुंचा । रास्ते में जो भी मिलता पूछ ही लेता कि भाई ! इतनी मधुर सुगंध कौनसे फुल की है । वह चलते – चलते ही बोल देता “ ब्रहमकमल !” उसे डर था कि कोई उससे मांग न ले ।

रातभर तो उस फूल की सुगंध से सभी लोग उसके आस – पास मंडराते रहे लेकिन जब सुबह उठा तो फूल सुख चूका था ।

सुबह उठते ही सहदेव भागा – भागा आश्रम पहुंचा । महात्मा जी बगीचे में ही खड़े थे । सहदेव उनसे बोला – “ गुरूजी ! वह फूल तो रात में ही मुरझा गया ? “

महात्मा बोले - “ बेटा ! फूल पेड़ पर ही अच्छे लगते है । उससे टूटकर तो उन्हें नष्ट हो ही जाना है ।”
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