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dr neelam Mahendra
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सोच बदलेगी तो समाज बदलेगा
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अपने बच्चों को डॉक्टर इंजीनियर से पहले इंसान बनाएं
आज पूरी दुनिया ने बहुत तरक्की कर ली है सभी प्रकार के सुख सुविधाओं के साधन हैं लेकिन दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि भले ही विज्ञान के सहारे आज सभ्यता अपनी चरम पर है लेकिन मानवता अपने सबसे बुरे समय से गुजर रही है।
भौतिक सुविधाओं धन दौलत को हासिल करने की दौड़ में हमारे संस्कार कहीं दूर पीछे छूटते जा रहे हैं।
आज हम अपने बच्चों को डाक्टर इंजीनियर सीए आदि कुछ भी बनाने के लिए मोटी फीस देकर बड़े बड़े संस्थानों में दाखिला करवाते हैं और हमारे बच्चे डाक्टर इंजीनियर आदि तो बन जाते हैं लेकिन एक नैतिक मूल्यों एवं मानवीयता से युक्त इंसान नहीं बन पाते।
हमने अपने बच्चों को गणित की शिक्षा दी, विज्ञान का ज्ञान दिया, अंग्रेजी आदि भाषाओं का ज्ञान दिया , लेकिन व्यक्तित्व एवं नैतिकता का पाठ पढ़ाना भूल गए।
हमने उनके चरित्र निर्माण के पहलू को नजरअंदाज कर दिया।
एक व्यक्ति के व्यक्तित्व में चरित्र की क्या भूमिका होती है इसका महत्व भूल गए।
आज के समाज में झूठ बोलना,दूसरों की भावनाओं का ख्याल नहीं रखना,अपने स्वार्थों को ऊपर रखना, कुछ ले दे कर अपने काम निकलवा लेना,आगे बढ़ने के लिए 'कुछ भी करेगा ' ये सारी बातें आज अवगुण नहीं "गुण" माने जाते हैं।
दरअसल हमारा समाज आज जिस दौर से गुजर रहा है ,वहां नैतिक मूल्यों की नईं नई परिभाषाएँ गढ़ी जा रही हैं।
एक समय था जब हमें यह सिखाया जाता था कि झूठ बोलना गलत बात है लेकिन आज ऐसा नहीं है। बहुत ही सलीके से कहा जाता है कि जिस सच से हमारा नुकसान हो उससे तो झूठ बेहतर है
और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए सफेद झूठ बोलने से भी परहेज़ नहीं किया जाता।
रिश्ता चाहे प्रोफेशनल हो या पर्सनल,झूठ आज सबसे बड़ा सहारा है।
एक और बदलाव जो हमारे नैतिक मूल्यों में आया है,वो यह है कि हमें यह सिखाया जाता है कि हमेशा दिमाग से सोचना चाहिए दिल से नहीं।
यानी किसी भी विषय पर या रिश्ते पर विचार करने की आवश्यकता पड़े, तो दिमाग से काम लो दिल से नहीं।
कुल मिलाकर हमारे विचारों में भावनाओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और जो दिल से सोचते हैं आज की दुनिया में उन्हें 'एमोशनल फूलस' कहा जाता हैं।
तो जो रिश्ते पहले दिलों से निभाए जाते थे आज दिमाग से चलते हैं।
हमारे आज के समाज के नैतिक मूल्य कितने बदल गए हैं, इस बात का एहसास तब होता है जब आज के समाज में व्यक्ति को उसके चरित्र से नहीं उसके पद और प्रतिष्ठा से आंका जाता है।
आज धनवान व्यक्ति पूजा जाता है और यह नहीं देखा जाता कि वो धन कैसे और कहाँ से आ रहा है।
ऐसे माहौल में मेहनत से धन कमाने वाला अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस करता है।
समाज के इस रुख को देखते हुए पहले जो युवा अपनी प्रतिभा और योग्यता के दम पर आगे बढ़ने में गर्व महसूस करते थे आज आगे बढ़ने के लिए अनैतिक रास्तों का सहारा लेने से भी नहीं हिचकिचाते।
ऐसी अनेक बातें हैं जो पहले व्यक्ति के चरित्र को और कालांतर में हमारे समाज की नींव को कमजोर कर रही हैं।
जब समाज में नैतिक मूल्यों को ही बदल दिया जाए,
उन्हें नए शब्दों की चादर ओड़ा दी जाए,
एक नई पहचान ही दे दी जाए,
तो समस्या गंभीर हो जाती है।
किसी ने कहा था कि,
यदि धन का नाश हो जाता है तो उसे फिर से पाया जा सकता है,
यदि स्वास्थ्य खराब हो जाता है, तो उसे भी फिर से हासिल किया जा सकता है
लेकिन यदि चरित्र का पतन हो जाता है तो मनुष्य का ही पतन हो जाता है।
लेकिन आज हम देखते हैं कि लोग चरित्र भी पैसे से खरीदते हैं। "ब्रांड एंड इमेज बिल्डिंग" आज धन के सहारे होती है।
ऐसे में हम एक नए भारत का निर्माण कैसे करेंगे?
वो 'सपनों का भारत' यथार्थ में कैसे बदलेगा?
जिस युवा पीढ़ी पर भारत निर्माण का दायित्व है उसके नैतिक मूल्य तो कुछ और ही बन गए हैं?
अगर हम वाकई में एक नए भारत का निर्माण करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने पुराने नैतिक मूल्यों की ओर लौटना होगा।
जो आदर्श और जो संस्कार हमारी संस्कृति की पहचान हैं उन्हें अपने आचरण में उतारना होगा।
अपनी उस सनातन सभ्यता को अपनाना होगा जिसमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" केवल एक विचार नहीं है,एक जीवन पद्धति है,
उस परम्परा का अनुसरण करना होगा जहाँ हम यह प्रार्थना करते हैं,
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
डॉ नीलम महेंद्र

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खुशियों का फैसला
जो भावना मानवता के प्रति अपना फर्ज निभाने से रोकती हो क्या वो धार्मिक भावना हो सकती है?
जो सोच किसी औरत के संसार की बुनियाद ही हिला दे क्या वो किसी मजहब की सोच हो सकती है?
जब निकाह के लिए लड़की का कुबूलनामा जरूरी होता है तो तलाक में उसके कुबूलनामे को अहमियत क्यों नहीं दी जाती?
साहिर लुधियानवी ने क्या खूब कहा है,
" वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन,उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा"
यहाँ लड़ाई 'छोड़ने' की नहीं है बल्कि "खूबसूरती के साथ छोड़ने" की है। उस अधिकार की है जो एक औरत का पत्नी के रूप में होता तो है लेकिन उसे मिलता नहीं है।
ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जो फैसला इजिप्ट ने 1929 में पाकिस्तान ने 1956 में बांग्लादेश ने 1971 में( पाक से अलग होते ही),ईराक ने 1959 में श्रीलंका ने 1951 में सीरिया ने 1953 में ट्यूनीशिया ने 1956 में और विश्व के 22 मुसलिम देशों ने आज से बहुत पहले ही ले लिया था वो फैसला 21 वीं सदी के आजाद भारत में 22 अगस्त 2016 को आया वो भी 3:2 के बहुमत से।
अगर इस्लाम के जानकारों की मानें तो उनका कहना है कि कुरान में तलाक को बुरा माना जाता है। इसे वैवाहिक संबंध में बिगाड़ के बाद आखिरी विकल्प के रूप में ही देखा जाता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि तलाक़ का हक़ ही छीन लिया जाए। अगर कभी किसी रिश्ते में तलाक की नौबत आ जाती है तो मियाँ बीवी को इस रिश्ते को खत्म करने के लिए तीन महीने का समय दिया जाता है ताकि दोनों ठंडे दिमाग से अपने फैसले पर सोच सकें।
लेकिन जैसे कि अक्सर होता है कुछ कुरीतियां समाज में कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा अपने स्वार्थ सिद्धि हेतु चीजों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने के कारण पैदा की जाती हैं, गलत जानकारियाँ देकर।
यहाँ समझने वाली बात यह है कि समाज वो ही आगे जाता है जो समय के अनुसार अपने अन्दर की बुराइयों को खत्म करके खुद में बदलाव लाता है।
इस बार भारतीय मुस्लिम समाज में इस सकारात्मक बदलाव के पहल का कारण बनीं उत्तराखंड की शायरा बानो जिन्होंने ट्रिपल तलाक बहुविवाह और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पेटीशन दायर की।
यह उन लाखों महिलाओं की लड़ाई थी जिनका जीवन मात्र तीन शब्दों से बदल जाता था।मजहब के नाम पर फोन पर या फिर वाट्स ऐप पर महिला को तलाक देकर एक झटके में अपनी जिंदगी से बेदखल कर दिया जाता था। आज के इस सभ्य समाज में ऐसी कुरीतियों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
सबसे बड़ी बात यह है कि भारत के संविधान में हर व्यक्ति को बराबर के अधिकार प्राप्त हैं चाहे वो किसी भी लिंग या जाति का हो।
लेकिनकिसी भारतीय महिला को भारतीय संविधान के उसके अधिकार केवल इसलिए नहीं मिल सकते थे क्योंकि वो एक मुस्लिम महिला है? शायरा बानो ने इसी बात को अपने केस का आधार बनाया कि यह उसके समानता के संवैधानिक एवं मूलभूत अधिकारों का हनन है जो उनकी विजय का कारण भी बना। निसंदेह कोर्ट के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं के सामाजिक स्तर में सुधार होगा।
सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुना चुका है लेकिन मूल प्रश्न यह है कि क्या यह फैसला मुस्लिम पुरुषों की सोच भी बदल सकता है? जिस खुशी के साथ महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया है क्या पुरुष भी उतनी ही खुशी के साथ इसे स्वीकार कर पाएंगे?
