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Chankya Sharma
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जिन्दगी झंड्वा..फिर भी घमंडवा
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 राजनीति से कचरा साफ करने वाले दागी सांसदों/विधायकों से जुड़े अध्यादेश की बात हो या "राइट टू रिजेक्ट" की, राजनेताओं के प्रति जनता का गुस्सा उबाल पर है। जनता विकास के मुद्दों पर नेताओं से सीधे सवाल कर रही है और जो जवाबदेही से मुकर रहा है जनता उसे सबक सिखाने को भी तैयार है। लेकिन कई जगह जनता में आक्रोश इस कदर बढ़ गया है कि नेताओं के साथ सरेआम हाथापाई और बदसलूकी की नौबत आ पहुंची है। ऎसा ही गुरूवार को राजस्थान के शिक्षा मंत्री बृजकिशोर शर्मा के साथ हुआ। मंत्री जनता के आक्रोश का शिकार हो गए और उन्हीं के समर्थकों ने उनकी खुलेआम पिटाई कर डाली। 
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Narendra Modi Jee Live From Kerla .

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Narendra Modi Jee Live from Kerla ...........

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Watch live Sri Narendra modi Jee ...

हमे गर्व है इंफोसिस के पूर्व चेयरमैन नारायण मूर्ति पर ..जिन्होंने सेकुलर सुअरों को करारा जबाब दिया ...
उन्होंने कहा की यदि बीजेपी हिन्दुओ के हित की बात करने से साम्प्रदायिक हो जाती है तो फिर मुसलमानों के हित की बात करने वाली कांग्रेस या दूसरी पार्टिय धर्मनिरपेक्ष कैसे हुई ?

उन्होंने मीडिया को भी लताड़ा और कहा की भारत की मीडिया नरेंद्र मोदी के खिलाफ किसी साजिश के तहत अभियान चलती है .. क्या भारत में २००२ में पहले और २००२ के बाद दंगे नही भडके ? फिर मीडिया फिर २००२ को ही बार बार क्यों उछालती रहती है ?

उन्होंने कहा की आसाम दंगो पर कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्री के खिलाफ क्या करवाई की ? कुछ नही ..फिर क्या आसाम के मुख्यमंत्री ने माफ़ी मांगी ? क्या आसाम के मुख्यमंत्री ने दंगो की जिम्मेदारी ली ? नही

फिर वही कांग्रेस और वही मीडिया नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगो के लिए जिम्मेदार क्यों ठहरती है ? और उनसे बार बार माफ़ी की मांग क्यों की जाती है ?

साम्प्रदायिकता या सेकुलरिज्म की आड में सिर्फ हिन्दुओ और हिंदूवादीयो को ही क्यों निशाना बनाया जाता है ?

लेकिन भारत की मीडिया का नीचता और दोगलेपन की हद देखिये ...किसी भी मीडिया ने उनके इस लेख के बारे में नही बताया लेकिन अगर यही नारायण मूर्ति मोदी या हिंदुत्व के खिलाफ लिखे होते तो अब तक नीच मीडिया उस कुत्ते की तरह उछ्लती जिसके पिछवाड़े पेट्रोल लगाया गया हो..

Gujrat violence...........Naya nahi hai . Par 2002 ke baad kyo kuch nahi huaa..........??

Previous History of Gujrat violence .

Gujrat witnessed several more riots since 1969, in 1981, in 1985, in 1990, in 1992-93 and now in 2002 and several other riots in between. According to the Times of India report under Madhav Singh Solanki who was chief minister on three occasions, 276 people died in 117 incidents of mob violence. Under Amar Singh Chaudhuri, 582 persons died in 413 incidents of violence. And under Chimanbhai Patel, who was chief minister twice, 563 persons died in 370 incidents of violence. In 1990 when L.K. Advani-led rath yatra began from Somnath to Ayodhya, 220 people died; in 1992 riots after Babri demolition 325 people were dead and in 1993 another 116 people lost their live

 

