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डॉ. राहुल मिश्र
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राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार
राजविद्या-राजगुह्य योग और विनोबा भावे के विचार इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं
विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।। राजविद्या 
राजगुह्यं  पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं  धर्म्यं सुसुखं कर्तुमाव्ययम् ।। 1 श्रीमद्भगवद्गीता के नवम अ...
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वारकरी संप्रदाय की उत्पत्ति के आधार और इनका वैशिष्ट्य
वारकरी संप्रदाय की उत्पत्ति के आधार और इनका वैशिष्ट्य भारतवर्ष की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था धर्मप्रधान रही है
और प्रमुख तत्त्व के रूप में भक्ति की व्याप्ति को भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था
में देखा जा सकता है। भारतीय विद्वानों के साथ ही अनेक विदेशी व...
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एक शोध-आलेख।
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रघुपति भगति सजीवनि मूरी
रघुपति
भगति सजीवनि मूरी रघुपति भगति सजीवनि मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ।। (तुलसीदास कहते हैं कि रघुपति की भक्ति संजीवनी की जड़ की
तरह है। यह भक्ति कंद या फल की भाँति सामने दिखाई देने वाली नहीं है। इसी कारण इसे
आसानी से पाया नहीं जा सकता। इसे जमीन को खोदक...
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प्रकृति का आकर्षक सिंगार।
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एक उत्कृष्ट और संग्रहणीय पुस्तक की भूमिका
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भूमिका (कृष्णकाव्य के महाकवि : सूरदास)
भूमिका किधौं  सूर  कौ  सर
लग्यौ,   किधौं
सूर की पीर । किधौं सूर को  पद लग्यौ,
 तन मन धुनत सरीर ।। कृष्णकाव्य परंपरा के प्रतिनिधि कवि सूरदास के संबंध में
कथा प्रचलित है कि एक बार सूरदास और तानसेन की भेंट हो गई। तानसेन ने सूरदास
द्वारा गाए जा रहे पद को तन्मयत...
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