सवाल जितना पेचीदा है जवाब उतना ही सरल है कि हर पुरुष अगर इस फैसले को अपने अहं को किनारे रखकर केवल अपनी रूह से समझने की कोशिश करेगा तो इस फैसले से उसे अपनी बेटी की आग़ामी ज़िंदग़ी और अपनी बहन की मौजूदा हालत सुरक्षित होती दिखेगी और शायद दिल के किसी कोने से यह आवाज भी आए कि इंशाअलाह यह फैसला अगर अम्मी के होते आता तो आज उनके बूढ़े होते चेहरे की लकीरों की दास्ताँ शायद जुदा होती।
अगर वो इस फैसले को मजहब के ठेकेदारों की नहीं बल्कि अपनी खुद की निगाहों से, एक बेटे, एक भाई, एक पिता की नज़र से देखेगा तो जरूर इस फैसले को तहेदिल से कबूल कर पाएगा।
डॉ नीलम महेंद्र

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काश कि रेल बजट तकनीक केन्द्रित होता
"आगे बढ़ने के लिए यह जरूरी नहीं कि गलतियाँ न हों लेकिन यह आवश्यक है कि उनकी पुनरावृत्तियाँ न हों "
भारतीय रेल की स्थापना 1853 में की गई थी। आज वह विश्व का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है एवं रोजगार देने के क्रम में सम्पूर्ण विश्व में आठवें पायदान पर आता है।
भारत में यह यातायात के सबसे सस्ते एवं सुविधाजनक साधन के रूप में देखा जाता है।
न सिर्फ लम्बी दूरी की यात्राओं के लिए रेल एक बेहतर विकल्प है बल्कि बड़े बड़े शहरों में तो मेट्रो और शटलस् को शहर की लाइफ लाइन तक कहा जाता है। इनके पहियों के थमने से इन शहरों की रफ्तार ही थम जाती है।
लेकिन बहुत ही खेद का विषय है कि सुरक्षा की दृष्टि से भारतीय रेल विश्व में कहीं कोई स्थान नहीं रखती यह बात एक बार फिर साबित हुई 19 अगस्त की शाम जब उत्कल एक्सप्रेस उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर में खतौली स्टेशन के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई।
ट्रैक पर काम चल रहा था लेकिन ड्राइवर को काँशन काँल नहीं दिया गया।
परिणाम स्वरूप जिस ढीली कपलिंग वाली पटरी पर ट्रेन की रफ्तार 15 से 20 किमी प्रति घंटा होनी चाहिए उस पर वह 105 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से गुजरी।
नतीजा 14 बोगियाँ पटरी से उतरीं, 23 लोगों की मृत्यु,74 घायल और 30 की हालत गंभीर।
भारत में रेल हादसों की फेहरिस्त काफी पुरानी एवं लम्बी है। रेल मंत्रालय हमारे देश का एक महत्वपूर्ण एवं स्वतंत्र मंत्रालय होने के बावजूद हमारे सिस्टम और हमारे नेताओं का रवैया अत्यंत निराशाजनक रहता आया है।
हमारे नेताओं एवं ब्यूरोक्रेट्स के इस लापरवाही एवं उपेक्षापूर्ण रवैये का खमियाजा कैसे इस देश के आम आदमी को भुगतना पड़ता है इसका स्पष्ट उदाहरण हमारी रेल सेवा की यह ताजा दुर्घटना है।
दिसम्बर 2016 में लोकसभा में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2003 से 2016 के बीच होने वाले रेल हादसों में डीरेलिंग अर्थात पटरी से रेल का उतरना दुर्घटना का प्रमुख कारण रहा है। इसे रेल स्टाफ की लापरवाही कहें या फिर मानवीय भूल जो न सिर्फ हादसे के शिकार हुए लोगों के जीवन का अंत कर देती हैं बल्कि उनके परिवार वालों को वो दर्द दे जाती हैं जो उन्हें जीवन भर न चाहते हुए भी सहना ही होगा।
अब जब हम डिजिटल इंडिया और बुलेट ट्रेनों की बातें कर रहे हैं तो उसमें इस प्रकार की लापरवाही और मानवीय भूलों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। खास तौर पर उस संस्थान में तो कदापि नहीं जिस पर लाखों करोड़ों लोगों के सपनों और उनके जीवन की डोर बंधी हो।
बेहतर होता कि हमारी सरकारें देश के नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझतीं और सरकारी खजाने का प्रयोग दुर्घटना होने के बाद दिए जाने वाले मुआवजे और जांचो में खर्च करने के बजाय उस पैसे का उपयोग ऐसी जानलेवा घटनाओं को रोकने के लिए नई तकनीकों के आविष्कार एवं सम्पादन में करतीं। आज जब सभी विकसित देश अपनी रेल सेवाओं में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से एक्सप्रेस ट्रेन नहीं बल्कि बुलेट ट्रेन तक सफलतापूर्वक चला रही हैं तो हमारे देश में आज भी किसी एक व्यक्ति की लापरवाही के कारण होने वाली इन रेल दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति बार बार क्यों हो रही हैं ?
दुर्भाग्यपूर्ण है कि वैश्विक स्तर पर रेल हादसों को रोकने में 'यूबीआरडी तकनीक ' एवं 'लिंक हावमैन बुश तकनीक ' से बने डब्बों का प्रयोग होता है लेकिन भारत में हर साल रेल बजट में बढ़ोत्तरी होने के बावजूद तकनीकों में बढ़ोत्तरी पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय चुनावी बजट पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

लेकिन इस सब के बीच एक बदलाव की बयार , एक रोशनी की किरण भी देखने को मिली।
कल तक हमारे देश में,इस समाज में एक खतरनाक ट्रेंड चल पड़ा था। सोशल मीडिया के इस दौर में लोगों में दुर्घटनाओं का वीडियो बनाकर उसे अपलोड करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही थी लेकिन पीड़ितों की मदद करने के नाम पर सरकार की जिम्मेदारी बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया जाता था।
ऐसी ही किसी परिस्थिति में सरकारी विभाग में फोन लगाकर उन्हें सूचित करके अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती थी।
लेकिन उप्र के इस गांव के लोगों ने मानवता का वो अद्भुत परिचय दिया जो पूरे देश के लिए एक बहुत ही सुन्दर उदाहरण बन गया।
गांव के सभी लोग तत्काल बचाव कार्य में जुट गए,आसपास के मिस्त्री बिन बुलाए ही गैस कटर लेकर पहुँच गए और डिब्बे काटने लगे ताकि फंसे हुए लोगों को बाहर निकाला जा सके।
करीब 65 प्राइवेट एम्बुलेंस आपरेटर घायलों को अस्पताल ले जाने में जुट गए। इतना ही नहीं एहतियातन बिजली बन्द किए जाने की स्थिति में जनरेटर का भी इंतजाम किया गया।
क्या यह हमारी सोच में एक खूबसूरत बदलाव नहीं है?