जी हाँ बिल्कुल सही सुना आपने। अगर ऐसा वाकया आपको देखने को मिले जहाँ कोई अपनी माँ को माँ कहने में शर्म महसुस करता हो और पुछने पर कहता हो ये बताने के लिए कि ये माँ है,माँ कहना जरुरी नहीं है। जरा सोचिए कितनी शर्मसार करने वाली घटना है। मेरा ये कहना उनके लिए है जो की अपने आपको भारतीय कहते है और "वन्दे मातरम्" जैसे पवित्र शब्द जो की हमारा राष्ट्रिय गीत है, को गाने से इनकार करते है और कहते है कि ये इस्लाम विरोधी है। जिसकी खाते है, जहाँ रहते है, उसको समर्पित दो शब्द कहने की बारी आती है तो उसे धर्म विरोधी बताकर उसका गान करने से मना करना कितनी शर्म की बात है एक कहावत है "जिस थाली में खाना उसी में छेद करना" यहा फिट बैठती है। धरती माँ जिससे हमें जीवन मिलता है, जिससे पेट भरने के लिए दो वक्त की रोटी मिलती है, जिसकी लाज बचाने के लिए न पता कितनो नें अपने प्राण की आहूती दे दी उसको सम्मान देनें में जिसे शर्म आती है उसे सच कह रहा हूँ कहीं डुब मरना चाहिए। जमीयत उलेमा हिंद ने देश के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को गैर-इस्लामिक करार देते हुए इसके खिलाफ फतवा सुना दिया । जमीयत के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन पारित एक प्रस्ताव में कहा गया है कि मुसलमान को वंदे मातरम् नहीं गाना चाहिए। क्यो भाई क्यों, न पता इस गीत को लेकर इतना विवाद क्यों है। मुझे लगता है पूरी दुनियाँ में ये पहली घटना होगी जहाँ राष्ट्रगान को लेकर विवाद हो रहा है।
 
हमारे यहाँ या कहिए विश्व भर में हर देश के अन्दर बहुत से जन जाती और धर्म के लोग रहते है। उनका हर क्रिया कलाप एक दुसरे धर्म के पुरक होता है। यहीं इन सबको एक राष्ट्र और एक देश मे बाँधने का काम करता है राष्ट्र गीत या राष्ट्र गान। लेकिन बड़े दुख की बात है हमारे देश में कुछ गलत अवधारणा के लोगो नें राष्ट्र गीत को विवादित कर दिया है। मान लेता हूँ कि राष्ट्रियता जताने के लिए राष्ट्रगान करना आवश्यक नहीं है, लेकिन भला ऐसा हो सकता है क्या ? आप भारत में रहकर पाकिस्तान जिन्दाबाद कहें और फीर कहें कि मैंने भारत मुर्दाबाद नहीं कहा तो कोई विश्वास करेगा क्या ?।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय सरकारी सेवा में थे और १८७० में जब अंग्रेजी हूकमत ने 'God save the King/Queen' गाना अनिवार्य कर दिया तो इसके विरोध में वन्दे मातरम् गीत के पहले दो पद्य १८७६ में संस्कृत में लिखे। इन दोनो पद्य में केवल मातृ-भूमि की वन्दना है। उन्होंने ने १८८२ में आनन्द मठ नाम का उपन्यास बांग्ला में लिखा और इस गीत को उसमें सम्मिलित किया। उस समय इस उपन्यास की जरूरत समझते हुये इसके बाद के पद्य बंगला भाषा में जोड़े गये। इन बाद के पद्य में दुर्गा की स्तुति है। कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (१८९६) में, रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे लय और संगीत के साथ गाया। श्री अरविन्द ने इस गीत का अंग्रेजी में और आरिफ मौहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया है। आरिफ मोहम्मद खान भी एक मुसलमान थे और सच्चे मुसलमान थे। जब उन्होने इसका उर्दू अनुवाद किया तो क्या बिना पढे किया था, ऐसा तो नहीं होगा। उन्होने इसका मर्म समझा था तब अनुवाद किया, अब आज के मुसलमान कह सकते है कि शायद वे सच्चे मुसलमान नहीं होगें। 

