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विकेश कुमार बडोला
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हम सब में हो स्वतंत्रता की सच्ची भावना
ब हत्‍तरवां
स्‍वतंत्रता दिवस मनाते हुए हमारे सामने भारत देश के बारे में गर्वित होने के
साथ-साथ लज्जित होने की विवशताएं भी हैं। ऐसा इसलिए क्‍योंकि हमारे जिन स्‍वतंत्रता
सेनानियों ने अपने सर्वस्‍व का बलिदान कर भारत को अंग्रेजों के राज से मुक्‍त
कराया था, उन प...
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सूचनाओं पर नियंत्रण और निगरानी की अनुचित नीति
वै से
तो काल्‍पनिक और आध्‍यात्मिक रूप में हम सभी इस दुनिया से बहुत दूर रहते हैं। इस दुनिया
से मतलब देशी-विदेशी शासन-तंत्र के अधीन चलने वाली दुनिया से है। इसमें वह दुनिया सम्मिलित
नहीं, जो हमारे चारों ओर प्राकृतिक रूप में विद्यमान है। जब हम कल्‍पना, स्‍वप्‍न...
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कुसुम दीदी
मे री
दृष्टि में जीवन विडंबनाओं के अतिरिक्‍त कुछ नहीं। पहले जीवन और फि‍र मौत। इससे
बड़ी विडंबना किसी के भी जीवन में और क्‍या हो सकती है ! मरनेवाले के लिए तो मरने से पहले तक यह विडंबना होती है। लेकिन मरनेवाले
को 'एक-पूरे-जीवन-की-तरह' याद करनेवाले उसके जीवित स...
कुसुम दीदी
कुसुम दीदी
chandkhem.blogspot.com
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भीड़तंत्र की विरोधाभासी व्याख्या
लो ग सुप्रीम कोर्ट को भगवान समझते
हैं। तभी तो वे कहते हैं कि कोर्ट ने ऐसा कहा, वैसा कहा। लोग ये क्‍यों नहीं सोचते
कि सुप्रीम कोर्ट में बैठे न्‍यायाधीश भी उसी भारतीय व्‍यवस्‍था में रह रहे हैं,
जहां तमाम समस्‍याएं मौजूद थीं और हैं। तब वे कैसे भगवान जैसे हो सक...
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मंदसौर की घटना, दोषी को हो तुरंत फांसी
छ ह वर्ष की बच्ची या बच्चा। यह आयु मनुष्य की अबोध आयु है। इसमें बच्चे मानसिक और भावनात्मक रूप में खाने - पीने और खिलौनों तक सीमित होते हैं। निश्चिंतता , खेल - कूद , दौड़ - भाग , पढ़ने - सीखने और बड़ों के प्रेम में बीतता बच्चों का जीवन इसीलिए निश्छल , निष्कपट औ...
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