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Vishwanath Chaturvedi
Attended LUCKNOW UNIVERSITY KKC COLLEGE
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Vishwanath Chaturvedi

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मीडिया ने भुलाया कलंक दिवस,सी बी आई के सहारे बची थी मनमोहन सरकार,शर्मसार हुई संसद!!

भारतीय राजनीति का कलंक दिवस???आज के ही दिन 2008 में न्यूक्लियर डील के ईसू पर वामपंथियो द्वारा 62 सांसदों के साथ समर्थन वापसी के बाद सी बी आई के भरोसे बची थी मनमोहन की सरकार और खुलेआम संसद के फ्लोर पर लहराई गई थी नोटों की गड्डियां आजाद भारत के इतिहास में लोकतंत्र के मंदिर में घटित यह पहली घटना थी।

अपने आप की अनोखी घटना के गुनहगार उसी संसद के सदस्य है,और सौदेवाजी कर 39 सांसदों के साथ सरकार बचाने वाले मुलायम कुनबे पर 10 फरवरी 2009 से सर्वोच्च न्यायालय में फैसला सुरछित है।

कैसा घिनोना मज़ाक बनकर रह गया है हमारा लोकतंत्र???
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Vishwanath Chaturvedi

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छबिराम से शुरू होकर मुख्तार तक की मुलायम यात्रा!

अपराधीकरण की राजनीति के पुरोधा है मुलायम!!

खत्म हुआ पारिवारिक ड्रामा,कुनबे में बर्चस्व को लेकर मचा है घमासान,अपराधी,भृष्टाचारी कुनबे की पहली पसन्द!!

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे स्व: विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा शुरू किये डकैत उन्मूलन अभियान के दौरान विधान सभा में पूछे गए एक सवाल का जबाब देते हुए बिधान सभा में चम्बल के खूंखार डकैत छबिराम गिरोह के सदस्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि मुलायम सिंह यादव गिरोह के संरक्षण का कार्य कर रहे है। और इस गिरोह से मुलायम के क़रीबी रिश्ते है।इसलिये गिरोह पर कार्यवाही करने में दिक्कत आ रही है। शायद उत्तर प्रदेश में ख़बरे दिखाने वालो को मुलायम के अपराधी प्रेम का एहसास नही है।

राज्य में 90 के दशक में अपराधियो के साथ खुलेआम मंच शेयर करने की किसी राजनेता की हैसियत नही थी।उस दौरान भाजपा के समर्थन से पहली बार मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह की सरकार को बड़ा झटका तब लगा,जब आडवाणी जी की रथ यात्रा शुरू हुयी, और रथ को बिहार में रोके जाने के बाद भाजपा द्वारा केंद्र सरकार से समर्थन वापसी के बाद केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री बी पी सिंह की सरकार अल्पमत में आ गयी। देश में धार्मिक उन्माद चरम पर था। अयोध्या में कार सेवको पर पुलिश की गोली से आधा दर्जन उपद्रियो की मौत हुयी । आंदोलन को काउंटर करने के लिए वर्षो से धूल खा रही मंडल कमीशन की रिपोर्ट पिटारे से निकाल बी पी सिंह की सरकार ने धार्मिक उन्माद को जातीय उन्माद से काटने का असफल प्रयाश किया।उसी रिपोर्ट ने रातोरात मुलायम जैसे खूंखार अपराधियो को भी "नेता जी" बना दिया।केंद्र में शुरू हुआ उठापटक का दौर इसी दौरान काग्रेस के समर्थन से केंद्र में स्व: चन्द्रशेखर की सरकार बनी तो राज्य में अल्पमत मुलायम सिंह को समर्थन देकर काग्रेस ने राज्य की सरकार बचा ली।

बाहर से समर्थन दे रही काग्रेस को मंत्री मंडल में हिस्सेदारी की दरकार नही थी।मुलायम ने उस दौरान पश्चिम उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी डी पी यादव को पहली बार अपने मंत्री मंडल में स्थान देकर सूबे में अपराधियो के लिए सियासत में परदे के पीछे रहने वाले तस्कर ,माफिया डकैत,फिरौती के धंधे में लगे अपराधियो के लिए सत्ता के द्वार खोल दिए,इसके बाद तो सारे राजनैतिक दलो में अपराधी भरने की होड़ लग गयी।कोई राजनैतिक दल अब यह कहने की हैसियत में नही है,कि हम भरष्टाचार,अपराधमुक्त राज्य दूँगा।

देश को आधा दर्जन से ज्यादा प्रधानमंत्री देने वाला राज्य आज अपनी बदक़िस्मती पर आंसू बहा रहा है।देश के आज़ादी के आंदोलन में देश का नेतृत्व करने वाले राज्य की कमान 2007 से C B I के वाण्टेड अपराधी मुलायम कुनबे के हाथ में है।
कुनबे की 2007 से जनता की आँखो में धूल झोककर केंद्रीय सत्ता के तलवे चाट कर जेल जाने से बचने की क़वायद में कभी धर्मनिरपेक्ष होकर मनमोहन सिंह की सरकार के क़सीदे पढ़ते नज़र आते है,तो सत्ता परिवर्तन होते ही गुजरात के विकास मॉडल को आदर्श बता मोदी के क़सीदे पढ़ने में सारी सीमाये लांघ जाते है।

वैसे भी मुलायम का संघ परिवार से पुराना और मज़बूत रिश्ता है।चूँकि संघ के लिए वोटो की उपजाऊ भूमि देने में मुलायम मुफ़ीद नज़र आते है।उन्होंने ही भाजपा को91 में पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार सौपी थी।और मुलायम कुनबे की सरकार के रहते ही मोदी को राज्य से बिन मांगे 73 सीटो की सौगात मिली।अब विधान सभा चुनावो तक राज्य में मथुरा,कैराना जैसे
मुद्दों पर जबाबी कव्वाली चलेगी,आप भी चुनावो तक कव्वाली का मज़ा लीजिये।