इस देश में असंख्य अल्पसंख्यक वन्दे मातरम्‌ के प्रति श्रद्धा रखते हैं। मुफ्ती अब्दुल कुदूस रूमी ने फतवा जारी करते हुए कहा था कि राष्ट्रगान का गायन उन्हें मुस्लिमों को नरक पहुँचाएगा। बहिष्त लोगों में लोहा मण्डी और शहीद नगर मस्जिदों के मुतवल्ली भी थे। इनमें से 13 ने माफी मांग ली। आश्चर्य की बात है कि अपराधिक गतिविधियों में शामिल होना, आतंकवादी कार्रवाईयों में भाग लेना, झूठ, धोखा, हिंसा, हत्या, असहिष्णुता, शराब, जुआ, राष्ट्र द्रोह और तस्करी जैसे कृत्य से कोई नरक में नहीं जाता मगर देश भक्ति का ज़ज़बा पैदा करने वाले राष्ट्र गान को गाने मात्र से एक इंसान नरक का अधिकारी हो जाता है। ब्रिटेन के राष्ट गान में रानी को हर तरह से बचाने की प्रार्थना भगवान से की गई है अब ब्रिटेन के नागरिकों को यह सवाल उठाना चाहिए कि कि भगवान रानी को ही क्यो बचाए, किसी कैंसर के मरीज को क्यों नहीं? बांग्लादेश से पूछा जा सकता है कि उसके राष्ट्रगीत में यह आम जैसे फल का विशेषोल्लेख क्यों है? सउदी अरब का राष्ट्रगीत ‘‘सारे मुस्लिमों के उत्कर्ष की ही क्यों बात करता है और राष्ट्रगीत में राजा की चाटुकारिता की क्या जरूरत है? सीरिया के राष्ट्रगीत में सिर्फ ‘अरबवाद की चर्चा क्या इसे रेसिस्ट नह बनाती? ईरान के राष्ट्रगीत में यह इमाम का संदेश क्या कर रहा है? लीबिया का राष्ट्रगीत अल्लाहो अकबर की पुकारें लगाता है तो क्या वो धार्मिक हुआ या राष्ट्रीय? अल्जीरिया का राष्ट्रगीत क्यों गन पाउडर की आवाज को ‘हमारी लय और मशीनगन की ध्वनि को ‘हमारी रागिनी कहता है? अमेरिका के राष्ट्रगीत में भी ‘हवा में फूटते हुए बम क्यों हैं? चीन के राष्ट्रगीत में खतरे की यह भय ग्रन्थि क्या है? किसी भी देश के राष्ट्रगीत पर ऐसी कोई भी कैसे भी टिप्पणी की जा सकती है लेकिन ये गीत सदियों से इन देशों के करोडों लोगों के प्रेररणा स्रोत हैं और बने रहेंगे। उनका उपहास हमारी असभ्यता है। शम्सु इस्लाम हमें यह भी जताने की कोशिश करते हैं कि वन्दे मातरम्‌ गीत कोई बड़ा सिद्ध नहीं था और यह भी कोई राष्ट्रगीत न होकर मात्र बंगाल गीत था। वह यह नहीं बताते कि कनाडा का राष्ट्रगीत 1880 में पहली बार बजने के सौ साल बाद राष्ट्रगीत बना। 1906 तक उसका कहीं उल्लेख भी नहीं हुआ था। आस्ट्रेलिया का राष्ट्रगीत 1878 में सिडनी में पहली बार बजा और 19 अप्रैल 1984 को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हुआ।