वो मानवीय संवेदनाएँ जो हमारे समाज में धीरे धीरे दम तोड़ रही थीं ऐसा लग रहा है, आज उन्हें नवजीवन मिला है।
हर छोटी बड़ी बात के लिए सरकार से ही अपेक्षा करना,अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और कर्तव्यों के प्रति अनभिज्ञता दिखाने की प्रवृत्ति के बजाय खुद आगे बढ़कर न सिर्फ इस देश का नागरिक होने का फर्ज निभाना लेकिन अपने मानव होने का प्रमाण देना हम सभी के लिए,इस देश के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
क्योंकि जब हम बदलेंगे, हमारी सोच बदलेगी,
हमारे कर्म बदलेंगे तो फल भी तो बदलेंगे।
डॉ नीलम महेंद्र

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क्या ऐसे बनेगा मोदी का न्यू इंडिया
धर्म मनुष्य में मानवता जगाता है,
लेकिन जब धर्म ही मानव के पशु बनने का कारण बन जाए तो दोष किसे दिया जाए धर्म को या मानव को ?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ताजा बयान का मकसद जो भी रहा हो लेकिन नतीजा अप्रत्याशित नहीं था।
कहने को भले ही हमारे देश की पहचान उसकी यही सांस्कृतिक विविधता है लेकिन जब इस विविधता को स्वीकार्यता देने की पहल की जाती है तो विरोध के स्वर कहीं और से नहीं इसी देश के भीतर से उठने लगते हैं।
जैसा कि होता आया है ,मुद्दा भले ही सांस्कृतिक था लेकिन राजनैतिक बना दिया गया।
देश की विभिन्न पार्टियों को देश के प्रति अपने 'कर्तव्यबोध' का ज्ञान हो गया और अपने अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर बयान देने की होड़ लग गई।
विभिन्न टीवी चैनल भी अपनी कर्तव्यनिष्ठा में पीछे क्यों रहते ? तो अपने अपने चैनलों पर बहस का आयोजन किया और हमारी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के प्रवक्ता भी एक से एक तर्कों के साथ उपस्थित थे।
और यह सब उस समय जब एक तरफ देश अपने 66 मासूमों की मौत के सदमे में डूबा है,तो दूसरी तरफ बिहार और आसाम के लोग बाढ़ के कहर का सामना कर रहे हैं।
कहीं मातम है, कहीं भूख है, कहीं अपनों से बिछड़ने का दुख है तो कहीं अपना सब कुछ खो जाने का दर्द।
लेकिन हमारे नेता नमाज और जन्माष्टमी में उलझे हैं।
सालों से इस देश में मानसून में कुछ इलाकों में हर साल बाढ़ आती है जिससे न सिर्फ जान और माल का नुकसान होता है बल्कि फसल की भी बरबादी होती है।
वहीं दूसरी ओर कुछ इलाके मानसून का पूरा सीज़न पानी की बूंदों के इंतजार में निकाल देते हैं और बाद में उन्हें सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है।
इन हालातों की पुनरावृत्ति न हो और नई तकनीक की सहायता से इन स्थितियों पर काबू पाने के लिए न तो कोई नेता बहस करता है न आंदोलन।
फसलों की हालत तो यह है कि अभी कुछ दिनों पहले किसानों द्वारा जो टमाटर और प्याज सड़कों पर फेंके जा रहे थे आज वही टमाटर 100 रुपए और प्याज तीस रुपए तक पहुँच गए हैं।
क्योंकि हमारे देश में न तो भंडारण की उचित व्यवस्था है और न ही किसानों के लिए ठोस नीतियाँ। लेकिन यह विषय हमारे नेताओं को नहीं भाते।
किसान साल भर मेहनत कर के भी कर्ज में डूबा है और आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई महंगाई की भेंट चढ़ाने के लिए मजबूर।
लेकिन यह सब तो मामूली बातें हैं!
इतने बड़े देश में थोड़ी बहुत अव्यवस्था हो सकती है ।
सबसे महत्वपूर्ण विषय तो यह है कि थानों में जन्माष्टमी मनाई जानी चाहिए कि नहीं?
काँवर यात्राओं में डीजे बजना चाहिए कि नहीं?
सड़कों पर या फिर एयरपोर्ट पर नमाज पढ़ी जाए तो उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं।
मस्जिदों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लाउड स्पीकर बजेंगे क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं के सम्मान का प्रतीक है।
मोहर्रम के जलूस को सड़कों से निकलने के लिए जगह देना इस देश के हर नागरिक का कर्तव्य है क्योंकि यह देश गंगा जमुना तहज़ीब को मानता आया है।
लेकिन कांवरियों के द्वारा रास्ते बाधित हो जाते हैं जिसके कारण जाम लग जाता है और कितने जरूरतमंद लोग समय पर अपने गन्तव्यों तक नहीं पहुंच पाते।और इस यात्रा में बजने वाले डीजे ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं।
इस तरह की बातें कौन करता है?
क्या इस देश का किसान जो साल भर अपने खेतों को आस से निहारता रहता है
या फिर वो आम आदमी जो सुबह नौकरी पर जाता है और शाम को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के धक्के खाता थका हारा घर आता है
या फिर वो व्यापारी जो अपनी पूंजी लगाकर अपनी छोटी सी दुकान से अपने परिवार का और माता पिता का पेट पालने की सोचने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाता।
या वो उद्यमी जो जानता है कि एक दिन की हड़ताल या दंगा महीने भर के लिए उसका धंधा चौपट कर देगा
या फिर वो गृहणी जो जिसकी पूरी दुनिया ही उसकी चारदीवारी है जिसे सहेजने में वो अपना पूरा जीवन लगा देती है
या फिर वो मासूम बच्चे जो गली में ढोल की आवाज सुनते ही दौड़े चले आते हैं
उन्हें तो नाचने से मतलब है धुन चाहे कोई भी हो
जब इस देश का आम आदमी केवल शांति और प्रेम से अपनी जिंदगी जीना चाहता है तो कौन हैं वो लोग जो बेमतलब की बातों पर राजनीति कर के अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं?
अब जब न्यू इंडिया बन रहा है तो उसमें 'ओल्ड'
की कोई जगह नहीं बची है। ये बातें और इस तरह की बहस पुरानी हो चुकी हैं इस बात को हमारे नेता जितनी जल्दी समझ जाए उतना अच्छा नहीं तो आज सोशल मीडिया का जमाना है और यह पब्लिक है जो सब जानती है। बाकी समझदार को इशारा काफी है
डॉ नीलम महेंद्र

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क्यों हम बेटियों को बचाएँ
“मुझे मत पढ़ाओ , मुझे मत बचाओ,, मेरी इज्जत अगर नहीं कर सकते ,तो मुझे इस दुनिया में ही मत लाओ
मत पूजो मुझे देवी बनाकर तुम ,मत कन्या रूप में मुझे 'माँ' का वरदान कहो
अपने अंदर के राक्षस का पहले तुम खुद ही संहार करो।“
एक बेटी का दर्द
चंडीगढ़ की सड़कों पर जो 5 ता० की रात हुआ वो देश में पहली बार तो नहीं हुआ।
और ऐसा भी नहीं है कि हम इस घटना से सीख लें और यह इस प्रकार की आखिरी घटना ही हो।
बात यह नहीं है कि यह सवाल कहीं नहीं उठ रहे कि रात बारह बजे दो लड़के एक लड़की का पीछा क्यों करते हैं,बल्कि सवाल तो यह उठ रहे हैं कि रात बारह बजे एक लड़की घर के बाहर क्या कर रही थी।
बात यह भी नहीं है कि वे लड़के नशे में धुत्त होकर एक लड़की को परेशान कर रहे थे,
बात यह है कि ऐसी घटनाएं इस देश की सड़कों पर आए दिन और आए रात होती रहती हैं।
बात यह नहीं है कि इनमें से अधिकतर घटनाओं का अंत पुलिस स्टेशन पर पीड़ित परिवार द्वारा न्याय के लिए अपनी आवाज़ उठाने के साथ नहीं होता।
बात यह है कि ऐसे अधिकतर मामलों का अन्त पीड़ित परिवार द्वारा घर की चार दीवारी में अपनी जख्मी आत्मा की चीखों को दबाने के साथ होता है।
बात यह नहीं है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में न्याय के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है,
बात यह है कि इस देश में अधिकार भी भीख स्वरूप दिये जाते है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा पहलू यह है कि वर्णिका कुंडु जिन्होंने रिपोर्ट लिखवाई है,एक आईएएस अफ्सर की बेटी हैं, यानी उनके पिता इस सिस्टम का हिस्सा हैं।
जब वे और उनके पिता उन लड़कों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे तब तक उन्हें नहीं पता था कि वे एक राजनैतिक परिवार का सामना करने जा रहे हैं लेकिन जैसे ही यह भेद खुला कि लड़के किस परिवार से ताल्लुक रखते हैं तो पिता को यह आभास हो गया था कि न्याय की यह लड़ाई कुछ लम्बी और मुश्किल होने वाली है।
उनका अंदेशा सही साबित भी हुआ।
न सिर्फ लड़कों को थाने से ही जमानत मिल गई बल्कि एफआईआर में लड़कों के खिलाफ लगी धाराएँ भी बदल कर केस को कमजोर करने की कोशिशें की गईं।
जब उनके साथ यह व्यवहार हो सकता है तो फिर एक आम आदमी इस सिस्टम से क्या अपेक्षा करे?