विश्वनाथ चतुर्वेदी
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Vishwanath Chaturvedi

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** फोन टेपिंग पर मचा कोहराम-बेपर्दा हुआ काॅरपोरेट घरानों का देशद्रोही चेहरा **

=> काॅरपोरेट घरानों के फोन टेपिंग मामले को लेकर पिछले कई दिनों से देशभर में हंगामा मचा हुआ है। फोन टेपिंग के चलते जहां एक तरफ काॅरपोरेट घरानों का देशद्रोही चेहरा बेनक़ाब हो गया है वहीं काॅरपोरेट घरानों की दलाली करने को लेकर हमारी सरकार और सिस्टम एक बार फिर सवालों के कठघरे में हैं।

ये कोई पहली बार नहीं है जब फोन टेपिंग से कोई बड़ा खुलासा हुआ हो लेकिन सवाल ये है कि क्या अब इस मामले में कोई सख़्त कार्रवाई होगी क्योंकि फोन टेपिंग को लेकर हमारे देश में कोई कारगर कानून नही है। सरकार ने अपनी खाल बचाने के लिए जांच के आदेश तो दे दिए लेकिन बड़ा सवाल वही है कि कौन करेगा जांच???
ED, CVC, CBI जैसी एजेंसियां???
पिंजरे में क़ैद तोतों पर देशवासियों का भरोसा ख़त्म हो चुका है।
देश के प्रत्येक नागरिक को मालूम है कि काॅरपोरेट घरानों का देशद्रोही चेहरा बेनक़ाब होने के बावजूद इन दलालों पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।
उदारीकरण के बाद बजट से लेकर पाॅलिसी बनाने का काम पूंजीपतियों के हवाले हो गया है और राजनैतिक दलों के प्यादे सिर्फ संसद में हाथ उठाते हैं।
सवाल ये है कि हमारे देश के सबसे बड़े काॅरपोरेट दलालों के तौर पर बदनाम अमर सिंह और नीरा राडिया जैसे चेहरों के फोन टेपिंग पर आख़िरकार आजतक क्यों नहीं हुई कार्रवाई???
हमारे देश में किसी बड़ी घटना को लेकर बड़े लोगों के नाम आते ही एक-दूसरे को बचाने की क़वायद शुरू हो जाती है।
सरकार की तरफ से कोर्ट में लिझलिझी दलीलें दी जाती हैं तो अदालत में नहीं ठहर पाते ऐसे मुक़दमे।
कोर्ट में वादी-प्रतिवादी के बीच होती है फिक्सिंग। दोनों पक्षों की लचर दलीलें सुनकर कोर्ट भी रह जाती है हैरान।
इतना ही नहीं, पूंजीपतियों का नाम आते ही सरकारों सहित तथाकथित रूप से चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया को भी सांप सूंघ जाता है और फिर अर्थव्यवस्था के ख़राब होने का हवाला, रोज़गार के अवसर, विदेशी निवेश ठहर जाने इत्यादि बहानों के साथ नतीजा वही ढाक के तीन पात।

तो क्या इस मौजूदा शोर के बाद क्या अब किसी पर कोई कार्रवाई होगी या नहीं, इसका जवाब तो अब सिर्फ वक़्त ही देगा..।।

विश्वनाथ चतुर्वेदी,

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Vishwanath Chaturvedi

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पंडित नेहरू की दूरदर्शिता,वैश्विक स्तर पर भारत देश को खडा करने लिए सदिया याद करेगी!संघ/मोदी द्वारा चलाये जा रहे अभियान और देश दुनिया में बढ़ते आतंकवाद को रोकने का एकमात्र कारगर उपाय है,नेहरू द्वारा स्थापित गुटनिर्पेच्छ आंदोलन को सबल व् ताक़तवर बनाकर ही भारत सहित दुनिया के ग़रीब देशो की सम्प्रभुता सुरक्षित रखी जा सकती है!

पंडित नेहरू ने मिस्र के अब्दुल नासिर, इंडोनेशिया के सुकर्णो और यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष आंदोलन चलाया था. दुनिया दो ध्रुवों में बंटी थी. शीत युद्ध में एक तरफ सोवियत रूस था, दूसरी तरफ अमेरिका. ये सभी नेता मध्यमार्ग के हामी और विकासशील देशों के प्रवक्ता के रूप में दुनिया में जाने गए. गुट निरपेक्ष आंदोलन का आइडिया पहली बार 1953 में भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में राजनयिक वीके कृष्ण मेनन ने पेश किया था. फिर नेहरू ने इसे आगे बढ़ाया. यह आंदोलन विश्व की 55 प्रतिशत जनता का प्रतिनिधित्व करता था. आज यह अप्रसांगिक भले हो गया हो, लेकिन अभी भी 120 देश इसके सदस्य हैं.
आज मोदी जी की विदेश नीति का हल्ला है. लेकिन जिस नेपाल में भारतीय सुबह निपटने चले जाते थे, वह नेपाल अब चीन के साथ जा चुका है और चीन बिहार की सीमा तक निर्माण का प्लान बना रहा है. भक्त लोग मोदी की विदेश नीति से गदगद हैं और नेहरू के फोेटोशॉप लगाकर कहा जाता है कि नेहरू ऐसे थे, या वैसे थे. हां, वे कभी नेहरू के काम काज पर बात नहीं करते. नेहरू के काम पर बात करेंगे तो पूरे भारत की बुनियाद की बात करनी पड़ेगी.
नेहरू वह व्यक्ति हैं जो देशवासियों को घूम कर बता रहे थे कि मैं प्रधानमंत्री हूं. मैं गलती करूं तो मुझे कान पकड़कर कुर्सी से आप लोग नीचे उतार देना. यही लोकतंत्र है. नेहरू ने अशिक्षित भारत से कहा था कि मैं जो उद्योग लगा रहा हूं, जो संस्थाएं बना रहा हूं, यही आपके मंदिर हैं. ये आपके बच्चों को रोटी देंगे. आज के नेता कहते हैं कि फलां खंडहर की टूटी दीवार में ही राम बसे हैं, वहीं चलो, अपने बच्चों को भी ले चलो और लड़कर मर मिटो.
आज नेहरू की पुण्यतिथि है. नेहरू का कद हिंदुस्तान की बुनियाद में जज्ब है. वह फोटोशॉप से मैला नहीं होगा. हां, नेहरू ने ही यह भी बताया था कि उनकी और उनकी सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करेगा. वे फर्जी नाम से अपनी ही सरकार के खिलाफ लेख लिखते थे ताकि आलोचना और विपक्ष की परंपरा विकसित हो.
जब कांग्रेस जैसी पार्टी खुद को नहीं बचा पा रही, जब भाजपा देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को बर्बाद करने का अभियान चला रही, तब नेहरू के वे राजनीतिक-लोकतांत्रिक मूल्य याद आते हैं, जो उन्होंने संघर्ष करके स्थापित किए थे. जमाना किसी को उसके योगदान की वजह से याद रखता है, लफ़्फ़ाज़ी और बकैती से नहीं.