वन्दे मातरम्‌ गीत आनन्दमठ में 1882 में आया लेकिन उसको एक एकीकृत करने वाले गीत के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार 1923 में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेसाध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया जब उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के हिमालय पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में टोका। लेकिन पं. पलुस्कर ने बीच में रुकर कर इस महान गीत का अपमान नहीं होने दिया, पं- पलुस्कर पूरा गाना गाकर ही रुके। सवाल यह है कि इतने वषो तक क्यों वन्दे मातरम्‌ गैर इस्लामी नह था? क्यों खिलाफत आंदोलन के अधिवेशनों की शुरुआत वन्दे मातरम्‌ से होती थी और ये अहमद अली, शौकत अली, जफर अली जैसे वरिष्ठ मुस्लिम नेता इसके सम्मान में उठकर खड़े होते थे। बेरिस्टर जिन्ना पहले तो इसके सम्मान में खडे न होने वालों को फटकार लगाते थे। रफीक जकारिया ने हाल में लिखे अपने निबन्ध में इस बात की ओर इशारा किया है। उनके अनुसार मुस्लिमों द्वारा वन्दे मातरम्‌ के गायन पर विवाद निरर्थक है। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम के दौरान काँग्रेस के सभी मुस्लिम नेताओं द्वारा गाया जाता था। जो मुस्लिम इसे गाना नहीं चाहते, न गाए लेकिन गीत के सम्मान में उठकर तो खड़े हो जाए क्योंकि इसका एक संघर्ष का इतिहास रहा है और यह संविधान में राष्ट्रगान घोषित किया गया है।

बंगाल के विभाजन के समय हिन्दू और मुसलमान दोनों ही इसके पूरा गाते थे, न कि प्रथम दो छंदों को। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इसका पूर्ण- असंक्षिप्त वर्शन गया गया था। इसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे। 
13 मार्च 2003 को कर्नाटक के प्राथमिक एवं सेकेण्डरी शिक्षा के तत्कालीन राज्य मंत्री बी-के-चंद्रशेखर ने ‘प्रकृति‘ शब्द के साथ ‘देवी लगाने को ‘‘हिन्दू एवं साम्दायिक मानकर एक सदस्य के भाषण पर आपत्ति की थी। तब उस आहत सदस्य ने पूछा था कि क्या ‘भारत माता, ‘कन्नड़ भुवनेश्वरी और ‘कन्नड़ अम्बे जैसे शब्द भी साम्दायिक और हिन्दू हैं? 1905 में गाँधीजी ने लिखा- आज लाखों लोग एक बात के लिए एकत्र होकर वन्दे मातरम्‌ गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नह करता। 1936 में गाँधीजी ने लिखा - ‘‘ कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है। 26 अक्टूबर 1937 को पं- जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कलकत्ता में कांग्रेस की कार्यसमिति ने इस विषय पर एक प्रस्ताव स्वीकृत किया। इसके अनुसार ‘‘ यह गीत और इसके शब्द विशेषत: बंगाल में और सामान्यत: सारे देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीयय तिरोध के प्रतीक बन गए। ‘वन्दे मातरम्‌ ये शब्द शक्ति का ऐसा पस्त्रोत बन गए जिसने हमारी जनता को प्रेरित किया और ऐसे अभिवादन हो गए जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की हमें हमेशा याद दिलाता रहेगा। गीत के प्रथम दो छंद सुकोमल भाषा में मातृभूमि और उसके उपहारों की प्रचुरता के बारे में देश में बताते हैं। उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर धार्मिक या किसी अन्य दृष्टि से आपत्ति उठाई जाए। 

ऐसा भी नहीं है कि सभी मुसलमानो ने इसका विरोध किया हो, ये आप देख ही चुके है। आजादी की लड़ाई के समय हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चले थे और उत्साह वर्धन के लिए सभी भारत माता के सैनिक 'वन्दे मातरम' कहकर आगे बढ़ रहे थे , तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया। आज कट्टरावादी इसपर सांप्रदायिकता की चादर डालने में लगे है जो की हमारे हिन्द के लिए तनिक भी ठीक नहीं होगा। चिन्ता की बात तो ये यह है कि ये लोग ये बात समझने को तैयार नहीं है और भेड़ के समान एकदूसरे के पिछे चलते जा रहे है। मेरा तो कहना साफ है जो अपने देश का राष्ट्र गान करने में शर्म महसुस करता हो उसे कहीं डुब मरना चाहिए जहाँ सूखा पड़ा हो, और ऐसे गद्दारो को देश मे भी स्थान नहीं देना चाहिए। 
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जय हिन्द‘ का स्थान लिया ‘ठीक है‘ ने