जब एक आईएएस अफ्सर को अपने पिता का फर्ज निभाने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो एक साधारण पिता क्या उम्मीद करे?
वर्णिका के पिता ने तो आईएएस लाबी से समर्थन जुटा कर इस केस को सिस्टम वर्सिस पालिटिक्स करके इसके रुख़ को बदलने की कोशिश की है लेकिन एक आम पिता क्या करता?
जब एक लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा ऐसा काम करता है तो वह पार्टी अपने नेता के बचाव में आगे आ जाती है क्योंकि वह सत्ता तंत्र में विश्वास करती है लोकतंत्र में नहीं,वह तो सत्ता हासिल करने का एक जरिया मात्र है।
उसके नेता यह कहते हैं कि पुत्र की करनी की सजा पिता को नहीं दी जा सकती तो बिना योग्यता के पिता की राजनैतिक विरासत उसे क्यों दे दी जाती है।
आप अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए भाषण को भी नकार देते हैं जो कहते हैं कि हम अपनी बेटियों से तो तरह तरह के सवाल पूछते हैं,उन पर पाबंदियां भी लगाते हैं लेकिन कभी बेटे से कोई सवाल कर लेते, कुछ संस्कारों के बीज उनमें डाल देते, कुछ लगाम बेटों पर लगा देते तो बेटियों पर बंदिशें नहीं लगानी पड़तीं।
यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर अपने नेताओं और स्वार्थों को रखती है?
यह कैसी व्यवस्था है जहाँ अपने अधिकारों की बात करना एक "हिम्मत का काम" कहा जाता है।
हम एक ऐसा देश क्यों नहीं बना सकते जहाँ हमारी बेटियाँ भी बेटों की तरह आजादी से जी पाँए ?
हम अपने भूतपूर्व सांसदों विधायकों नेताओं को आजीवन सुविधाएं दे सकते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकते।
हम नेताओं को अपने ही देश में अपने ही क्षेत्र में जेड प्लस सेक्यूरिटी दे सकते हैं लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षा तो छोड़िये न्याय भी नहीं ?
देश निर्भया कांड को भूला नहीं हैं और न ही इस सच्चाई से अंजान है कि हर रोज़ कहीं न कहीं कोई न कोई बेटी किसी न किसी अन्याय का शिकार हो रही है। उस दस साल की मासूम और उसके माता पिता का दर्द कौन समझ सकता है जो किसी और की हैवानियत का बोझ इस अबोध उम्र में उठाने के लिए मजबूर है। जिसकी खिलौनों से खेलने की उम्र थी वो खुद किसी अपने के ही हाथ का खिलौना बन गई। जिसकी हँसने खिलखिलाने की उम्र थी वो आज दर्द से कराह रही है।जो खुद एक बच्ची है लेकिन माँ बनने के लिए मजबूर है।
क्यों हम बेटियों को बचाएँ ? इन हैवानों के लिए?
हम अपने बेटों को क्यों नहीं सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाएँ ?
बेहतर यह होगा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के बजाय
बेटी बचानी है तो पहले बेटों को सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाओ ।उन्हें बेटियों की इज्जत करना तो सिखाओ।
डॉ नीलम महेंद्र

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क्यों हम बेटियों को बचाएँ
“मुझे मत पढ़ाओ , मुझे मत बचाओ,, मेरी इज्जत अगर नहीं कर सकते ,तो मुझे इस दुनिया में ही मत लाओ
मत पूजो मुझे देवी बनाकर तुम ,मत कन्या रूप में मुझे 'माँ' का वरदान कहो
अपने अंदर के राक्षस का पहले तुम खुद ही संहार करो।“
एक बेटी का दर्द
चंडीगढ़ की सड़कों पर जो 5 ता० की रात हुआ वो देश में पहली बार तो नहीं हुआ।
और ऐसा भी नहीं है कि हम इस घटना से सीख लें और यह इस प्रकार की आखिरी घटना ही हो।
बात यह नहीं है कि यह सवाल कहीं नहीं उठ रहे कि रात बारह बजे दो लड़के एक लड़की का पीछा क्यों करते हैं,बल्कि सवाल तो यह उठ रहे हैं कि रात बारह बजे एक लड़की घर के बाहर क्या कर रही थी।
बात यह भी नहीं है कि वे लड़के नशे में धुत्त होकर एक लड़की को परेशान कर रहे थे,
बात यह है कि ऐसी घटनाएं इस देश की सड़कों पर आए दिन और आए रात होती रहती हैं।
बात यह नहीं है कि इनमें से अधिकतर घटनाओं का अंत पुलिस स्टेशन पर पीड़ित परिवार द्वारा न्याय के लिए अपनी आवाज़ उठाने के साथ नहीं होता।
बात यह है कि ऐसे अधिकतर मामलों का अन्त पीड़ित परिवार द्वारा घर की चार दीवारी में अपनी जख्मी आत्मा की चीखों को दबाने के साथ होता है।
बात यह नहीं है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में न्याय के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है,
बात यह है कि इस देश में अधिकार भी भीख स्वरूप दिये जाते है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा पहलू यह है कि वर्णिका कुंडु जिन्होंने रिपोर्ट लिखवाई है,एक आईएएस अफ्सर की बेटी हैं, यानी उनके पिता इस सिस्टम का हिस्सा हैं।
जब वे और उनके पिता उन लड़कों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे तब तक उन्हें नहीं पता था कि वे एक राजनैतिक परिवार का सामना करने जा रहे हैं लेकिन जैसे ही यह भेद खुला कि लड़के किस परिवार से ताल्लुक रखते हैं तो पिता को यह आभास हो गया था कि न्याय की यह लड़ाई कुछ लम्बी और मुश्किल होने वाली है।
उनका अंदेशा सही साबित भी हुआ।
न सिर्फ लड़कों को थाने से ही जमानत मिल गई बल्कि एफआईआर में लड़कों के खिलाफ लगी धाराएँ भी बदल कर केस को कमजोर करने की कोशिशें की गईं।
जब उनके साथ यह व्यवहार हो सकता है तो फिर एक आम आदमी इस सिस्टम से क्या अपेक्षा करे?
जब एक आईएएस अफ्सर को अपने पिता का फर्ज निभाने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो एक साधारण पिता क्या उम्मीद करे?
वर्णिका के पिता ने तो आईएएस लाबी से समर्थन जुटा कर इस केस को सिस्टम वर्सिस पालिटिक्स करके इसके रुख़ को बदलने की कोशिश की है लेकिन एक आम पिता क्या करता?