विश्वनाथ चतुर्वेदी
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Vishwanath Chaturvedi

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बात-बात पर भड़कती ईरानी को ब्लड प्रेशर और दिमाग़ी जाँच की आवश्यकता है?
इंडिया टी वी के कार्यक्रम की याद आपके जेहन से नही निकली होगी...

मैं उस कार्यक्रम में मौजूद था,राशिद अल्वी ने मोदी की क़रीबी मंत्री कहा था... बस फिर क्या था....मोहतरिमा पैजामे से बाहर...पूरे हाल में अफरा तफरी ...

आखिर मोदी की क़रीबी कहने से एतराज क्यों...क्या मोदी कोई लकड़बग्घे है...या कुछ और.......

गर्मी में गरिमा भी ग़ायब... शायद ये मोदी का दिया देश को नायाब तोहफा है.....झेलिये इन्हे भी...

सत्ता के गलियारे में ख़बरे और ही है...मंत्रिमंडल फेरबदल जल्द होने वाला है....मोहतरिमा का दर्द...

शिछा मंत्री के रूप में नाक़ाम... डिग्री फर्जी...कैम्पस जल रहे.
..आखिर कब तक झेले साहेब?
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Vishwanath Chaturvedi

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यार से ऐसी यारी रख
दुःख में भागीदारी रख,
चाहे लोग कहें कुछ भी
तू तो जिम्मेदारी रख,
वक्त पड़े काम आने का
पहले अपनी बारी रख,
मुसीबतें तो आएगी
पूरी अब तैयारी रख,
कामयाबी मिले ना मिले
जंग हौसलों की जारी रख,
बोझ लगेंगे सब हल्के
मन को मत भारी रख,
मन जीता तो जग जीता
कायम अपनी खुद्दारी रख ।
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Vishwanath Chaturvedi

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शुरू हुआ नूरा कुश्ती का दौर,साहेब के गुलाम की लखनऊ में अखिलेश सरकार के ख़िलाफ़, मुँह जबानी लफ़्फ़ाज़ी ?

सी बी आई तुम्हारे पास केंद्रीय योजनावो की लूट पर घड़ियाली आंसू क्यों?

2 लाख करोड़ के केंद्रोय योजनावो की लूट पर हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच कर रही मोनिटरिंग नही हो पा
रही सी बी आई जाँच?ग़रीबो की भूख से हो रही मौत का जिम्मेदारी किसकी ?
बच्चों के निवाले पर शराब माफियाओ सहित,आपकी पार्टी के नेताओ का कब्जा,नही मिल रहा बच्चों को पुष्टाहार,कुपोषण से मर रहे है रोजाना 600 बच्चे !2004 से पेडिंग है जाँच,लूट बदस्तूर जारी,जिम्मेदार कौन?

घड़ियाली आंसू बहाने के बजाय कार्यवाही का वक्त, कोर्ट से स्टे न होने के बावजूद क्यों नही हो रही मुलायम कुनबे पर ऍफ़ आई आर,कही राज्यसभा मज़बूरी तो नहीं?

सी बी आई के सहारे सरकार चलाने वालो को जनता शिखा चुकी है सबक,नही सम्भले तो बाहर का रास्ता दिखा देगी जनता!
राज्य में अखलाख के सहारे धार्मिक ध्रुवीकरण करने की क़वायद में मशगूल है भाजपा।मुजफ्फरनगर दोहराकर लोकतंत्र लूटने की फ़िराक में है लोकतंत्र के लुटेरे?

राज्यसभा चुनाव की मंडी में बोली लगाने पहुँचे साहेब के गुलाम,बाहुबल,धनबल के सहारे राज्यसभा में शुरू हुआ धड़पकड़ अभियान,कई विधयकों,मंत्रियो के भरस्टाचार के मामले सी बी आई में पेंडिग,सी बी आई का भी हो रहा है इस्तेमाल,किसी भी कीमत पर राज्यसभा में है बहुमत पाने की क़वायद,अल्पमत में होने के कारण नही पास हो रहे जनविरोधी फैसले?
सपा के भरोसे चुनावी रण में कूदे काग्रेसी उम्मीदवार को मुलायम ने दिया धोबीपाट, बसपा के सहारे है कांग्रेस!काग्रेसी विधयकों पर है मुलायम की नज़र आधा दर्जन विधयकों को अपने पाले में लाने की क़वायद में जुटा है मुलायम काकुनबा?

