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krishan lal
कुबेर ज्योतिष केन्द्र
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👸 आज बेटी दिवस भी है -बधाई*
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मेहंदी रोली कंगन का सिँगार नही होता'''

रक्षा बँधन भईया दूज का त्योहार नहीं होता''''

रह जाते है वो घर सूने आँगन बन कर''''

जिस घर मे बेटियों का अवतार नहीं होता'''
जन्म देने के लिए माँ चाहिये,
राखी बाँधने के लिए बहन चाहिये,
कहानी सुनाने के लिए दादी चाहिये,
जिद पूरी करने के लिए मौसी चाहिए,
खीर खिलाने के लिए मामी चाहये,
साथ निभाने के लिए पत्नी चाहिये,
पर यह सभी रिश्ते निभाने के लिए

बेटियां तो जिन्दा रहनी चाहये

घर आने पर दौड़ कर जो पास आये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

थक जाने पर प्यार से जो माथा सहलाए,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

"कल दिला देंगे" कहने पर जो मान जाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

हर रोज़ समय पर दवा की जो याद दिलाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

घर को मन से फूल सा जो सजाये, उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

सहते हुए भी अपने दुख जो छुपा जाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

दूर जाने पर जो बहुत रुलाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

पति की होकर भी पिता को जो ना भूल पाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

मीलों दूर होकर भी पास होने का जो एहसास दिलाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧 ।।

"अनमोल हीरा" जो कहलाये,
उसे कहते हैं बिटिया 👧👧👧 ।।

अगर आप भी अपनी बेटी को प्यार करते हैं तो आप इसे अपने दोस्तों को अवश्य शेयर करें .

[ 🌹 आज बिटिया दिवस की बधाई देश की सभी गौरव शाली बिटिया व उनके भाग्यशाली पापा और मम्मी को जिन्होंने कम से कम एक बिटिया को दो कुल की रक्षा के लिए जन्म दिया।

HAPPY DAUGHTR'S DAY
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इस बार देवशयनी एकादशी व्रत 4 जुलाई2017( मंगलवार) को है।

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया। अत: उसी दिन से आरम्भ करके भगवान चार मास तक क्षीर समुद्र में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। पुराण के अनुसार यह भी कहा गया है कि भगवान हरि ने वामन रूप में दैत्य बलि के यज्ञ में तीन पग दान के रूप में मांगे। भगवान ने पहले पग में संपूर्ण पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आप को समर्पित करते हुए सिर पर पग रखने को कहा। इस प्रकार के दान से भगवान ने प्रसन्न होकर पाताल लोक का अधिपति बना दिया और कहा वर मांगो। बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान आप मेरे महल में नित्य रहें। बलि के बंधन में बंधा देख उनकी भार्या लक्ष्मी ने बलि को भाई बना लिया और भगवान से बलि को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। तब इसी दिन से भगवान विष्णु जी द्वारा वर का पालन करते हुए तीनों देवता ४-४ माह सुतल में निवास करते हैं। विष्णु देवशयनी एकादशी से देवउठानी एकादशी तक, शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक निवास करते हैं। राजा बलि ने वचनबद्ध हो चुके विष्णुजी से कहा- प्रभु, आप नित्य मेरे महल में निवास करें। उसी समय से श्री हरि द्वारा वर का अनुपालन करते हुए तीनों देवता-देवशयनी एकादशी से देव प्रबोधिनी एकादशी तक विष्णु, देवप्रबोधिनी से महाशिवरात्रि तक शिवजी और महाशिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक ब्रह्माजी पाताल लोक में निवास करते हैं। संत एवं साधक इस देवशयन काल को विशेष आध्यात्मिक महत्व देते हैं। कहा जाता है कि जिसने केवल इस आषाढ़ एकादशी का व्रत रख कर कमल पुष्पों से भगवान विष्णु का पूजन कर लिया, उसने त्रिदेव का पूजन कर लिया।
मनुष्य जीवन में योग, ध्यान व धारणा का बहुत महत्व है, क्योंकि इससे सुप्त शक्तियों का नवजागरण एवं अक्षय ऊर्जा का संचय होता है। इसका प्रतिपादन हरिशयनी एकादशी से भली-भांति होता है, जब भगवान विष्णु स्वयं चार महीने के लिए योगनिद्रा का आश्रय ले ध्यान धारण करते हैं। आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष एकादशी को हरिशयनी या देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसे शेषशयनी एकादशी व पद्मनाभा एकादशी भी कहते हैं। भारतवर्ष में गृहस्थों से लेकर संत, महात्माओं व साधकों तक के लिए इस आषाढ़ी एकादशी से प्रारम्भ होने वाले चातुर्मास का प्राचीन काल से ही विशेष महत्व रहा है।

एकादशी व्रत कथा

एक बार देवऋषि नारदजी ने ब्रह्माजी से देवशयनी एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की. ब्रह्माजी ने बताया- सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे. उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी.
परंतु उनके राज्य में पूरे तीन वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा. इस दुर्भिक्ष (अकाल) के कारण चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई. यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि में कमी हो गई. अन्न ही उपलब्ध न था तो धार्मिक कार्यों कैसे होते.
प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी गुहार लगाई. राजा तो इसको लेकर पहले से ही दुःखी थे. वे सोचने लगे कि आखिर मैंने ऐसा कौन- सा पाप-कर्म किया है, जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है?
फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना को लेकर जंगल की ओर चल दिए. वहाँ विचरण करते-करते एक दिन वे ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया।
ऋषिवर ने आशीर्वाद देकर कुशलक्षेम पूछा, फिर जंगल में विचरने व अपने आश्रम में आने का प्रयोजन जानना चाहा.
राजा मांधाता ने हाथ जोड़कर कहा- ‘महात्मन्! सभी प्रकार से धर्म का पालन करता हुआ भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूँ. आखिर किस कारण से ऐसा हो रहा है, कृपया इसका समाधान करें.
यह सुनकर महर्षि अंगिरा ने कहा- ‘हे राजन! सब युगों से उत्तम यह सतयुग है. इसमें छोटे से पाप का भी बड़ा भयंकर दंड मिलता है. इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है. ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य को तप करने का अधिकार नहीं है जबकि आपके राज्य में एक शूद्र तप कर रहा है.
यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है. जब तक वह मृत्यु को प्राप्त नहीं होगा, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा. दुर्भिक्ष की शांति उसे मारने से ही संभव है.
किंतु राजा का हृदय एक नरपराधशूद्र तपस्वी का वध करने को तैयार नहीं हुआ. उन्होंने कहा- ‘हे देव मैं उस निरपराध को मार दूँ, यह मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है। कृपा करके आप कोई और उपाय बताएं.
महर्षि अंगिरा ने बताया- आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत करें. इस व्रत के प्रभाव से अवश्य ही वर्षा होगी. राजा राजधानी लौट आए और एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया. व्रत के प्रभाव से राज्य में मूसलधार वर्षा हुई और राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया.

एकादशी को मधुर स्वर के लिए गुड़ का त्याग करना चाहिए. दीर्घायु होने व पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का त्याग करना चाहिए. कड़वे तेल का त्याग करने से शत्रु परास्त होते हैं. मीठे तेल का त्याग से ऐश्वर्य प्राप्त होता है.
किसी भी प्रकार के पुष्प व सुंदर भोगों का त्याग करने से स्वर्गलाभ होता है. देवशयन के चार मासों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों यथासंभव त्याग करें. पलंग पर सोना, संसर्ग, झूठ बोलना, मांस, शहद और दूसरे का दिया भोजन, मूली, परवल एवं बैंगन का भी त्याग बताया गया है.
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