जब एक लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा ऐसा काम करता है तो वह पार्टी अपने नेता के बचाव में आगे आ जाती है क्योंकि वह सत्ता तंत्र में विश्वास करती है लोकतंत्र में नहीं,वह तो सत्ता हासिल करने का एक जरिया मात्र है।
उसके नेता यह कहते हैं कि पुत्र की करनी की सजा पिता को नहीं दी जा सकती तो बिना योग्यता के पिता की राजनैतिक विरासत उसे क्यों दे दी जाती है।
आप अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए भाषण को भी नकार देते हैं जो कहते हैं कि हम अपनी बेटियों से तो तरह तरह के सवाल पूछते हैं,उन पर पाबंदियां भी लगाते हैं लेकिन कभी बेटे से कोई सवाल कर लेते, कुछ संस्कारों के बीज उनमें डाल देते, कुछ लगाम बेटों पर लगा देते तो बेटियों पर बंदिशें नहीं लगानी पड़तीं।
यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर अपने नेताओं और स्वार्थों को रखती है?
यह कैसी व्यवस्था है जहाँ अपने अधिकारों की बात करना एक "हिम्मत का काम" कहा जाता है।
हम एक ऐसा देश क्यों नहीं बना सकते जहाँ हमारी बेटियाँ भी बेटों की तरह आजादी से जी पाँए ?
हम अपने भूतपूर्व सांसदों विधायकों नेताओं को आजीवन सुविधाएं दे सकते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकते।
हम नेताओं को अपने ही देश में अपने ही क्षेत्र में जेड प्लस सेक्यूरिटी दे सकते हैं लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षा तो छोड़िये न्याय भी नहीं ?
देश निर्भया कांड को भूला नहीं हैं और न ही इस सच्चाई से अंजान है कि हर रोज़ कहीं न कहीं कोई न कोई बेटी किसी न किसी अन्याय का शिकार हो रही है। उस दस साल की मासूम और उसके माता पिता का दर्द कौन समझ सकता है जो किसी और की हैवानियत का बोझ इस अबोध उम्र में उठाने के लिए मजबूर है। जिसकी खिलौनों से खेलने की उम्र थी वो खुद किसी अपने के ही हाथ का खिलौना बन गई। जिसकी हँसने खिलखिलाने की उम्र थी वो आज दर्द से कराह रही है।जो खुद एक बच्ची है लेकिन माँ बनने के लिए मजबूर है।
क्यों हम बेटियों को बचाएँ ? इन हैवानों के लिए?
हम अपने बेटों को क्यों नहीं सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाएँ ?
बेहतर यह होगा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के बजाय
बेटी बचानी है तो पहले बेटों को सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाओ ।उन्हें बेटियों की इज्जत करना तो सिखाओ।
डॉ नीलम महेंद्र

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अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी
नोट बंदी के फैसले को एक पखवाड़े से ऊपर का समय बीत गया है बैंकों की लाइनें छोटी होती जा रही हैं और देश कुछ कुछ संभलने लगा है।
जैसा कि होता है , कुछ लोग फैसले के समर्थन में हैं तो कुछ इसके विरोध में स्वाभाविक भी है किन्तु समर्थन अथवा विरोध तर्कसंगत हो तो ही शोभनीय लगता है।
जब किसी भी कार्य अथवा फैसले पर विचार किया जाता है तो सर्वप्रथम उस कार्य अथवा फैसले को लागू करने में निहित लक्ष्य देखा जाना चाहिए यदि नीयत सही हो तो फैसले का विरोध बेमानी हो जाता है।
यहाँ बात हो रही थी नोटबंदी के फैसले की । इस बात से तो शायद सभी सहमत होंगे कि सरकार के इस कदम का लक्ष्य देश की जड़ों को खोखला करने वाले भ्रष्टाचार एवं काले धन पर लगाम लगाना था।
यह सच है कि फैसला लागू करने में देश का अव्यवस्थाओं से सामना हुआ लेकिन कुछ हद तक वो अव्यवस्था काला धन रखने वालों द्वारा ही निर्मित की गईं थीं और आज भी की जा रही हैं।
जिस प्रकार बैंकों में लगने वाली लम्बी लम्बी कतारों के भेद खुल गए हैं उसी प्रकार आज बैंकों में अगर नगदी का संकट हैं तो उसका कारण भी यही काला धन रखने वाले लोग है।
सरकार ने जिन स्थानों को पुराने नोट लेने के लिए अधिकृत किया है वे ही कमीशन बेसिस पर कुछ ख़ास लोगों के काले धन को सफेद करने के काम में लगे हैं और जिन लोगों के पास नयी मुद्राएँ आ रही हैं वे उन्हें बैंकों में जमा कराने के बजाय मार्केट में ही लोगों का काला धन सफेद करके पैसा कमाने में लगे हैं इस प्रकार बैंकों से नए नोट निकल तो रहे हैं लेकिन वापस जमा न होने के कारण रोटेशन नहीं हो पा रहा।
दरअसल भारत में भ्रष्टाचार की जड़े बहुत पुरानी हैं और इसकी जड़ों ने न सिर्फ देश को खोखला किया है बल्कि यहाँ के आदमी और उसकी सोच को भी खोखला कर दिया है। यह आदमी अपने काले धन को बचाने के लिए ऐसे ऐसे उपाय खोज रहा है कि यदि यही दिमाग सही दिशा में लगता तो शायद आज भारत किसी और ही मुकाम पर होता ।
'भ्रष्टाचार' अर्थात "भ्रष्ट आचरण " , यह एक नैतिकता से जुड़ी हुई चीज़ है एक व्यवहार है जिसे एक बालक को बचपन से ही सिखाया जाता है ,जैसे सच बोलना , चोरी नहीं करना , अन्याय नहीं करना , किसी को कष्ट नहीं पहुँचाना आदि । यह विचार उसे बचपन में ही परिवार से संस्कारों के रुप में और स्कूलों में नैतिक शिक्षा के रूप में दिए जाते हैं।
यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देवताओं की इस धरती पर जहाँ संस्कार बालक को घुट्टी में दिए जाते हैं आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है।
आम आदमी सरकार के इस कदम में सरकार के साथ है क्योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं है और पाने को सपनों का भारत है।
लेकिन जिनके पास खोने को बहुत कुछ है वो कुतर्कों का सहारा लेकर आम आदमी के हौसले पस्त करने में लगा है ।
यह तो सभी जानते हैं कि नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों के पास काले धन की भरमार है और यह भी सच है कि वे सभी काफी हद तक अपने धन को "ठिकाने लगाने" में कामयाब हो गए हैं।
केवल 500.और 1000 के नोट बन्द कर देने से सरकार काले धन पर लगाम नहीं लग सकती और भी उपाय करने होंगे। यह तो भविष्य ही बताएगा कि काले धन से इस लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विजयी होते हैं या फिर उनके विरोधी।
यह जो लड़ाई शुरू हुई है , वह न सिर्फ बहुत बड़ी लड़ाई है बल्कि बहुत मुश्किल भी है क्योंकि यहाँ सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इस लड़ाई को वो उसी सरकारी तंत्र के ही सहारे लड़ रहे हैं जो भ्रष्टाचार में लिप्त है इसलिए लोगों के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सिस्टम वही है और उसमें काम करने वाले लोग वही हैं तो क्या यह एक हारी हुई लड़ाई नहीं है ?
कई जगह देखने में आ रहा है कि बैंक प्रबंधन ही कुछ ख़ास लोगों का काला धन सफेद करने में लगा है तो जो सिस्टम पहले से ही विश्वसनीय नहीं था उस पर आज कैसे भरोसा किया जा सकता है ? जिन नेताओं और अफसरों को रिश्वत लेने की आदत बन गई है और जो अपनी काली कमाई के सहारे अय्याश जीवन शैली जीने के आदी हो चुके हैं क्या अब वे ईमानदारी की राह पर चल पाएंगे ?