खत्म हो गया वर्दी का इक़बाल, जगह-जगह पीटे जा रहे है पुलिश कर्मी,कानून का राज ख़त्म,गुंडों,लुटेरो,अपराधियों के हवाले है कानून व्यवस्था,अँधेरा क़ायम है।

तरस आता है,देश की मीडिया पर...अपने को राम नाथ गोयनका उत्ताधिकारी बताने वालो की क़लम बिक चुकी है?
इ एम् आई,स्कूलो की फीस ने ऐसा रौंदा कि बेचारे क्लर्को से भी बद्तर हो गए!

Vishwanath chaturvedi
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Vishwanath Chaturvedi

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■ इशरो ने 26 मिनिट में 20 रॉकेट छोड़ बनाया रिकार्ड >

■ बात-बात पर नेहरू को कोसने वाले भक्तो अब बताओ इसरो का निर्माण भी मोदी ने ही चाय बेचने के दौरान ही किया था?नही तो आधुनिक भारत के निर्माता इशरो,भामा एटामिक केन्द्रो सहित देश को दुनिया में सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी के संकल्प के साथ देश में मौजूद सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया में भारत को अलग पहचान दी।आज अमेरिका,जर्मनी कनाडा सहित दुनिया के तमाम मुल्क़ श्री हरिकोटा आकर अपने सेटलाइट सफलता पूर्वक स्थापित कराने को लालायित नज़र आते है।

शायद नेहरू का यह योगदान भक्तो को दिखाई न दे रहा हो,लेकिन देश के लिए नेहरू के किये योगदान सादिया याद रखेगी।आज भारत के प्रत्येक नागरिक का सर गर्व से ऊँचा हुआ है।और 10 करोड़ डॉलर की आय भी हुई है।

भक्तो कोसने के बजाय देश की बुनियादी समस्याओं को दूर करो,नेहरू को इतिहास संघ/भाजपा कभी नही मिटा पायेगे।

विश्वनाथ चतुर्वेदी
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Vishwanath Chaturvedi

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फोन टेपिंग पर मचा है कोहराम,देश में नही है कारगर कानून?

बेपर्दा हुआ कारपोरेट घरानो का देशद्रोही चेहरा?

सरकार ने खाल बचाने के लिए दिए जाँच के आदेश!

कौन करेगा जांच?इ डी,सी वी सी, सी बी आई जैसी एजेंसिया?

पिंजरे में क़ैद तोतो पर देशवासियों का भरोशा खत्म!

देश के प्रत्येक नागरिक को मालूम है,नही होगी कोई कार्यवाही!

उदारीकरण के बाद बजट से लेकर पालिसी बनाने का काम पूँजीपतियों के हवाले ?राजनैतिक दलो के प्यादे सिर्फ संसद में हाथ उठाते है?

अमर सिंह,नीरा राडिया के फोन पर टेपिंग आखिर क्यों नही हुई कार्यवाही?

बड़े लोगो के नाम आते ही शुरू हो जाती है,एक दूसरे को बचाने की क़वायद,सरकार की तरफ से कोर्ट में दी जाती है लिझलिझि दलील,नही ठहरते मुक़दमे?

कोर्ट में वादी प्रतिवादी के बीच होती है,फिक्सिंग,दोनों पछो की लचर दलीले सुन कोर्ट होती है हैरान!

पूँजीपतियों का नाम आते ही सरकारो सहित मीडिया को साँप सूंघ जाता है...फिर हवाला अर्थव्यवस्था ख़राब होने का...
रोजगार के अवसर ...बिदेशी निवेश ठहर जाएगा आदि-आदि बहानो के साथ वही ढाक के तीन पात,नही होगी किसी पर कार्यवाही क्यों...इसका जबाब वक्त देगा...?

विश्वनाथ चतुर्वेदी






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Vishwanath Chaturvedi

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सी बी आइ के शिकंजे में फ़सा मुलायम कुनबा राज्य में जुमला पार्टी को दे रहा है,खाद-पानी?

संगीत सोम पर क्यों नही लगाते रासुका,और चुनाव आयोग से सदस्यता खत्म किये जाने की कार्यवाही की मांग?

मदारियों के जाल में फ़सा मुल्क,90 से नही ढूढ़ पा रहा विकास का रास्ता,चोले बदल-बदल कर वोट के लुटेरे लूट रहे है सत्ता?

जुमला पार्टी कैराना के बहाने 2014 दोहराने की फ़िराक में,वही धोती के नीचे खाकी वाले मुलायम को नही दिख रहा 25 लाख बुन्देलों का पलायन,भूख प्यास पानी,बेरोजगारी से कराह रहा बुंदेलखंड किसी दल के एजेंडे में नही है,क्योकि वहां से राजनैतिक धुर्वीकरण मुमकिन नही है।

एक तरफ मंहगाई से कराह रहा आम आदमी है,तो वही दूसरी तरफ बेरोजगारो की लम्बी कतार है,पूरा देश अराजकता का डंस झेल रहा है।पूँजीपतियों द्वारा बैंको को दिवालीयलिये पन के कगार पर ला खड़ा किया गया है।पूरा पंजाब नशे में मदहोश है।वोट की रोटी तवे पर डाल राजनैतिक दल बिना ठोस वादों के
जुमलों के सहारे सत्ता लूटने की तैयारी में जुट गए है।

मोदी बुखार लोगो के दिल से निकल चुका है,बेलगाम महगाई,रोजाना लगने वाले टैक्स से जनता हतप्रभ है।

साहेब और गुलाम की जोड़ी चुनावी राज्यो में नए जुमलों के साथ सत्ता लूटने की तैयारी में जुटी है।तो सी बी आइ के शिकंजे में फसा मुलायम कुनबा भाजपाई मंत्रियो पर लगे मुक़दमे वापिस लिए जा रहे है।

विश्वनाथ चतुर्वेदी
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Vishwanath Chaturvedi

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मुलायम कुनबे से नूरा कुश्ती लड़ने की तैयारी में भाजपा?

