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Nirupama Varma
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DR.NIRUPAMA VARMA ,M.PHIL, PH.D
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लघु कथा पढ़िए मेरी ....hindi .pratilipi.com पर । धन्यवाद प्रतिलिपि ।



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Hours before her death, the "Naughty" her head was put on my legs. Do not know what she was saying. I wept. With 19 years was. The tumor was her . Every day I was dressing her so oozily not fly sitting on the wound. It was difficult for her to walk. The lift at the dock in the morning, and evening take my garden - that came out of the room. she had been a member of the family. I wish she could say anything, I would understand the pain of the minds.
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10/10/16
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हिंदी दिवस ..’ एक हैप्पी डे ‘

(लघु कथा )


सरकारी विभाग में नियुक्त हिंदी अधिकारी ने बाबू से पूछा - “ 14 तारीख को हिंदी दिवस है । कितना परसेंटेज रहा इस साल हिंदी में काम करने का ?”

बाबू --” सर ! चालीस प्रतिशत ।”

अधिकारी ( घूर कर देखता है ) - चालीस माने कितना ? “

बाबू डर गया । जल्दी में भूल गया था कि हमारे देश में प्रशासनिक सेवा में चुने गए अधिकांश अधिकारी कॉन्वेंटी होते है । और वे  हिंदी की संख्या नहीं जानते । तुरंत भूल सुधारता हुआ बोला --” सर! व्वो !! वो ,क्या है सर ! फोर्टी पर्सेन्टेज है ।”

अधिकारी --”  इतना  ‘ लो ‘ पर्सेन्टेज ? “ हमें नौकरी से निकलवाना है क्या ? … इस को बढ़ा कर  ‘एट्टी परसेंटेज ‘ (80%) करो ।

बाबू - (अधिकारी से ..) “ -- सर  , गोष्ठी के लिए मंत्री जी को आमंत्रित किया है । स्वीकृति भी आ गयी उनकी । “

अंततः , विभाग में हिंदी दिवस की गोष्ठी का नियत दिन और नियत  समय पर मंत्री महोदय  द्वारा शुभारम्भ हुआ । मंत्री जी जेब से कागज निकालते हैं ,और तैयार भाषण की शुरुआत होती है --- “  हिंदी इज़ अवर नेशनल लैंग्वेज ….।”

गोष्ठी के दौरान एक अफसर उनके कान में फुसफुसाता है --” सर ! क्या है न ! कि इस के बाद लंच का प्रोग्राम है । सर, ! वेज और नॉनवेज दोनों तरह के खाने का इंतजाम है ।

मंत्री जी मुस्कुराते हैं , अफसर मुस्कुराते हैं । फिर इस मुस्कराहट के बीच उस विभाग के कर्मचारी को हिंदी में विशेष योगदान के लिए ‘ प्राइज़ ‘ दिया जाता है । अब सब खुश हैं । मंत्री जी लंच से खुश , अधिकारी मंत्री की ख़ुशी से खुश , छोटा कर्मचारी ‘ प्राइज़ ‘ से हैप्पी ।

इस तरह हिंदी का एक ‘ हैप्पी डे ‘ मना कर सारा देश गर्वित ….. । 

न छंद ,न मात्रा का बंधन , न तुकांत शब्द , न गीत - बस मन की पीड़ा और आत्मा के भाव _कविता है या नहीं ...सोचा नही ____

भीतर की औरत
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जब सुना -अधखिली कली,
कोख में मार दी गयी
उस बेकफ़न लाश को ,
पहचाना नहीं तुमने ??

जब सुना -
एक औरत घसीटी गयी
गाड़ी में - जिस्म उसका
नोच लिया कई दरिंदों ने
उस घायल ,अधमरी औरत को
पहचाना नहीं तुमने ??

जब सुना -
इक तरफ़ा प्यार का ,
बेटी ने किया इंकार
झुलसा था जिसका -
चेहरा तेजाब से -
उस कुरूप लड़की को
पहचाना नहीं तुमने ??

जब सुना -
डायन कह कर ,
गाँव में घुमाया ,निर्वस्त्र
उस नग्न औरत को ,
पहचाना नहीं तुमने ??

लेकिन मै जान गयी थी ,
सब के मना करने के बाद भी ,
पहचान गयी थी -- कि
वो मै ही हूँ -
इन सब में समायी
मेरे ही भीतर की औरत -
-हाँ - वो मै ही थी !!

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