दूसरी बात सरकार कठोर कानून लागू करने की बात कर रही है तो कानून पहले भी हमारे देश में कम नहीं थे और उन्हीं कानूनों की आड़ में तमाम गैरकानूनी कामों को अंजाम दिया जाता था ।अगर कोई पकड़ा भी जाता था तो मुकदमे ही तारीखों का इंतजार करते रहते थे बाकी काम गवाहों और सुबूतों को खरीद कर फैसला अपने हक में कराना किसी भी पैसे वाले के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था।
इसलिए अगर प्रधानमंत्री इस लड़ाई को उसके मुकाम तक पहुँचाना ही चाहते हैं तो उन्हें इस ओर ध्यान देना होगा कि उनकी योजनाओं के क्रियान्वयन में जो कमियां आ रही हैं वे विगत सत्तर सालों की सुस्त और भ्रष्ट नौकरशाही के कारण आ रही हैं । इस लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री को अपने साथ देश के प्रतिभावान युवाओं को जोड़ना होगा।
युवा जिनकी आँखों में उम्मीद के सपने कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश , असम्भव को सम्भव कर देने की शक्ति , और यह भारत का सौभाग्य है कि उसकी जनसंख्या का 65% युवा पीढ़ी है ।इस युवा शक्ति का आज तक नेताओं ने सत्ता ने राजनीति ने केवल उपयोग किया उन्हें उसमें भागीदार नहीं बनाया। उनकी योग्यता एवं क्षमता 'अनुभव' के आगे हार जाती है ।
देश के युवा जो कि अब तक कोरा कागज़ हैं ,जो खुद भ्रष्टाचार के शिकार हैं , योग्य एवं प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद कभी कालेज में एडमीशन से वंचित हुए तो कभी मन पसन्द सब्जेक्ट नहीं मिला कभी योग्य होते हुए भी नम्बर कम हो गए कभी पहचान न होने के वजह से नौकरी नहीं मिल पाई।
वह युवा जिसके सीने में इस भ्रष्टाचार और सिस्टम के विरुद्ध एक आग जल रही है जो काबिल होते हुए भी खुद को लाचार और बेबस महसूस कर रहा है उसकी इस आग को देशभक्ति की लौ में बदल दिया जाए और इस लौ से भ्रष्टाचार की सालों पुरानी जड़ों में आग लगा दी जाए।
आज केंद्र और राज्य सरकारों की कितनी योजनाओं का लाभ उसके लाभान्वितों को जमीनी स्तर पर क्रियान्वन के अभाव में नहीं मिल पाता और वे सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि प्रधानमंत्री परम्पराओं एवं लीक से हट कर समाज में अपने अपने क्षेत्र की ऐसे प्रतिभाओं के साथ एक नए प्रशासनिक तंत्र की स्थापना करें जो उनके सपनों के भारत के निर्माण में उनका सहयोग करे ।
उसे देश के इस नए कानून की ट्रेनिंग देकर सिस्टम में शामिल किया जाए।
नए कानूनों का पालन देश की युवा शक्ति , नई पीढ़ी द्वारा कराया जाए एक नए प्रशासनिक तंत्र बनाया जाए जो कि पुराने सिस्टम और पुराने 'सीखे सिखाए ' लोगों की देन ' भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंके ।
क्योंकि पुराने सिस्टम के क्या नेता क्या अफसर और क्या बाबू जो चेन चल रही है ,क्या हम सभी सच से अनजान हैं ?
अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी सालों से नौकरी या नेतागिरी करने वाले तो अपनी पूरी सोच अपनी नौकरी अपनी सत्ता और अपना धन बचाने में ही लगाएंगे।
देश में बदलाव तब आएगा जब जिन हाथों में ताकत हो वह हाथ अपनी शक्ति अपनी सोच देश के भविष्य निर्माण में लगाएँ न कि स्वयं अपने भविष्य के।
डॉ नीलम महेंद्र
अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी
नोट बंदी के फैसले को एक पखवाड़े से ऊपर का समय बीत गया है बैंकों की लाइनें छोटी होती जा रही हैं और देश कुछ कुछ संभलने लगा है।
जैसा कि होता है , कुछ लोग फैसले के समर्थन में हैं तो कुछ इसके विरोध में स्वाभाविक भी है किन्तु समर्थन अथवा विरोध तर्कसंगत हो तो ही शोभनीय लगता है।
जब किसी भी कार्य अथवा फैसले पर विचार किया जाता है तो सर्वप्रथम उस कार्य अथवा फैसले को लागू करने में निहित लक्ष्य देखा जाना चाहिए यदि नीयत सही हो तो फैसले का विरोध बेमानी हो जाता है।
यहाँ बात हो रही थी नोटबंदी के फैसले की । इस बात से तो शायद सभी सहमत होंगे कि सरकार के इस कदम का लक्ष्य देश की जड़ों को खोखला करने वाले भ्रष्टाचार एवं काले धन पर लगाम लगाना था।
यह सच है कि फैसला लागू करने में देश का अव्यवस्थाओं से सामना हुआ लेकिन कुछ हद तक वो अव्यवस्था काला धन रखने वालों द्वारा ही निर्मित की गईं थीं और आज भी की जा रही हैं।
जिस प्रकार बैंकों में लगने वाली लम्बी लम्बी कतारों के भेद खुल गए हैं उसी प्रकार आज बैंकों में अगर नगदी का संकट हैं तो उसका कारण भी यही काला धन रखने वाले लोग है।
सरकार ने जिन स्थानों को पुराने नोट लेने के लिए अधिकृत किया है वे ही कमीशन बेसिस पर कुछ ख़ास लोगों के काले धन को सफेद करने के काम में लगे हैं और जिन लोगों के पास नयी मुद्राएँ आ रही हैं वे उन्हें बैंकों में जमा कराने के बजाय मार्केट में ही लोगों का काला धन सफेद करके पैसा कमाने में लगे हैं इस प्रकार बैंकों से नए नोट निकल तो रहे हैं लेकिन वापस जमा न होने के कारण रोटेशन नहीं हो पा रहा।
दरअसल भारत में भ्रष्टाचार की जड़े बहुत पुरानी हैं और इसकी जड़ों ने न सिर्फ देश को खोखला किया है बल्कि यहाँ के आदमी और उसकी सोच को भी खोखला कर दिया है। यह आदमी अपने काले धन को बचाने के लिए ऐसे ऐसे उपाय खोज रहा है कि यदि यही दिमाग सही दिशा में लगता तो शायद आज भारत किसी और ही मुकाम पर होता ।
'भ्रष्टाचार' अर्थात "भ्रष्ट आचरण " , यह एक नैतिकता से जुड़ी हुई चीज़ है एक व्यवहार है जिसे एक बालक को बचपन से ही सिखाया जाता है ,जैसे सच बोलना , चोरी नहीं करना , अन्याय नहीं करना , किसी को कष्ट नहीं पहुँचाना आदि । यह विचार उसे बचपन में ही परिवार से संस्कारों के रुप में और स्कूलों में नैतिक शिक्षा के रूप में दिए जाते हैं।
यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देवताओं की इस धरती पर जहाँ संस्कार बालक को घुट्टी में दिए जाते हैं आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है।
आम आदमी सरकार के इस कदम में सरकार के साथ है क्योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं है और पाने को सपनों का भारत है।
लेकिन जिनके पास खोने को बहुत कुछ है वो कुतर्कों का सहारा लेकर आम आदमी के हौसले पस्त करने में लगा है ।
यह तो सभी जानते हैं कि नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों के पास काले धन की भरमार है और यह भी सच है कि वे सभी काफी हद तक अपने धन को "ठिकाने लगाने" में कामयाब हो गए हैं।
केवल 500.और 1000 के नोट बन्द कर देने से सरकार काले धन पर लगाम नहीं लग सकती और भी उपाय करने होंगे। यह तो भविष्य ही बताएगा कि काले धन से इस लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विजयी होते हैं या फिर उनके विरोधी।
यह जो लड़ाई शुरू हुई है , वह न सिर्फ बहुत बड़ी लड़ाई है बल्कि बहुत मुश्किल भी है क्योंकि यहाँ सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इस लड़ाई को वो उसी सरकारी तंत्र के ही सहारे लड़ रहे हैं जो भ्रष्टाचार में लिप्त है इसलिए लोगों के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सिस्टम वही है और उसमें काम करने वाले लोग वही हैं तो क्या यह एक हारी हुई लड़ाई नहीं है ?
