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amita neerav
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विलंबित खुशी
‘ये हिसाब नहीं लग रहा है मुझसे...।' संपदा जानती तो है कि बेटी अभी ही आई है, ऐसे में उसके सामने अपना रोना लेकर जाए, लेकिन क्या करें? आजकल जाने हिसाब-किताब से कैसे और क्यों घबराहट होने लगी है। उसे खुद ही यह महसूस होने लगा है कि गणित उससे सधता नहीं है। कहाँ तो...
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माँ के यहाँ शरद पूर्णिमा का उत्सव अनुष्ठान के रूप में मनता रहा है। यहाँ अजीब भाग दौड़ और अफरा तफरी का आलम है। हरेक के जीवन की अपनी मजबूरियाँ.... पर जिससे मुझे सुकून मिले वो सब करना मुझे पसंद है.... बुद्धि को ताने नही रहती, परम्पराओं के मूल भाव तक पहुंचने की कोशिश जरूर करती हूँ। पहुँच पाती हूँ या नहीं ये अलग बात है.... तो शरद ऋतु के पूरे चाँद की चाँदनी से भरी छत पर रातरानी की महक.....रेडियो पर छायागीत में बज रहे पुराने फिल्मी गाने.....दूध से भरे कप.....और गहरा सुकून...... खुद हो पाने का सुख.....सुविधा..... क्षमता.....
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सोचती हूँ शरद पूर्णिमा का उत्सव नहीं होता तो हम कब इस तरह अपनी रोजमर्रा की भाग दौड़ से छूट कर पूरे चाँद के साये में मन की गठरी खोल पाते!!!! इससे पहले कब ऐसा किया था??? शायद पिछली शरद पूनम को।
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हमारे पूर्वजों ने हमें प्रकृति और प्रकारांतर से खुद से जोड़ने के लिए क्या-क्या जतन किये हैं!!!
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दिल अब भी धड़कता है
आसमान कितना खुला और उदार है... धऱती कितनी तंग। लेकिन इसके तंग होने में धरती का क्या दोष है? धरती भी तो उतनी ही उदार और खुली हुई रही होगी न कभी? कभी... कभी... कब कभी? जब सभ्यताओँ की शुरुआत नहीं हुई थी। तो इंसानों ने ही धरती को इस कदर नर्क बना दिया है। कितना ...
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समावर्तन के दिसंबर 2016 के अंक में प्रकाशित मेरी कहानी
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तुम… जो बहती नदी हो
1 साइट पर मैं अपनी इंटीरियर डेकोरेटर के साथ था। उसे बताने लाया था कि कहाँ और कैसा फर्निचर बनेगा। बजट क्या होगा, उसके साथ इंजीनियर भी था...। उस अधबने फ्लैट के ड्राईंग रूम में लगने वाली बड़ी-सी खिड़की की चौखट से हाथ टिकाकर मैं दूर देख रहा था। बारिश का मौसम अभ...
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चैटिंग@फेसबुक.कॉम
एक और दिन... जब उसकी नींद खुली तो पहला विचार उसे यही आया। उसे लगा कि आज नींद कुछ ज्यादा ही जल्दी खुल गई है, क्योंकि अभी तक अलार्म नहीं बजा है और उसे लग रहा है जैसे उसकी नींद पूरी हो गई है। उसने टेबल पर रखी घड़ी की तरफ नजर डाली... ओफ.... एक घंटा देर से उठी ह...
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निकट के मई-अगस्त माह में प्रकाशित मेरी कहानी
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दो दुनियाओं के बीच
आधे घंटे पहले सभी कैंटीन में बैठे हुए थे। घड़ी ने साढ़े चार बजाए कि लड़कियों को घर की याद आने लगी और एक-एक कर सभी अपने-अपने घरों की ओर चल दिए, यूँ भी आज इस सेशन की आखिरी क्लास थी... कल से तो पीएल लगने वाली है, हर कोई जरूरी काम से ही यहाँ आएगा, हम होस्टल वालों ...
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