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prem shukla
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दास्तान
अपनी सुरक्षा के लिये धीरे-धीरे   खुद को दीवारों में क़ैद करते गये लोग फिर यूं होते गये एक दूसरे-से दूर कि सुरक्षा तो ख़ैर क्या होती क़ैद ही मजबूत होती गई. अब चाभी बनाने के सब औज़ार तो क़ैद के बाहर ही छोड़ आये. और ज्ञानियों की वो किताब भी जिसमें लिखा था अकेलेपन का...

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बवाल ही बवाल है तीरगी है जाल है धर्मों की मंडी में जनता बस माल है ईश्वर है अल्ला है इंसा मुहाल है रोटी के वादे हैं वोट का सवाल है राम का मुखौटा हैै रावण की चाल है
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