कई जगह देखने में आ रहा है कि बैंक प्रबंधन ही कुछ ख़ास लोगों का काला धन सफेद करने में लगा है तो जो सिस्टम पहले से ही विश्वसनीय नहीं था उस पर आज कैसे भरोसा किया जा सकता है ? जिन नेताओं और अफसरों को रिश्वत लेने की आदत बन गई है और जो अपनी काली कमाई के सहारे अय्याश जीवन शैली जीने के आदी हो चुके हैं क्या अब वे ईमानदारी की राह पर चल पाएंगे ?
दूसरी बात सरकार कठोर कानून लागू करने की बात कर रही है तो कानून पहले भी हमारे देश में कम नहीं थे और उन्हीं कानूनों की आड़ में तमाम गैरकानूनी कामों को अंजाम दिया जाता था ।अगर कोई पकड़ा भी जाता था तो मुकदमे ही तारीखों का इंतजार करते रहते थे बाकी काम गवाहों और सुबूतों को खरीद कर फैसला अपने हक में कराना किसी भी पैसे वाले के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था।
इसलिए अगर प्रधानमंत्री इस लड़ाई को उसके मुकाम तक पहुँचाना ही चाहते हैं तो उन्हें इस ओर ध्यान देना होगा कि उनकी योजनाओं के क्रियान्वयन में जो कमियां आ रही हैं वे विगत सत्तर सालों की सुस्त और भ्रष्ट नौकरशाही के कारण आ रही हैं । इस लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री को अपने साथ देश के प्रतिभावान युवाओं को जोड़ना होगा।
युवा जिनकी आँखों में उम्मीद के सपने कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश , असम्भव को सम्भव कर देने की शक्ति , और यह भारत का सौभाग्य है कि उसकी जनसंख्या का 65% युवा पीढ़ी है ।इस युवा शक्ति का आज तक नेताओं ने सत्ता ने राजनीति ने केवल उपयोग किया उन्हें उसमें भागीदार नहीं बनाया। उनकी योग्यता एवं क्षमता 'अनुभव' के आगे हार जाती है ।
देश के युवा जो कि अब तक कोरा कागज़ हैं ,जो खुद भ्रष्टाचार के शिकार हैं , योग्य एवं प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद कभी कालेज में एडमीशन से वंचित हुए तो कभी मन पसन्द सब्जेक्ट नहीं मिला कभी योग्य होते हुए भी नम्बर कम हो गए कभी पहचान न होने के वजह से नौकरी नहीं मिल पाई।
वह युवा जिसके सीने में इस भ्रष्टाचार और सिस्टम के विरुद्ध एक आग जल रही है जो काबिल होते हुए भी खुद को लाचार और बेबस महसूस कर रहा है उसकी इस आग को देशभक्ति की लौ में बदल दिया जाए और इस लौ से भ्रष्टाचार की सालों पुरानी जड़ों में आग लगा दी जाए।
आज केंद्र और राज्य सरकारों की कितनी योजनाओं का लाभ उसके लाभान्वितों को जमीनी स्तर पर क्रियान्वन के अभाव में नहीं मिल पाता और वे सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि प्रधानमंत्री परम्पराओं एवं लीक से हट कर समाज में अपने अपने क्षेत्र की ऐसे प्रतिभाओं के साथ एक नए प्रशासनिक तंत्र की स्थापना करें जो उनके सपनों के भारत के निर्माण में उनका सहयोग करे ।
उसे देश के इस नए कानून की ट्रेनिंग देकर सिस्टम में शामिल किया जाए।
नए कानूनों का पालन देश की युवा शक्ति , नई पीढ़ी द्वारा कराया जाए एक नए प्रशासनिक तंत्र बनाया जाए जो कि पुराने सिस्टम और पुराने 'सीखे सिखाए ' लोगों की देन ' भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंके ।
क्योंकि पुराने सिस्टम के क्या नेता क्या अफसर और क्या बाबू जो चेन चल रही है ,क्या हम सभी सच से अनजान हैं ?
अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी सालों से नौकरी या नेतागिरी करने वाले तो अपनी पूरी सोच अपनी नौकरी अपनी सत्ता और अपना धन बचाने में ही लगाएंगे।
देश में बदलाव तब आएगा जब जिन हाथों में ताकत हो वह हाथ अपनी शक्ति अपनी सोच देश के भविष्य निर्माण में लगाएँ न कि स्वयं अपने भविष्य के।
डॉ नीलम महेंद्र

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समाजवादी पार्टी की कलह पारिवारिक या राजनैतिक
उप्र की राजनीति इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है । सत्ता की कुर्सी पर अखिलेश हैं लेकिन चाबी मुलायम सिंह के पास है। यह सत्ता की लड़ाई तो है ही पर विचारों की लड़ाई भी है ।
जहाँ एक तरफ अखिलेश को अपने काम और विकास पर पूरा भरोसा है उप्र की जनता का सामना वे इसी आधार पर करना चाह रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह अपने चुनावी अंकगणित एवं बाहुबल पर यकीन रखते हैं। वे जानते हैं इस देश में चुनाव कैसे जीते जाते हैं केवल काम और विकास के आधार पर चुनाव जीतना तो उनके परिकल्पना से परे है।
अखिलेश के काम से ज्यादा भरोसा उन्हें शिवपाल के जातीय गणित और मुखतार अंसारी के बाहुबल पर है।
जबकि अखिलेश अपने द्वारा चार साल तक प्रदेश में किए गए कार्यों को जनता के सामने रखकर वोटों की अपेक्षा कर रहे हैं । वे कह भी चुके हैं कि इम्तिहान मेरा है टिकट बाँटने का अधिकार मुझे ही मिलना चाहिए जो कि काफी हद तक सही भी है। लेकिन नेताजी का कहना कि काम करने के लिए सत्ता में होना आवश्यक होता है लेकिन सत्ता में रहने के लिए काम करना आवश्यक नहीं होता उसके लिए तो बिसात बिछानी पड़ती है शह और मात की।
लेकिन एक पढ़ लिखा उदारवादी सोच का नौजवान जो उप्र के लोगों को पढ़ा लिखा रहा है उन्हें लैपटॉप दे रहा है एक्सप्रेस हाईवे बना रहा है सड़कें सुधार रहा है अस्पताल और कालेज खुलवा रहा है कानून व्यवस्था से लेकर प्रदेश के मूलभूत ढाँचे को सुधारने में चार साल से लगा है युद्ध स्तर पर काम करके मेट्रो बनवा रहा है उसे बाहुबल का गणित कैसे समझ आ सकता है।
दूसरी तरफ जिसने अपने जीवन का हर चुनाव केवल जाती अल्पसंख्यक एवं दलितों के वोटों के प्रतिशत के आधार पर जीते हों उनसे इस सोच से इससे ऊपर उठने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
दरअसल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन चार सालों में अखिलेश ने उप्र में काम किया है। वहाँ का युवा वर्ग एवं मध्यम वर्ग अखिलेश के साथ है और हाल के घटनाक्रमों से प्रदेश के लोगों के मन में अखिलेश के लिए सहानुभूति भी है। वहाँ की जनता जानती है मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो अखिलेश हैं लेकिन फैसले नेताजी से बिना पूछे नहीं ले सकते। वहाँ के ब्यूरोक्रेट्स अखिलेश से ज्यादा मुलायम और शिवपाल की सुनते हैं। इन मुश्किल परिस्थितियों में भी अखिलेश सरकार ने इन चार सालों में जो काम किया है वो वाकई काबिले तारीफ है।
दूसरी तरफ इतने समय में अखिलेश भी काफी कुछ सीख व समझ चुके हैं और शायद इसीलिए अब वे अपनी छवि से किसी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं हैं।
जैसा कि होता है ,दोनों की इस अलग अलग सोच का फायदा कुछ लोगों द्वारा उठाया जा रहा है और अखिलेश विरोधी गुट सक्रिय हो गया। जिस प्रकार के फैसले आज पार्टी में लिए जा रहे हैं निश्चित ही वे आत्मघाती सिद्ध होंगे।