कैराना पर हाय तौबा मचाने वाली भाजपा अपने गिरेबान में झांके,असली गुनहगार कौन?

गुंडाराज पर घड़ियाली आशू बहाने के बजाय सी बी आई को आजादी दो,राज्यसभा में बहुमत का टूल मत बनाओ?

26 अक्टूबर 2007 से बिना सुप्रीम कोर्ट के स्टे के वाण्टेड मुलायम कुनबे पर सी बी आई के हाथ किसने बाँध रखे है?

बिहार में गठवन्धन तोड़ने के लिए सी बी आई का सहारा क्यों?

राज्यसभा में बिपछी एकता तोड़ने के लिए सी बी आई का इस्तेमाल क्यों?

विपछ में रहते हुए सी बी आई की आज़ादी की बात करने वाली भाजपा मौन क्यों?

राज्यसभा में बहुमत जुटाने से लेकर समय-समय पर मुलायम कुनबे के हाथ मरोड़ने के लिए इस्तेमाल हो रही है पेंडिग एफ आई आर,सी बी आइ का इस्तेमाल कर अपराधियों की सरकार चलाते रहकर कैराना पर घड़ियाली आशू जनता को गुमराह करने का प्रयास तो नही,भाजपा नही होने देना चाहती सी बी आई की कार्यवाही,डर दिखाकर सत्ता लूटने की तैयारी में जुटी है भाजपा?

मोदी जी वादा निभावो,संसद को अपराधी मुक्त बनाओ, सांसदो के लम्बित मामलो को फास्ट ट्रैक कोर्ट में एक साल में निपटारा कराओ,फिर उत्तर प्रदेश की जनता को अपराध,भष्टाचार मुक्त शासन का सब्ज़बाग दिखाओ,वरना लफ़्फ़ाज़ी भाषण मत पिलाओ,आपके बारे में देश के आम लोग कहते है;-

मोदी की बात,ऊट का पाद!

न जमीन पर न आसमान पर!!

विश्वनाथ चतुर्वेदी
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Vishwanath Chaturvedi

