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e-Mithila
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A forum for maithili literature
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धूमकेतु-एकटा ज्योति रेखा, एकटा शक्तिशाली चमक जे आकाश पृष्ठपर ढृढ़तापूर्वक साफ-साफ अंडरलाइन क' क' क्षितिज केँ बेधैत पाताल प्रवेश क' जाइछ; एकटा आतंककारी चकचोन्ही जे क्षण मे विलीन भ' गेलो पर बड़ी काल धरि लोक केँ अपन अनुभूति करबैत रहैछ। आधुनिक मैथिली साहित्य मे सेहो एनमेन एहने एकटा रश्मिपुंज 'धूमकेतु' छिटकलै आ कथा -कविताक नीचाँ मोट सन लाइन घीचैत बढ़ि गेलै। मुदा, एहि 'धूमकेतु' कृत रेखा मे चमक तँ छैक, आतंक नहि; ढृढ़ता तँ छैक, कट्टरता नहि; स्थायित्व तँ छैक, गतिरोध नहि : डॉ .भीमनाथ झा।
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श्री हंसराजक कोनो उद्गार असंयत नहि लागल - फैशन मे प्रगतिशीलता, प्रयोगवादिता किंवा अत्याधुनिक "उछल-कूद, आक्रोशे आक्रोश, कथ-मथन मध्य नकली निरानन्दिता से सभ क्वचिते भेटत...नारीक रूपमाधुरी केँ भरि छाक पिबैत श्री हंसराज कतहुँ बेलल्ला नहि बूझि पड़ताह- फाटल नूआ वाली कनककामिनी ठाम ठाम एहि भाव लोक मे भेटबे करती। बहुत दिनक बाद एवं प्रकारक भाव - सम्पदा सँ परिचित हेबाक सुअवसर भेटल अछि :
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