समाजवादी पार्टी में कौमी एकता दल का विलय अमर सिंह का प्रवेश और उनके युवा समर्थकों का पार्टी से निषकासन अपने आप में बहुत कुछ कहता है । अभी ताजा घटनाक्रम में उनके स्कूल के मित्र एवं समाजवादी पार्टी के सदस्य उदयवीर का पार्टी से निष्कासन , शायद उनके सब्र की परीक्षा ली जा रही है या फिर पार्टी में उनके स्थान का उन्हें एहसास कराया जा रहा है।
दरअसल अभी तक अखिलेश का पलड़ा भारी था यह बात सही है कि हाल के लोकसभा चुनावों में उप्र में भाजपा ने 80 में से 71 सीटें हासिल करी थीं लेकिन वहाँ का जनमानस इस बात में बिल्कुल भी दुविधा में नहीं था ।भारत का वोटर शुरू से ही समझदार रहा है और वह अपनी व देश की भलाई बहुत ही बेहतर समझता है । वह इस विषय में स्पष्ट था कि केंद्र में मोदी और प्रदेश में अखिलेश लेकिन भारत सरकार द्वारा हाल में की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने चुनावी सीन और राजनैतिक समीकरण सब कुछ बदल दिया है। यही वजह है कि मुलायम किसी भी प्रकार की चूक करना नहीं चाह रहे लेकिन अपनी पुरानी सोच को समय के साथ बदल भी नहीं पा रहे। अतिमहत्वकाँक्षा के रथ पर सवार अपने ही बेटे के खिलाफ सत्ता की लालसा में पार्टी और सत्ता बचाना चाह रहे हैं परिवार भले ही टूट जाए ।
दरअसल राजनीति होती ही ऐसी है।अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाकर स्वयं मुलायम सिंह ने एक तरह से अपने परिवार की राजनैतिक विरासत तय कर दी थी लेकिन समय के साथ वे अपने इस फैसले पर शायद पुनः सोचना चाहते हैं यह अलग विषय है कि कारण पारिवारिक हैं या राजनैतिक।
कुल मिलाकर अखिलेश के लिए यह वाकई परीक्षा की घड़ी है जिसमें उप्र का युवा एवं मध्यम वर्ग तो उनके साथ है लेकिन उनका परिवार नहीं। शायद वे पढ़ लिख कर राजनीति में आने और अपने संस्कारों की कीमत चुका रहे हैं।
डाँ नीलम महेंद्र

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समाजवादी पार्टी की कलह पारिवारिक या राजनैतिक
उप्र की राजनीति इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है । सत्ता की कुर्सी पर अखिलेश हैं लेकिन चाबी मुलायम सिंह के पास है। यह सत्ता की लड़ाई तो है ही पर विचारों की लड़ाई भी है ।
जहाँ एक तरफ अखिलेश को अपने काम और विकास पर पूरा भरोसा है उप्र की जनता का सामना वे इसी आधार पर करना चाह रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह अपने चुनावी अंकगणित एवं बाहुबल पर यकीन रखते हैं। वे जानते हैं इस देश में चुनाव कैसे जीते जाते हैं केवल काम और विकास के आधार पर चुनाव जीतना तो उनके परिकल्पना से परे है।
अखिलेश के काम से ज्यादा भरोसा उन्हें शिवपाल के जातीय गणित और मुखतार अंसारी के बाहुबल पर है।
जबकि अखिलेश अपने द्वारा चार साल तक प्रदेश में किए गए कार्यों को जनता के सामने रखकर वोटों की अपेक्षा कर रहे हैं । वे कह भी चुके हैं कि इम्तिहान मेरा है टिकट बाँटने का अधिकार मुझे ही मिलना चाहिए जो कि काफी हद तक सही भी है। लेकिन नेताजी का कहना कि काम करने के लिए सत्ता में होना आवश्यक होता है लेकिन सत्ता में रहने के लिए काम करना आवश्यक नहीं होता उसके लिए तो बिसात बिछानी पड़ती है शह और मात की।
लेकिन एक पढ़ लिखा उदारवादी सोच का नौजवान जो उप्र के लोगों को पढ़ा लिखा रहा है उन्हें लैपटॉप दे रहा है एक्सप्रेस हाईवे बना रहा है सड़कें सुधार रहा है अस्पताल और कालेज खुलवा रहा है कानून व्यवस्था से लेकर प्रदेश के मूलभूत ढाँचे को सुधारने में चार साल से लगा है युद्ध स्तर पर काम करके मेट्रो बनवा रहा है उसे बाहुबल का गणित कैसे समझ आ सकता है।
दूसरी तरफ जिसने अपने जीवन का हर चुनाव केवल जाती अल्पसंख्यक एवं दलितों के वोटों के प्रतिशत के आधार पर जीते हों उनसे इस सोच से इससे ऊपर उठने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
दरअसल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन चार सालों में अखिलेश ने उप्र में काम किया है। वहाँ का युवा वर्ग एवं मध्यम वर्ग अखिलेश के साथ है और हाल के घटनाक्रमों से प्रदेश के लोगों के मन में अखिलेश के लिए सहानुभूति भी है। वहाँ की जनता जानती है मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो अखिलेश हैं लेकिन फैसले नेताजी से बिना पूछे नहीं ले सकते। वहाँ के ब्यूरोक्रेट्स अखिलेश से ज्यादा मुलायम और शिवपाल की सुनते हैं। इन मुश्किल परिस्थितियों में भी अखिलेश सरकार ने इन चार सालों में जो काम किया है वो वाकई काबिले तारीफ है।
दूसरी तरफ इतने समय में अखिलेश भी काफी कुछ सीख व समझ चुके हैं और शायद इसीलिए अब वे अपनी छवि से किसी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं हैं।
जैसा कि होता है ,दोनों की इस अलग अलग सोच का फायदा कुछ लोगों द्वारा उठाया जा रहा है और अखिलेश विरोधी गुट सक्रिय हो गया। जिस प्रकार के फैसले आज पार्टी में लिए जा रहे हैं निश्चित ही वे आत्मघाती सिद्ध होंगे।
समाजवादी पार्टी में कौमी एकता दल का विलय अमर सिंह का प्रवेश और उनके युवा समर्थकों का पार्टी से निषकासन अपने आप में बहुत कुछ कहता है । अभी ताजा घटनाक्रम में उनके स्कूल के मित्र एवं समाजवादी पार्टी के सदस्य उदयवीर का पार्टी से निष्कासन , शायद उनके सब्र की परीक्षा ली जा रही है या फिर पार्टी में उनके स्थान का उन्हें एहसास कराया जा रहा है।
दरअसल अभी तक अखिलेश का पलड़ा भारी था यह बात सही है कि हाल के लोकसभा चुनावों में उप्र में भाजपा ने 80 में से 71 सीटें हासिल करी थीं लेकिन वहाँ का जनमानस इस बात में बिल्कुल भी दुविधा में नहीं था ।भारत का वोटर शुरू से ही समझदार रहा है और वह अपनी व देश की भलाई बहुत ही बेहतर समझता है । वह इस विषय में स्पष्ट था कि केंद्र में मोदी और प्रदेश में अखिलेश लेकिन भारत सरकार द्वारा हाल में की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने चुनावी सीन और राजनैतिक समीकरण सब कुछ बदल दिया है। यही वजह है कि मुलायम किसी भी प्रकार की चूक करना नहीं चाह रहे लेकिन अपनी पुरानी सोच को समय के साथ बदल भी नहीं पा रहे। अतिमहत्वकाँक्षा के रथ पर सवार अपने ही बेटे के खिलाफ सत्ता की लालसा में पार्टी और सत्ता बचाना चाह रहे हैं परिवार भले ही टूट जाए ।
दरअसल राजनीति होती ही ऐसी है।अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाकर स्वयं मुलायम सिंह ने एक तरह से अपने परिवार की राजनैतिक विरासत तय कर दी थी लेकिन समय के साथ वे अपने इस फैसले पर शायद पुनः सोचना चाहते हैं यह अलग विषय है कि कारण पारिवारिक हैं या राजनैतिक।
कुल मिलाकर अखिलेश के लिए यह वाकई परीक्षा की घड़ी है जिसमें उप्र का युवा एवं मध्यम वर्ग तो उनके साथ है लेकिन उनका परिवार नहीं। शायद वे पढ़ लिख कर राजनीति में आने और अपने संस्कारों की कीमत चुका रहे हैं।
डाँ नीलम महेंद्र
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