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति पर अखबार चौथी दुनिया में छपी प्रभात रंजन दीन जी की ये ख़ास रिपोर्ट ________________________________ जजों की नियुक्ति के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी गई है, वह धांधलियों का पुलिंदा है. जज अपने बेटों और नाते रिश्तेदारों को जज बना रहे हैं। और सरकार को उपकृत करने के लिए सत्ता के चहेते सरकारी वकीलों को भी जज बनाने की संस्तुति कर रहे हैं. न्यायाधीश का पद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के प्रभावशाली जजों का खानदानी आसन बनता जा रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अद्यतन सूची में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के बेटे से लेकर कई प्रमुख न्यायाधीशों के बेटे और रिश्तेदार शामिल हैं. नेताओं को भी खूब उपकृत किया जा रहा है. वरिष्ठ कानूनविद्, उत्तर प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के बेटे नीरज त्रिपाठी, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट और आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर समेत ऐसे दर्जनों नाम हैं, जिन्हें जज बनाने के लिए सिफारिश की गई है. जजों की नियुक्ति के लिए की गई संस्तुति की जो सूची सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, उसमें 73 नाम जजों के रिश्तेदारों के हैं और 24 नाम नेताओं के रिश्तेदारों के हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश का कार्यभार संभालने के पूर्व जो तकरीबन 50 नाम जजों की नियुक्ति के लिए भेजे उनमें भी अधिकांश लोग जजों के बेटे और रिश्तेदार हैं या सरकार के पैरवी-पुत्र सरकारी वकील हैं. अब जज बनने के लिए योग्यता ही हो गई है कि अभ्यर्थी जज या नेता का रिश्तेदार हो या सत्ता की नाक में घुसा हुआ सरकारी वकील. अन्य योग्य वकीलों ने तो जज बनने का सपना देखना भी बंद कर दिया है.
जब न्यायाधीश ही अपने नाते-रिश्तेदारों और सरकार के प्रतिनिधि-पुत्रों को जज नियुक्त करे तो संविधान का संरक्षण कैसे हो? यह कठोर तथ्य है जो सवाल बन कर संविधान पर चिपका हुआ है. यह पूरे देश में हो रहा है. जजों की नियुक्ति के लिए विभिन्न हाईकोर्टों से जो लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी जा रही हैं, उनमें अधिकांश लोग प्रभावशाली जजों के रिश्तेदार या सरकार के चहेते सरकारी अधिवक्ता हैं. वरिष्ठ वकीलों को जज बनाने के नाम पर न्यायपीठों में यह गैर-संवैधानिक और गैर-कानूनी कृत्य निर्बाध गति से चल रहा है, इसके खिलाफ सार्वजनिक मंच पर बोलने वाला कोई नहीं. सार्वजनिक मंच पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर जजों की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रो सकते हैं, लेकिन जजों की नियुक्तियों में जो धांधली मचा कर रखी गई है, उसके खिलाफ कोई नागरिक सार्वजनिक मंच पर रो भी नहीं सकता. इस रुदन और उस रुदन के मर्म अलग-अलग हैं. रिश्तेदारों और सरकारी वकीलों को जज बना कर आम आदमी के संवैधानिक अधिकार को कैसे संरक्षित-सुरक्षित रखा जा सकता है और ऐसे जज किसी आम आदमी को कैसा न्याय देते होंगे, लोग इसे समझ भी रहे हैं और भोग भी रहे हैं. देश की न्यायिक व्यवस्था की यही सड़ी हुई असलियत है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने जजों की नियुक्ति के लिए जिन नामों की सिफारिश कर फाइनल लिस्ट सुप्रीम कोर्ट भेजी, उनमें से अधिकांश नाम मौजूदा जजों या प्रभावशाली रिटायर्ड जजों के बेटे, भांजे, साले, भतीजे या नाते रिश्तेदारों के हैं. बाकी लोग सत्ता सामर्थ्यवान सरकारी वकील हैं. चंद्रचूड़ यह लिस्ट भेज कर खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज होकर चले गए, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ पीठ के समक्ष यह सवाल छोड़ गए कि क्या जजों की कुर्सियां न्याधीशों के नाते-रिश्तेदारों और सत्ता-संरक्षित सरकारी वकीलों के लिए आरक्षित हैं? क्या उन अधिवक्ताओं को जज बनने का पारंपरिक अधिकार नहीं रहा जो कर्मठता से वकालत करते हुए पूरा जीवन गुजार देते हैं?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा इलाहाबाद और लखनऊ पीठ के जिन वकीलों के नाम जज की नियुक्ति के लिए भेजे गए हैं उनमें मोहम्मद अल्ताफ मंसूर, संगीता चंद्रा, रजनीश कुमार, अब्दुल मोईन, उपेंद्र मिश्र, शिशिर जैन, मनीष मेहरोत्रा, आरएन तिलहरी, सीडी सिंह, सोमेश खरे, राजीव मिश्र, अजय भनोट, अशोक गुप्ता, राजीव गुप्ता, बीके सिंह जैसे लोगों के नाम उल्लेखनीय हैं. ये कुछ नाम उदाहरण के तौर पर हैं. फेहरिस्त लंबी है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की तरफ से तकरीबन 50 वकीलों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेजे गए हैं, जिन्हें जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. इसमें 35 नाम इलाहाबाद हाईकोर्ट के और करीब 15 नाम हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के हैं. जो नाम भेजे गए हैं उनमें से अधिकांश लोग विभिन्न जजों के रिश्तेदार और सरकारी पदों पर विराजमान वकील हैं. इनमें ओबीसी, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का एक भी वकील शामिल नहीं है. ऐसे में, खबर के साथ-साथ यह भी जानते चलें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के निर्माण से अब तक के 65 साल में एक भी अनुसूचित जाति का वकील जज नहीं बना. इसी तरह वैश्य, यादव या मौर्य जाति का भी कोई वकील कम से कम लखनऊ पीठ में आज तक जज नियुक्त नहीं हुआ. बहरहाल, ताजा लिस्ट के मुताबिक जो लोग जज बनने जा रहे हैं, उनके विभिन्न जजों से रिश्ते और सरकारी पदों के सत्ताई-छत्र का तफसील भी देखते चलिए.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज, जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जज रहे सगीर अहमद के बेटे मोहम्मद अल्ताफ मंसूर को जज बनाए जाने की सिफारिश की गई है. अल्ताफ मंसूर उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को भी जज बनने योग्य पाया गया है. अब्दुल मोईन उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे ओपी श्रीवास्तव के बेटे रजनीश कुमार का नाम भी जज बनने वालों की सूची में शामिल है. रजनीश कुमार उत्तर प्रदेश सरकार के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल भी हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रहे टीएस मिश्रा और केएन मिश्रा के भतीजे उपेंद्र मिश्रा को भी जज बनाने की सिफारिश की गई है. उपेंद्र मिश्रा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सरकारी वकील हैं. पहले भी वे चीफ स्टैंडिंग काउंसिल रह चुके हैं. उपेंद्र मिश्र की एक योग्यता यह भी है कि वे बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा के भाई हैं. इसी तरह हाईकोर्ट के जज रहे एचएन तिलहरी के बेटे आरएन तिलहरी और जस्टिस एसपी मेहरोत्रा के बेटे मनीष मेहरोत्रा को भी जज बनने लायक पाया गया है. इनके भी नाम लिस्ट में शामिल हैं. लखनऊ बेंच से जिन लोगों के नाम जज के लिए चुने गए, उनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल (2) श्रीमती संगीता चंद्रा और राजकीय निर्माण निगम व सेतु निगम के सरकारी वकील शिशिर जैन के नाम भी शामिल हैं.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वीएन खरे के बेटे सोमेश खरे का नाम भी जज के लिए भेजा गया है. इसी तरह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्वनामधन्य जज रहे जगदीश भल्ला के भांजे अजय भनोट और न्यायाधीश रामप्रकाश मिश्र के बेटे राजीव मिश्र का नाम भी जजों के लिए अग्रसारित सूची में शामिल है. अंधेरगर्दी की स्थिति यह है कि हाईकोर्ट के जज रहे पीएस गुप्ता के बेटे अशोक गुप्ता और भांजे राजीव गुप्ता दोनों में ही जज बनने लायक योग्यता देखी गई और दोनों के नाम सुप्रीम कोर्ट भेज दिए गए. इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सिटिंग जज एपी शाही के साले बीके सिंह का नाम भी अनुशंसित सूची में शामिल है. सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिग काउंसिल सीडी सिंह का नाम भी जजों के लिए चयनित सूची में शामिल है.
यह मामला अत्यंत गंभीर इसलिए भी है कि जजों की नियुक्ति की यह लिस्ट खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने तैयार की और अपनी संस्तुति के साथ सुप्रीम कोर्ट भेजी. चंद्रचूड़ अब खुद सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश हैं. उन्हें न्याय के साथ न्याय करने के लिए ही तरक्की देकर सुप्रीम कोर्ट ले जाया गया होगा. जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई संस्तुति ने उनकी न्यायिकता और उन्हें तरक्की देने के मापदंड की न्यायिकता दोनों को संदेह में डाला है. डीवाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे हैं. वकीलों का यह सवाल वाजिब है कि क्या जजों की नियुक्ति के लिए किसी ताकतवर जज का रिश्तेदार होना या एडिशनल एडवोकेट जनरल, चीफ स्टैंडिंग काउंसिल या गवर्नमेंट एडवोकेट होना अनिवार्य योग्यता है? क्या सरकारी वकीलों (स्टेट लॉ अफसर) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत वकील माना जा सकता है? संविधान के ये दोनों अनुच्छेद कहते हैं कि जजों की नियुक्ति के लिए किसी वकील का हाईकोर्ट या कम से कम दो अदालतों में सक्रिय प्रैक्टिस का 10 साल का अनुभव होना अनिवार्य है. क्या इसकी प्रासंगिकता रह गई है? भेजी गई लिस्ट में ऐसे कई नाम हैं जिन्होंने कभी भी किसी आम नागरिक का मुकदमा नहीं लड़ा. काला कोट पहना और पहुंच के बूते सरकारी वकील हो गए, सरकार की नुमाइंदगी करते रहे और जज के लिए अपना नाम रिकमेंड करा लिया.
वर्ष 2000 में भी 13 जजों की नियुक्ति में धांधली का मामला उठा था, जिसमें आठ नाम विभिन्न जजों के रिश्तेदारों के थे. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में कानून मंत्री रहे राम जेठमलानी ने जजों की नियुक्ति के लिए देशभर के हाईकोर्ट से भेजी गई लिस्ट की जांच का आदेश दिया. जांच में पाया गया कि 159 सिफारिशों में से करीब 90 सिफारिशें विभिन्न जजों के बेटों या रिश्तेदारों के लिए की गई थीं. जांच के बाद अनियमितताओं की पुष्टि होने के बाद कानून मंत्रालय ने वह सूची खारिज कर दी थी. जजों की नियुक्ति में जजों द्वारा ही धांधली किए जाने का मामला बाद में जनेश्वर मिश्र ने राज्यसभा में भी उठाया. इसके जवाब में तब कानून मंत्री का पद संभाल चुके अरुण जेटली ने सदन को आधिकारिक तौर पर बताया था कि औपचारिक जांच पड़ताल के बाद लिस्ट खारिज कर दी गई. उस खारिज लिस्ट में शुमार कई लोग बाद में जज बन गए और अब वे अपने रिश्तेदारों को जज बनाने में लगे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन और जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा जैसे नाम उल्लेखनीय हैं. इम्तियाज मुर्तजा के पिता मुर्तजा हुसैन भी इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे. अब्दुल मतीन के सगे भाई अब्दुल मोईन को जज बनाने के लिए संस्तुति सूची में शामिल कर लिया गया है.
इस प्रकरण की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जजों की नियुक्ति में धांधली और भाई-भतीजावाद के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक पांडेय द्वारा दाखिल की गई याचिका खारिज कर दी गई थी और अशोक पांडेय पर 25 हजार का जुर्माना लगाया गया था. जबकि अशोक पांडेय द्वारा अदालत को दी गई लिस्ट के आधार पर ही केंद्रीय कानून मंत्रालय ने देशभर से आई ऐसी सिफारिशों की जांच कराई थी और जांच में धांधली की आधिकारिक पुष्टि होने पर जजों की नियुक्तियां खारिज कर दी थीं. अशोक पांडेय ने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई मौजूदा लिस्ट में बरती गई अनियमितताओं के खिलाफ उन्होंने फिर से याचिका दाखिल की और फिर हाईकोर्ट ने उस पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई. अदालत ने एडवांस कॉस्ट के नाम पर 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश देते हुए कहा कि इसके बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी. पांडेय चिंता जताते हैं कि संविधान और कानून से जुड़े इतने संवेदनशील मामले को 25 हजार रुपये के लिए अदालत ने लंबित रख दिया है. धांधली की यह सूची प्रधानमंत्री और कानून मंत्री को भेजने के बारे में अशोक पांडेय विचार कर रहे हैं, क्योंकि उनके द्वारा भेजी गई सूची पर ही तत्कालीन कानून मंत्रालय ने वर्ष 2000 में कार्रवाई की थी.

