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sudhir mishra
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गजब यह है कि क्षेत्रीय मुद्दों और कैंडिडेट की कोई बात ही नहीं। समीकरण कुछ और ही हैं। मिसाल के तौर पर ठाकुर-बामन इस बार एकसाथ वोट कर रहा है। फलानी पार्टी का वोटर साइलेंट है, चुपचाप जा रहा है। यादव-मुसलमान एक साथ हैं। ओबीसी इस बार फलां पार्टी से कट रहा है। मतलब, आम वोटर की कोई बात ही नहीं।
हर पार्टी के नेता का दावा है कि दूसरी पार्टियों ने कोई काम ही नहीं किया। वैसे जनता सबको जानती है कि किसने कितना काम किया है। भ्रष्टाचार से भले ही यूपी की जनता त्राहिमाम कर रही हो पर किसी भी पार्टी के अजेंडे में यह नहीं है। असल खेल है संप्रदायों का ध्रुवीकरण और जातियों की गोलबंदी। 

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‘मतलब यह कि अमेरिका में ओबामा की पार्टी यानी डेमोक्रैट्स का चुनाव चिह्न गधा है। दरअसल, गधे का असली सम्मान तो अमेरिका और खासतौर पर डेमोक्रैट्स ही कर सकते हैं, भारतीय हिपोक्रैट्स नहीं।’ अब अपन को भी गुस्सा आ गया और पूछा, ‘हिपोक्रैट किसे कह रहा है?’ वह भी तब तक अपनी असली औकात में आ चुका था। आगे बोला, ‘उन्हें जो गधे को निरा गधा या महान गधा बता रहे हैं। यहां टांगों में रस्सी बंधी है। किसी को ख़याल नहीं। सिर्फ भाषण हो रहे हैं मेरे बारे में। अरे कुछ नहीं कर सकते तो गाय का दर्जा ही दे दो।’ 

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दातर आबादी अपनी जिंदगी में किसी न किसी तरह की असुरक्षा की भावना में है। लोग खुद को सुरक्षित रखने के लिए छोटी-छोटी बातों पर झगड़े करके खुद को ताकत देने की कोशिश करते हैं। सब एक-दूसरे को शक की नजर से देखते हैं। एक-दूसरे के खिलाफ खराब भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उनके पास काम नहीं है तो बेकार की बातों में दिल लगाते हैं। यही वजह है कि टेलिविजन पर क्राइम, rahul gandhiकॉमेडी और ड्रामे का कॉकटेल हमेशा सुपरहिट होता है। देश का परेशान मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग अपनी तमाम असुरक्षाओं के बीच कुछ देर इस तरह के मनोरंजन में खुद के दुख-दर्द को भुला देता है। चूंकि, यह हिट फॉर्म्युला है इसलिए नेता भी अपने भाषणों में ऐसा ही मसाला डालते हैं। भड़का देने वाले डॉयलॉग, हंसा देने वाले व्यंग्य और धमका देने वाले हिंसक भाव नेताओं के भाषण में मुस्तकिल जगह बनाए रहते हैं।

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लोग कहेंगे घी वाली पार्टी के विधायक जी हैं
  सुधीर मिश्र  in  खुले मन से         शहरयार का एक मशहूर शेर है- तेरे वादे को कभी झूठ नहीं समझूंगा आज की रात भी दरवाजा खुला रखूंगा हमारे वोटरों के दरवाजे भी हमेशा खुले ही रहते हैं। वादों पर हमें बड़ा भरोसा रहा है। नेता तोड़ते रहते हैं और हम उम्मीद जोड़ते रह...