भारत गणराज्य के वजीरे आजम डॉ.मनमोहन सिंह को कथित तौर पर महान अर्थशास्त्री माना जाता है पर देखा जाए तो वे एक परिपक्तव राजनेता हैं। मनमोहन सिंह ने जिस तरह मौनी बाबा के रूप में आठ साल पूरे कर लिए हैं उससे लगने लगा है कि उनका ब्रम्ह वाक्य मौन से बड़ा कोई दूसरा मित्र और अस्त्र नहीं है, हो गया है। देश में भ्रष्टाचार, अनाचार, घपले घोटालों पर मनमोहन सिंह का मौन सर्व विदित है। दिल्ली में हुए बलात्कार पर मनमोहन सिंह ने मुंह खोला तो राष्ट्र के नाम उनके संदेश में उनकी धूर्तता इस बात से साफ हो गई कि संदेश के अंत में वे बोले - ‘‘ठीक है।‘‘ और चालाक चतुर सूचना प्रसारण मंत्री के कारिंदों ने इसे जस का तस प्रसारित करवा दिया। सूचना प्रसारण मंत्रालय का अनुभाग ‘‘आकाशवाणी‘‘ या ‘दूरदर्शन‘ कभी संसदीय कार्य मत्री कमल नाथ को वाणिज्य उद्योग मंत्री बताता है तो कभी प्रधानमंत्री के देश के नाम संबोधन में पार्श्व में मोबाईल की धुन सुनाता है। महात्मा गांधी के देश में सोनिया गांधी के राज में पुलिस के डंडे की हुकूमत से देश में रोष और असंतोष के साथ ही साथ भय का वातावरण निर्मित हो चुका है।

सालों पुराना एक किस्सा याद आया है। बात 1987 की है, उस वक्त हम देश के हृदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के उप संपादक हुआ करते थे। उस वक्त मालिक महोदय के एक मित्र आए और अपने मकान या दुकान बेचने का एक विज्ञापन प्रकाशित करने को दिया। मालिक ने उस विज्ञापन के नीचे निशुल्क लिखकर विज्ञापन विभाग को दे दिया। विज्ञापन विभाग ने उसे कंपोजिंग के लिए भिजवा दिया। कंपोजिंग के बाद पू्रफ रीडिंग के दौरान प्रूफ रीडर की हिम्मत नहीं हुई कि मालिक के लिखे निशुल्क को काट सके। अंत में विज्ञापन प्रकाशित हुआ और दूसरे ही दिन मालिक के मित्र आए और विज्ञापन विभाग के पास जाकर उन्होंने विज्ञापन के पैसे देने चाहे! मामला मालिक जी के पास तक पहुंचा, मालिक को पता नहीं था कि माजरा क्या है? उन्होंने अखबार बुलवाया और विज्ञापन के नीचे ‘निशुल्क‘ देखकर अपना माथा पकड़ लिया।

कमोबेश यही स्थिति दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के बाद उपजी परिस्थितियों में मजबूरन डॉ.मनमोहन सिंह को देश को संबोधति करने के दौरान उतपन्न हुईं। मनमोहन सिंह ने देश को अपना सादगी भरा चेहरा दिखाते हुए संबोधित किया, किन्तु जब उनका संबोधन समाप्त हुआ तब मनमोहन सिंह ने कहा -‘‘ठीक है।‘‘ अर्थात हो गई तुम्हारे मन की, झुका लिया मुझे। चलो अब बाद में देखते हैं।

प्रधानमंत्री देश का सबसे ताकतवर संवैधानिक पद है। इस पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा देश को संबोधित किया जाता है और उस दौरान पार्श्व में मोबाईल की सुरीली धुन बजती रहती है। अब आप ही बताएं कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा क्या बची है? प्रधानमंत्री के अधीन आने वाले सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधिकारी प्रधानमंत्री को कितने हल्के में ले रहे हैं। प्रधानमंत्री के भाषण को रिकार्ड करने के उपरांत उसकी जांच की जाती है। कांट छांट की जाती है।

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