न्याय व्यवस्था को सत्ता-प्रभाव में लाने का चल रहा षडयंत्र
सरकारी वकीलों को जज बना कर पूरी न्यायिक व्यवस्था को शासनोन्मुखी करने का षडयंत्र चल रहा है. सीधे तौर पर नागरिकों से जुड़े वकीलों को जज बनाने की परंपरा बड़े ही शातिराना तरीके से नष्ट की जा रही है. कुछ ही अर्सा पहले अधिवक्ता कोटे से जो 10 वकील जज बनाए गए थे, उनमें से भी सात लोग राजीव शर्मा, एसएस चौहान, एसएन शुक्ला, शबीहुल हसनैन, अश्वनी कुमार सिंह, देवेंद्र कुमार अरोड़ा और देवेंद्र कुमार उपाध्याय उत्तर प्रदेश सरकार के वकील (स्टेट लॉ अफसर) थे. इनके अलावा रितुराज अवस्थी और अनिल कुमार केंद्र सरकार के लॉ अफसर थे.
वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता देने में भी भीषण अनियमितता हो रही है. नागरिकों के मुकदमे लड़ने वाले वकीलों को लंबा अनुभव हो जाने के बावजूद उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता की मान्यता नहीं दी जाती, जबकि सरकारी वकीलों को बड़ी आसानी से वरिष्ठ वकील की मान्यता मिल जाती है. कुछ ही अर्सा पहले लखनऊ बेंच के चार वकीलों को वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी गई, जिनमें चीफ स्टैंडिंग काउंसिल आईपी सिंह, एडिशनल एडवोकेट जनरल बुलबुल घोल्डियाल, केंद्र सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल असित कुमार चतुर्वेदी और सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के वकील शशि प्रताप सिंह शामिल हैं. लखनऊ में अनुभवी और विद्वान वकीलों की अच्छी खासी तादाद के बावजूद हाईकोर्ट को उनमें कोई वरिष्ठ अधिवक्ता बनने लायक नहीं दिखता. ऐसे रवैये के कारण वकीलों में आम लोगों के मुकदमे छोड़ कर सरकारी वकील बनने की होड़ लगी हुई है. सब इसके जुगाड़ में लगे हैं और इससे न्याय की मूलभूत अवधारणा बुरी तरह खंडित हो रही है.