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नेताओं ने लोगों को सिर्फ जेब से गरीब नहीं बनाया। उन्हें दिमागी तौर पर भी भिखारी बना दिया है। आज हालत यह है कि मुफ्त के मोबाइल सिम को लेने के लिए लोग आधी रात से लाइन में लग जाते हैं। सियासत के मैनजर जानते हैं कि अब मुफ्त के लॉलीपॉप का जमाना है। प्रबंधक चुनावों के धंधे से पहले रोजमर्रा की चीजें बेचने वाली कंपनियों में रहे होते हैं। वह जानते हैं कि इलेक्शन के कारोबार में कस्टमर यानी वोटर को क्या चाहिए ?
अब देखिए न। जनता का तेल निकालने के बाद अब मुफ्त घी देने के वादे हैं। 

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इधर सियासी दलों के लोग परेशान हैं। सब अपने को छोड़ पड़ोसी के चूल्हे में आग ढूंढ रहे हैं। बेचारे करें भी क्या। भीषण ठंड केamit इस मौसम में सियासी दलों की अपनी रजाई तो दूसरी पार्टी वाले खींचे ले जा रहे हैं।
हर तरफ गदर है। विराट कोहली के दौर में युवराज और धोनी सेंचुरी मार रहे हैं। नब्बे पार के पहाड़ वाले तिवारी जी भी अब तक हौसला नहीं हारे हैं। तिवारी जी अब भी पांच सौ और हजार के नोट चलाने की कोशिश में हैं। जिंदगी भर कांग्रेस में रहने के बाद अब वो बीजेपी के साथ हैं। पुराने और समझदार नेता हैं। कहते हैं, कांग्रेस और बीजेपी में अब कोई बुनियादी फर्क नहीं रहा। 

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शबाब का मतलब होता है युवावस्था या जवानी। अगर आप गूगल की पिक्चर गैलरी में जाकर इस शब्द को देखना चाहेंगे तो आपको ग्लैमरस लड़कियां दिखाई पड़ेंगी। अब गूगल बाबा क्या कर लेंगे। जैसे दारू को बनाने वाला आदमी। ‘उसकी बेटी ने उठा रखी है सर पर दुनिया…’ जैसे शेर गढ़ने वाला आदमी। ‘झूम बराबर झूम शराबी…’ कव्वाली गाने वाला आदमी। वैसे ही गूगल में पिक्चर और जानकारियां डालने वाले भी ज्यादातर लोग ऐसे ही रहे होंगे. जो मर्दवाद के झंडाबरदार हैं। इसका खामियाजा सबको उठाना पड़ रहा है। 

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आप भूल जाते हो कि भ्रष्टाचार खत्म करने के वादे पर जीतने वाले कैसे करप्ट लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं। आपको यह तक याद नहीं रहता कि जिन नेताओं को दूसरी पार्टी के नेताओं ने जेल भेजने का वादा किया था, अब वो कैसे साथ-साथ गले में हाथ डाले घूम रहे हैं।mayawati आपको तो लगता है कि देश और प्रदेश में भरपूर विकास हुआ है। आकलन करने वाले जानते हैं कि आपकी आंखों में यह देखकर कतई आंसू नहीं आते कि लोग अपने परिवारजनों की लाशें कंधों पर ढोते हैं, गर्भवती पत्नी का ठेले पर ले जाकर प्रसव कराते हैं जबकि ऐंबुलेंस के नाम पर अरबों रुपये का बजट है। विदेशी कंपनियों के रणनीतिकार आप के इस चरित्र को बहुत अच्छे से पहचान चुके हैं कि आप ग्लैमर पसंद करते हैं।rahul-gandhi आपको ऐसे नेता पसंद हैं, जो बेहतरीन भाषण देते हों, जिनके पीछे गाड़ियों का लंबा काफिला हो और ढेर सारे गनर हों।

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सोचिए जरा, जिस राज्य में सरकारी योजनाओं के बजट का बड़ा हिस्सा आता हो। जो अगर देश होता, तो जनसंख्या के नजरिए से दुनिया में छठे नंबर पर आता। जहां का भूभाग राजस्थान और मध्य प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा हो, वहां नए-पुराने नोटों की पकड़ के लिए चल रही छापेमारी में सिर्फ छुट्टा टाइप रकम ही पकड़ में आ रही है। 

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