जजी भी अपनी, धंधा भी अपना...
जजों के रिश्तेदार जज बन रहे हैं और जजों के रिश्तेदार उन्हीं के बूते अपनी वकालत का धंधा भी चमका रहे हैं. न्याय परिसर में दोनों तरफ से जजों के रिश्तेदारों का ही आधिपत्य कायम होता जा रहा है. जजों के बेटे और रिश्तेदारों की आलीशान वकालत का धंधा जजों की नियुक्ति वाली लिस्ट की तरह कोई चोरी-छिपी बात नहीं रही. यह बिल्कुल सार्वजनिक मामला है. आम लोग भी जजों के रिश्तेदार वकीलों के पास ही जाते हैं, जिन्हें फीस देने से न्याय मिलने की गारंटी हो जाती है. जजों के रिश्तेदारों की उन्हीं के कोर्ट में वकालत करने की खबरें कई बार सुर्खियां बन चुकी हैं. हाईकोर्ट की दोनों पीठों के दर्जनों नामी-गिरामी जजों के बेटे और रिश्तेदार वहीं पर अपनी वकालत का धंधा चमकाते रहे हैं. इनमें जस्टिस अब्दुल मतीन के भाई अब्दुल मोईन, जस्टिस अभिनव उपाध्याय के बेटे रीतेश उपाध्याय, जस्टिस अनिल कुमार के पिता आरपी श्रीवास्तव, भाई अखिल श्रीवास्तव और बेटे अंकित श्रीवास्तव, जस्टिस बालकृष्ण नारायण के पिता ध्रुव नारायण और बेटा ए. नारायण, जस्टिस देवेंद्र प्रताप सिंह के बेटे विशेष सिंह, जस्टिस देवी प्रसाद सिंह के बेटे रवि सिंह, जस्टिस दिलीप गुप्ता की साली सुनीता अग्रवाल, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा के भाई रिशाद मुर्तजा और नदीम, जस्टिस कृष्ण मुरारी के साले उदय करण सक्सेना और चाचा जीएन वर्मा, जस्टिस प्रकाश कृष्ण के बेटे आशीष अग्रवाल, जस्टिस प्रकाशचंद्र वर्मा के बेटे ज्योतिर्जय वर्मा, जस्टिस राजमणि चौहान के बेटे सौरभ चौहान, जस्टिस राकेश शर्मा के बेटे शिवम शर्मा, जस्टिस रवींद्र सिंह के भाई अखिलेश सिंह, जस्टिस संजय मिश्र के भाई अखिलेश मिश्र, जस्टिस सत्यपूत मेहरोत्रा के बेटे निषांत मेहरोत्रा और भाई अनिल मेहरोत्रा, जस्टिस शशिकांत गुप्ता के बेटे रोहन गुप्ता, जस्टिस शिवकुमार सिंह के बेटे महेश नारायण और भाई बीके सिंह, जस्टिस श्रीकांत त्रिपाठी के बेटे प्रवीण त्रिपाठी, जस्टिस सत्येंद्र सिंह चौहान के बेटे राजीव चौहान, जस्टिस सुनील अम्बवानी की बिटिया मनीषा, जस्टिस सुरेंद्र सिंह के बेटे उमंग सिंह, जस्टिस वेद पाल के बेटे विवेक और अजय, जस्टिस विमलेश कुमार शुक्ला के भाई कमलेश शुक्ला, जस्टिस विनीत शरण के पिता एबी शरण और बेटे कार्तिक शरण, जस्टिस राकेश तिवारी के साले विनीत मिश्रा, जस्टिस वीरेंद्र कुमार दीक्षित के बेटे मनु दीक्षित, जस्टिस यतींद्र सिंह के पिता विकास चौधरी, भतीजा कुणाल और बहू मंजरी सिंह, जस्टिस सभाजीत यादव के बेटे पीपी यादव, जस्टिस अशोक कुमार रूपनवाल की बिटिया तनु, जस्टिस अमर शरण के भतीजे सिकंदर कोचर, जस्टिस अमरेश्वर प्रताप शाही के ससुर आरएन सिंह और साले गोविंद शरण, जस्टिस अशोक भूषण के भाई अनिल और बेटे आदर्श व जस्टिस राजेश कुमार अग्रवाल के भाई भरत अग्रवाल अपनी वकालत का धंधा अपने रिश्तेदार जजों के बूते ही चमकते रहे हैं.
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SOCIAL WORKER , POLITICIAN , LAWYER
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  • SOCIAL WORKER, 1983 - present
    anti-corruption movement, da case against mulayam singh yadav, food grain scam(fertilizer scam,land scam lda)
  • LAWYER, present
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    POLITICIAN, 1985 - 2005
    ex-geneal secretary (kkc) student union lucknow university, ex-secretary Indian national trade union congress, ex-member of upcc
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